दिन 188

जीवन की चुनौतियों से कैसे निपटें

बुद्धि भजन संहिता 81:1-7
नए करार प्रेरितों के काम 25:1-22
जूना करार 2 राजा 12:1-14:22

परिचय

प्रेसीडेंट जॉन एफ. केनेडी ने कहा, 'हम आज नई सीमा के छोर पर खड़े हैं...लेकिन जिस नई सीमा की मैं बात करता हूँ वह वायदों का एक समूह नहीं है - यह चुनौतियों का एक समूह है। इसमें वह नहीं है जो मैं अमेरिका के लोगों को देना चाहता हूँ, लेकिन वह है जो मैं उनसे माँगना चाहता हूँ।'

जीवन चुनौतियों, परेशानियों और मुश्किलों का एक संच है। कभी कभी हम कल्पना करते हैं कि यदि हम अभी की चुनौती से निपट लें, जिसका हम सामना कर रहे हैं, तो हमारी सभी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी। लेकिन जीवन इस तरह से नहीं है। यदि हम एक परेशानी सुलझा लेते हैं, दूसरी परेशानी इसके पीछे ही खडी रहती है।

प्रलोभन आता है कि इन चुनौतियों को सेवकाई को करने में हमें रोकने वाले कारक के रूप में देखना, जो कि परमेश्वर ने हमें दिया है। वास्तव में, परेशानियों से निपटना सेवकाई है। जैसा कि केनसिंग्टन के एक पूर्वी बिशप इसे बताते हैं: 'यें सेवकाई से जुड़ी हुई परेशानियाँ नहीं हैं, ये वे सेवकाई हैं।'

बाईबल सच्चा जीवन है। भजनसंहिता के लेखक ने दर्द और उदासी का सामना किया। पौलुस ने झूठे आरोप और आरोपों के कारण बंदीगृह में रखे जाने की निराशा का सामना किया। पुराने नियम में राजाओं ने लड़ाईयों और एक बड़ी ईमारत को बनाने के कार्य की चुनौती का सामना किया।

जैसे ही मैं आज के लेखांश को पढ़ता हूँ, मुझे याद आता है कि मैं जिन छोटी सी चुनौतियों, परेशानियों और मुश्किलों को सामना करता हूँ वह उनकी तुलना में कुछ नहीं हैं, जो कि परमेश्वर के लोगों ने भूतकाल में सहा और आज भी विश्वभर में सामना कर रहे हैं।

बुद्धि

भजन संहिता 81:1-7

गित्तीथ के संगत पर संगीत निर्देशक के लिये आसाप का एक पद।

81परमेश्वर जो हमारी शक्ति है आनन्द के साथ तुम उसके गीत गाओ,
 तुम उसका जो इस्राएल का परमेश्वर है, जय जयकार जोर से बोलो।
2 संगीत आरम्भ करो।
 तम्बूरे बजाओ।
 वीणा सारंगी से मधुर धुन निकालो।
3 नये चाँद के समय में तुम नरसिंगा फूँको। पूर्णमासी के अवसर पर तुम नरसिंगा फूँको।
 यह वह काल है जब हमारे विश्र्राम के दिन शुरू होते हैं।
4 इस्राएल के लोगों के लिये ऐसा ही नियम है।
 यह आदेश परमेश्वर ने याकुब को दिये है।
5 परमेश्वर ने यह वाचा यूसुफ़ के साथ तब किया था,
 जब परमेश्वर उसे मिस्र से दूर ले गया।
 मिस्र में हमने वह भाषा सुनी थी जिसे हम लोग समझ नहीं पाये थे।
6 परमेश्वर कहता है, “तुम्हारे कन्धों का बोझ मैंने ले लिया है।
 मजदूर की टोकरी मैं उतार फेंकने देता हूँ।
7 जब तुम विपति में थे तुमने सहायता को पुकारा और मैंने तुम्हें छुड़ाया।
 मैं तुफानी बादलों में छिपा हुआ था और मैंने तुमको उत्तर दिया।
 मैंने तुम्हें मरिबा के जल के पास परखा।”

समीक्षा

परेशानियों के विषय में परमेश्वर से बातें कीजिए

क्या आप परीक्षा के समय में हैं? कभी कभी परमेश्वर हमारी परीक्षा होने देते हैं, जैसे कि उन्होंने मरीबा के सोते पर अपने लोगों की परीक्षा होने दी (व.7, गिनती 20 भी देखें)। लेकिन वह नहीं चाहते हैं कि आप अकेले जीवन की परीक्षाओं और चुनौतियों का सामना करें। आप अपनी परेशानियों के बारे में उनसे बात कर सकते हैं।

परमेश्वर कहते हैं, 'मैंने उनके कंधो पर से बोझ को उतार दिया...तू ने संकट में पड़कर पुकारा, तब मैंने तुझे छुड़ाया' (वव.6अ-7अ)।

'मैंने तेरे कंधे पर से बोझ हटाया, तूझे कठिन परिश्रम से मुक्त किया। दर्द में तूने मुझे पुकारा; मैंने तुझे एक बुरे स्थान में से बाहर निकाला' (वव.6-7अ, एम.एस.जी)।

जिस किसी स्थिति या कठिनाईयों का आप सामना करते हैं, आप प्रार्थना में उन्हें परमेश्वर के पास ला सकते हैं।

परमेश्वर ने उनके बोझों को हटाया और उनकी निराशा में से उन्हें छुड़ाया। इसलिए भजनसंहिता के लेखक आराधना, उत्सव और आनंद के साथ शुरुवात करते हैं:'परमेश्वर जो हमारा बल हैं, उनका गीत आनंद से गाओ' (व.1)।

प्रार्थना

परमेश्वर, आपका धन्यवाद क्योंकि आप मेरी सामर्थ और आनंद हैं, जैसे ही मैं जीवन में चुनौतियों और परेशानियों का सामना करता हूँ। परमेश्वर मैं आज आपको पुकारता हूँ कि मुझे छुड़ाए...

नए करार

प्रेरितों के काम 25:1-22

पौलुस कैसर से अपना न्याय चाहता है

25फिर फेस्तुस ने उस प्रदेश में प्रवेश किया और तीन दिन बाद वह कैसरिया से यरूशलेम को रवाना हो गया। 2 वहाँ प्रमुख याजकों और यहूदियों के मुखियाओं ने पौलुस के विरुद्ध लगाये गये अभियोग उसके सामने रखे और उससे प्रार्थना की 3 कि वह पौलुस को यरूशलेम भिजवा कर उन का पक्ष ले। (वे रास्ते में ही उसे मार डालने का षड्यन्त्र बनाये हुए थे।) 4 फेस्तुस ने उत्तर दिया, “पौलुस कैसरिया में बन्दी है और वह जल्दी ही वहाँ जाने वाला है।” उसने कहा, 5 “तुम अपने कुछ मुखियाओं को मेरे साथ भेज दो और यदि उस व्यक्ति ने कोई अपराध किया है तो वे वहाँ उस पर अभियोग लगायें।”

6 उनके साथ कोई आठ दस दिन बात कर फेस्तुस कैसरिया चला गया। अगले ही दिन अदालत में न्यायासन पर बैठ कर उसने आज्ञा दी कि पौलुस को पेश किया जाये। 7 जब वह पेश हुआ तो यरूशलेम से आये यहूदी उसे घेर कर खड़े हो गये। उन्होंने उस पर अनेक गम्भीर आरोप लगाये किन्तु उन्हें वे प्रमाणित नहीं कर सके। 8 पौलुस ने स्वयं अपना बचाव करते हुए कहा, “मैंने यहूदियों के विधान के विरोध में कोई काम नहीं किया है, न ही मन्दिर के विरोध में और न ही कैसर के विरोध में।”

9 फेस्तुस यहूदियों को प्रसन्न करना चाहत था, इसलिए उत्तर में उसने पौलुस से कहा, “तो क्या तू यरूशलेम जाना चाहता है ताकि मैं वहाँ तुझ पर लगाये गये इन अभियोगों का न्याय करूँ?”

10 पौलुस ने कहा, “इस समय मैं कैसर की अदालत के सामने खड़ा हूँ। मेरा न्याय यहीं किया जाना चाहिये। मैंने यहूदियों के साथ कुछ बुरा नहीं किया है, इसे तू भी बहुत अच्छी तरह जानता है। 11 यदि मैं किसी अपराध का दोषी हूँ और मैंने कुछ ऐसा किया है, जिसका दण्ड मृत्यु है तो मैं मरने से बचना नहीं चाहूँगा, किन्तु यदि ये लोग मुझ पर जो अभियोग लगा रहे हैं, उनमें कोई सत्य नहीं है तो मुझे कोई भी इन्हें नहीं सौंप सकता। यही कैसर से मेरी प्रार्थना है।”

12 अपनी परिषद् से सलाह करने के बाद फेस्तुस ने उसे उत्तर दिया, “तूने कैसर से पुनर्विचार की प्रार्थना की है, इसलिये तुझे कैसर के सामने ही ले जाया जायेगा।”

पौलुस की अग्रिप्पा के सामने पेशी

13 कुछ दिन बाद राजा अग्रिप्पा और बिरनिके फेस्तुस से मिलते कैसरिया आये। 14 जब वे वहाँ कई दिन बिता चुके तो फेस्तुस ने राजा के सामने पौलुस के मुकदमे को इस प्रकार समझाया, “यहाँ एक ऐसा व्यक्ति है जिसे फेलिक्स बंदी के रूप में छोड़ गया था। 15 जब मैं यरूशलेम में था, प्रमुख याजकों और बुजुर्गों ने उसके विरुद्ध मुकदमा प्रस्तुत किया था और माँग की थी कि उसे दण्डित किया जाये। 16 मैंने उनसे कहा, ‘रोमियों में ऐसा चलन नहीं है कि किसी व्यक्ति को, जब तक वादी-प्रतिवादी को आमने-सामने न करा दिया जाये और उस पर लगाये गये अभियोगों से उसे बचाव का अवसर न दे दिया जाये, उसे दण्ड के लिये सौंपा जाये।’

17 “सो वे लोग जब मेरे साथ यहाँ आये तो मैंने बिना देर लगाये अगले ही दिन न्यायासन पर बैठ कर उस व्यक्ति को पेश किये जाने की आज्ञा दी। 18 जब उस पर दोष लगाने वाले बोलने खड़े हुए तो उन्होंने उस पर ऐसा कोई दोष नहीं लगाया जैसा कि मैं सोच रहा था। 19 बल्कि उनके अपने धर्म की कुछ बातों पर ही और यीशु नाम के एक व्यक्ति पर जो मर चुका है, उनमें कुछ मतभेद था। यद्यपि पौलुस का दावा है कि वह जीवित है। 20 मैं समझ नहीं पा रहा था कि इन विषयों की छानबीन कैसे कि जाये, इसलिये मैंने उससे पूछा कि क्या वह अपने इन अभियोगों का न्याय कराने के लिये यरूशलेम जाने को तैयार है? 21 किन्तु पौलुस ने जब प्रार्थना की कि उसे सम्राट के न्याय के लिये ही वहाँ रखा जाये, तो मैंने आदेश दिया, कि मैं जब तक उसे कैसर के पास न भिजवा दूँ, उसे यहीं रखा जाये।”

22 इस पर अग्रिप्पा ने फेस्तुस से कहा, “इस व्यक्ति की सुनवाई मैं स्वयं करना चाहता हूँ।”

फेस्तुस ने कहा, “तुम उसे कल सुन लेना।”

समीक्षा

भरोसा कीजिए कि परमेश्वर नियंत्रण में हैं

विश्वास का अर्थ है परमेश्वर पर भरोसा करना। 'विश्वास' है जैसा कि सी.एस.लिवाईस ने लिखा, 'उन चीजों को पकड़े रखना जिसे आपके तर्क ने एक बार स्वीकार किया था, आपके बदलने वाली मनस्थिति के बावजूद।' जब सबकुछ गलत होते हुए दिखाई देता है, तब परमेश्वर पर भरोसा करना कठिन बात है।

लूका पौलुस की जाँच को एक बहुत ही निष्पक्ष और भावनारहित तरीके से बताते हैं। अवश्य ही यह पौलुस के लिए असाधारण रूप से निराश करने वाला समय था। चर्च का यह महान लीडर, सुसमाचार प्रचारक और शिक्षक बंदी बना लिया गया, उस समय वह नहीं कर पा रहे थे जो करने के लिए बुलाए गए थे। वह बंदीगृह में हैं, भौतिक दबाव और बंदीगृह की असुविधा को सहते हुए।

पौलुस के विरूद्ध गंभीर आरोप लगाए गए (वव.1-7)। वह अपना बचाव करते हैं, यह बताते हुए कि उन्होंने 'कुछ भी गलत नहीं किया है' (वव.8-10)। लेकिन फेस्तुस इस बात में ज्यादा दिलचस्पी लेते थे कि लोग क्या सोचते हैं (व.9) इसके बजाय कि क्या सही है। वह न्याय से अधिक प्रसिद्ध होने के विषय में अधिक चिंतित थे। अंत में, पौलुस केसर की दोहाई देते हैं (व.11)।

जब राजा अग्रिप्पा आते हैं, तब फेस्तुत उन्हें पौलुस के बारे में बताते हैं। फेस्तुस कहते हैं, ' जब उस पर आरोप लगाने वाले खड़े हुए, तो उन्होंने ऐसी अनुचित बातों का दोष नहीं लगाया, जैसा मैं समझता था। परन्तु वे अपने मत के और यीशु नाम किसी मनुष्य के विषय में, जो मर गया था और पौलुस उसको जीवित बताता था, विवाद करते थे' (वव.18-19)।

यीशु के जी उठने को हमेशा उस संदेश में प्राथमिकता होनी चाहिए, जिसका हम प्रचार करते हैं। केवल एक आरोप जिसे वह लगा सकते थे, वह था कि पौलुस प्रचार कर रहे थे कि यीशु जीवित हैं, फिर भी उनके विरोध में कई दूसरे आरोप और झूठे दोष लगाए गए।

इन सभी कठिनाईयों और निराशाओं के बीच में, पौलुस के लिए यह देखना अवश्य ही कठिन बात थी कि उनके मुकदमे में इन सभी बेईमानी, देरी और अनिश्चितता से क्या अच्छा परिणाम उन्हें मिलेगा। जैसा कि पौलुस ने लिखा, ' हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उनकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं' (रोमियो 8:28)।

पहला, थोड़े ही समय में, पौलुस को अग्रिप्पा से बात करने का अवसर मिला। पौलुस के बारे में सबकुछ सुन लेने के बाद, अग्रिप्पा ने फेस्तुस से कहा, 'मैं स्वयं इस मनुष्य की बातें सुनना चाहता हूँ' (प्रेरितों के काम 25:22)। निराशा और मुश्किलों के समय में आप नहीं जानते हैं कि कब अवसर मिलेंगे, लेकिन कभी कभी अवसर मिलते हैं।

दूसरा, मध्य समय में, पौलुस को रोम भेज दिया गया। पौलुस ने सुसमाचार प्रचार करने के लिए रोम में जाने की इच्छा व्यक्त की थी (19:21; रोमियो 1:15; 15:23 देखे), और स्वयं परमेश्वर ने पौलुस से कहा था कि वह रोम में उनके विषय में गवाही देंगे (प्रेरितों के काम 23:11)। इस तरह से पौलुस ने अपना बचाव किया कि आखिरकार उन्हें रोम भेज दिया गया।

तीसरा, लंबे समय में, 2000 साल बाद, कई लोगों ने पौलुस की कहानी पढ़ी है और यह जानकर उत्साहित हुए कि उन्होंने भी बंदीगृह, आरोप और आलोचना का सामना किया था। मैं मानता हूँ कि इन सभी कठिनाईयों के बीच पौलुस ने आश्चर्य किया होगा कि उनमें से कितना अच्छा परिणाम मिलने वाला है। शायद से आप कभी न जाने कि, कैसे चुनौतियों के सामने परमेश्वर आपकी वफादारी का इस्तेमाल करते हैं।

प्रार्थना

परमेश्वर आपका धन्यवाद क्योंकि जब कभी हम आरोप और आलोचना का सामना करते हैं, तब आप हमारे साथ हैं। आपका धन्यवाद क्योंकि जीवन की इन सभी निराशाओं के द्वारा आप उनकी भलाई के लिए काम करते हैं जो आपसे प्रेम करते हैं और आपके उद्देश्य के अनुसार बुलाए गए हैं (रोमियो 8:28)।

जूना करार

2 राजा 12:1-14:22

योआश अपना शासन आरम्भ करता है

12योआश ने इस्राएल में येहू के राज्यकाल के सातवें वर्ष में शासन करना आरम्भ किया। योआश ने चालीस वर्ष तक यरूशलेम में शासन किया। योआश की माँ सिब्या बर्शेबा की थी। 2 योआश ने वे कार्य किये जिन्हें यहोवा ने अच्छा कहा तथा। योआश ने पूरे जीवन यहोवा की आज्ञा का पालन किया। उसने वे कार्य किये जिनकी शिक्षा याजक यहोयादा ने उसे दी थी। 3 किन्तु उसने उच्च स्थानों को नष्ट नहीं किया। लोग तब तक भी उन पूजा के स्थानों पर बलि भेंट करते तथा सुगन्धि जलाते थे।

योआश ने मन्दिर की मरम्मत का आदेश दिया

4-5 योआश ने याजकों से कहा, “यहोवा के मन्दिर में बहुत धन है। लोगों ने मन्दिर में चीज़ें दी हैं। लोगों ने गणना के समय मन्दिर का कर दिया है और लोगों ने धन इसलिये दिया है कि वे स्वत: ही देना चाहते थे। याजको, आप लोग उस धन को ले लें और यहोवा के मन्दिर की मरम्मत करवा दें। हर एक याजक उस धन का इसमें उपयोग करे जो उसे उन लोगों से मिलता है जिनकी वे सेवा करते हैं। उसे उस धन का उपयोग यहोवा के मन्दिर की टूट—फूट की मरम्मत में करना चाहिये।”

6 किन्तु याजकों ने मरम्मत नहीं की। योआश के राज्यकाल के तेईसवें वर्ष में भी याजकों ने तब तक मन्दिर की मरम्मत नहीं की थी। 7 इसलिये योआश ने याजक यहोयादा और अन्य याजकों को बुलाया। योआश ने यहोयादा और अन्य याजकों से पूछा, “आपने मन्दिर की मरम्मत क्यों नहीं की आप उन लोगों से धन लेना बन्द करें जिनकी आप सेवा करते हैं। उस धन को उपयोग में लाना बन्द करें। उस धन का उपयोग मन्दिर की मरम्मत में होना चाहिये।”

8 याजकों ने लोगों से धन न लेना स्वीकार किया। किन्तु उन्होंने मन्दिर की मरम्मत न करने का भी निश्चय किया। 9 इसलिये याजक यहोयादा ने एक सन्दूक लिया और उसके ऊपरी भाग में एक छेद कर दिया। तब यहोयादा ने सन्दूक को वेदी के दक्षिण की ओर रख दिया। यह सन्दूक उस दरवाजे के पास था जिससे लोग यहोवा के मन्दिर में आते थे। कुछ याजक मन्दिर के द्वार—पथ की रक्षा करते थे। वे याजक उस धन को, जिसे लोग यहोवा को देते थे, ले लेते थे और उस सन्दूक में डाल देते थे।

10 जब लोग मन्दिर को जाते थे तब वे उस सन्दूक में सिक्के डालते थे। जब भी राजा का सचिव और महायाजक यह जानते कि सन्दूक में बहुत धन है तो वे आते और सन्दूक से धन को निकाल लेते। वे धन को थैलों में रखते और उसे गिन लेते थे। 11 तब वे उन मजदूरों का भुगतान करते जो यहोवा के मन्दिर में काम करते थे। वे यहोवा के मन्दिर में काम करने वाले बढ़ईयों और अन्य कारीगरों का भुगतान करते थे। 12 वे धन का उपयोग पत्थर के कामगारों और पत्थर तराशों का भुगतान करने में करते थे और वे उस धन का उपयोग लकड़ी, कटे पत्थर, और यहोवा के मन्दिर की मरम्मत के लिये अन्य चीज़ों को खरीदने में करते थे।

13-14 लोगों ने यहोवा के मन्दिर के लिये धन दिया। किन्तु याजक उस धन का उपयोग चाँदी के बर्तन, बत्ती—झाड़नी, चिलमची, तुरही या कोई भी सोने—चाँदी के तश्तरियों को बनाने में नहीं कर सके। वह धन मजदूरों का भुगतान करने में लगा और उन मजदूरों ने यहोवा के मन्दिर की मरम्मत की। 15 किसी ने सारे धन का हिसाब नहीं किया या किसी कार्यकर्ता को यह बताने के लिये विवश नहीं किया गया कि धन क्या हुआ क्यों क्योंकि उन कार्यकर्ताओं पर विश्वास किया जा सकता था।

16 लोगों ने उस समय धन दिया जब उन्होंने दोषबलि या पापबलि चढ़ाई। किन्तु उस धन का उपयोग मजदूर के भुगतान के लिये नहीं किया गया। वह धन याजकों का था।

योआश हजाएल से यरूशलेम की रक्षा करता है

17 हजाएल अराम का राजा था। हजाएल गत नगर के विरुद्ध युद्ध करने गया। हजाएल ने गत को हराया। तब उसने यरूशलेम के विरुद्ध युद्ध करने जाने की योजना बनाई।

18 यहोशापात, यहोराम और अहज्याह यहूदाक के राजा रह चुके थे। वे योआश के पूर्वज थे। उन्होंने यहोवा को बहुत सी चीज़ें भेंट की थीं। वे चीज़ें मन्दिर में रखी थी। योआश ने भी बहुत सी चीज़ें यहोवा को भेंट की थी। योआश ने उन सभी विशेष चीज़ों और मन्दिर और अपने महल में रखे हुए सारे सोने को लिया। तब योआश ने उन सभी कीमती चीज़ों को अराम के राजा हजाएल के पास भेजा। इसी से हजाएल ने अपनी सेना को यरूशलेम से हटा लिया।

योआश की मृत्यु

19 योआश ने जो बड़े कार्य किये वे सभी यहूदा के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में लिखे गए हैं।

20 योआश के अधिकारियों ने उसके विरुद्ध योजना बनाई। उन्होंने योआश को सिल्ला तक जाने वाली सड़क पर स्थित मिल्लो के घर पर मार डाला। 21 शिमात का पुत्र योजाकार और शोमर का पुत्र यहोजाबाद योआश के अधिकारी थे। उन व्यक्तियों ने योआश को मार डाला।

लोगों ने दाऊद नगर में योआश को उसके पूर्वजों के साथ दफनाया। योआश का पुत्र अमस्याह उसके बाद नया राजा बना।

यहोआहाज अपना शासन आरम्भ करता है

13येहू का पुत्र यहोआहाज शोमरोन में इस्राएल का राजा बना। यह अहज्याह के पुत्र योआश के यहूदा में राज्यकाल के तेईसवें वर्ष में हुआ। यहोआहाज ने सत्रह वर्ष तक राज्य किया।

2 यहोआहाज ने वे कार्य किये जिन्हें यहोवा ने बुरा बताया था। यहोआहाज ने नबात के पुत्र यारोबाम के पापों का अनुसरण किया जिसने इस्राएल से पाप कराया। यहोआहाज ने उन कामों को करना बन्द नहीं किया। 3 तब यहोवा इस्राएल पर बहुत क्रोधित हुआ। यहोवा ने इस्राएल को अराम के राजा हजाएल और हजाएल के पुत्र बेन्हदद के अधीन कर दिया।

यहोवा ने इस्राएल के लोगों पर कृपा की

4 तब यहोआहाज ने यहोवा से सहायता के लिये प्रार्थना की और यहोवा ने उसकी प्रार्थना सुनी। यहोवा ने इस्राएल के लोगों के कष्टों और अराम के राजा के उत्पीड़न को देखा था।

5 इसलिए यहोवा ने एक व्यक्ति को इस्राएल की रक्षा के लिये भेजा। इस्राएली अरामियों से स्वतन्त्र हो गए। अतः इस्राएली, पहले की तरह अपने घर लौट गए।

6 किन्तु इस्राएलियों ने फिर भी, उस यारोबाम के परिवार के पापों को करना बन्द नहीं किया। यारोबाम ने इस्राएल से पाप करवाया, और इस्राएली निरन्तर पाप कर्म करते रहे। उन्होंने अशेरा के स्तम्भों को भी शोमरोन में रखा।

7 अराम के राजा ने यहोआहाज की सेना को पराजित किया। अराम के राजा ने सेना के अधिकांश लोगों को नष्ट कर दिया। उसने केवल पचास घुड़सवार, दस रथ, और दस हज़ार पैदल सैनिक छोड़े। यहोआहाज के सैनिक दायं चलाते समय हवा से उड़ाये गए भूसे की तरह थे।

8 सभी बड़े कार्य जो यहोआहाज ने किये इस्राएल के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में लिखे हैं। 9 यहोआहाज मरा और अपने पूर्वजों के साथ दफनाया गया। लोगों ने यहोआहाज को शोमरोन में दफनाया। यहोआहाज का पुत्र यहोआश उसके बाद नया राजा हुआ।

इस्राएल पर यहोआश का शासन

10 यहोआहाज का पुत्र यहोआश शोमरोन में इस्राएल का राजा हुआ। यह योआश के यहूदा में राज्यकाल के सैंतीसवे वर्ष में हुआ। यहोआश ने इस्राएल पर सोलह वर्ष तक राज्य किया। 11 इस्राएल के राजा यहोआश ने वे कार्य किये जिन्हें यहोवा ने बुरा बताया था। उसने नबात के पुत्र यारोबाम के पापों को बन्द नहीं किया जिसने इस्राएल से पाप कराये। यहोआश उन पापों को करता रहा। 12 सभी बड़े कार्य जो यहोआश ने किये और यहूदा के राजा अहज्याह के विरुद्ध उसने जो युद्ध किया वे इस्राएल के राजाओं के इतिहास के पुस्तक में लिखे हैं। 13 यहोआश मरा और अपने पूर्वजों के साथ दफनाया गया। यारोबाम नया राजा बना और यहोआश के राज सिंहासन पर बैठा। यहोआश शोमरोन में इस्राएल के राजाओं के साथ दफनाया गया।

यहोआश एलीशा से भेंट करता है

14 एलीशा बीमार पड़ा। बाद में एलीशा बीमारी से मर गया। इस्राएल का राजा यहोआश एलीशा से मिलने गया। यहोआश एलीशा के लिये रोया। यहोआश ने कहा, “मेरे पिता! मेरे पिता! क्या यह इस्राएल के रथों और घोड़ों के लिये समय है?”

15 एलीशा ने यहोआश से कहा, “एक धनुष और कुछ बाण लो।”

यहोआश ने एक धनुष और कुछ बाण लिये। 16 तब एलीशा ने इस्राएल के राजा से कहा, “अपना हाथ धनुष पर रखो।” यहोआश ने अपना हाथ धनुष पर रखा। तब एलीशा ने अपने हाथ राजा के हाथ पर रखे। 17 एलीशा ने कहा, “पूर्व की खिड़की खोलो।” यहोआश ने खिड़की खोली। तब एलीशा ने कहा, “बाण चलाओ।”

यहोआश ने बाण चला दिया। तब एलीशा ने कहा, “वह यहोवा के विजय का बाण है! यह अराम पर विजय का बाण है। तुम अरामियों को अपेक में हराओगे और तुम उनको नष्ट कर दोगे।”

18 एलीशा ने कहा, “बाण लो।” योआश ने बाण लिये। तब एलीशा ने इस्राएल के राजा से कहा, “भूमि पर प्रहार करो।”

योआश ने भूमि पर तीन बार प्रहार किया। तब वह रुक गाय। 19 परमेश्वर का जन(एलीशा) योआश पर क्रोधित हुआ। एलीशा ने कहा, “तुम्हें पाँच या छः बार धरती पर प्रहार करना चाहिए था। तब तुम अराम को उसे नष्ट करने तक हराते! किन्तु अब तुम अराम को केवल तीन बार हराओगे!”

एलीशा की कब्र पर एक अद्भुत बात होती है

20 एलीशा मरा और लोगों ने उसे दफनाया।

एक बार बसन्त में मोआबी सैनिकों का एक दल इस्राएल आया।वे युद्ध में सामग्री लेने आए। 21 कुछ इस्राएली एक मरे व्यक्ति को दफना रहे थे और उन्होंने सैनिकों के उस दल को देखा। इस्राएलियों ने जल्दी में शव को एलीशा की कब्र में फेंका और वे भाग खड़े हुए। ज्योंही उस मरे व्यक्ति ने एलीशा की हड्डियों का स्पर्श किया, मरा व्यक्ति जीवित हो उठा और अपने पैरों पर खड़ा हो गया।

योआश इस्राएल के नगर वापस जीतता है

22 यहोआहाज के पूरे शासन काल में अराम के राजा हजाएल ने इस्राएल को परेशान किया। 23 किन्तु यहोवा इस्राएलियों पर दयालु था। यहोवा को दया आई और वह इस्रालियों की ओर हुआ। क्यों क्योंकि इब्राहीम, इसहाक और याकूब के साथ अपनी वाचा के कारण, यहोवा इस्राएलियों को अभी नष्ट करने के लिये तैयार नहीं था। उसने अभी तक उन्हें अपने से दूर नहीं फेंका था।

24 अराम का राजा हजाएल मरा और उसके बाद बेन्हदद नया राजा बना। 25 मरने के पहले हजाएल ने योआश के पिता यहोआहाज से युद्ध में कुछ नगर लिये थे। किन्तु अब यहोआहाज ने हजाएल के पुत्र बेन्हदद से वे नगर वापस ले लिये। योआश ने बेन्हदद को तीन बार हराया और इस्राएल के नगरों को वापस लिया।

अमस्याह यहूदा में अपना शासन आरम्भ करता है

14यहूदा के राजा योआश का पुत्र अमस्याह इस्राएल के राजा यहोआहाज के पुत्र योआश के शासन काल के दूसरे वर्ष में राजा हुआ। 2 अमस्याह ने जब शासन करना आरम्भ किया, वह पच्चीस वर्ष का था। अमस्याह ने उनतीस वर्ष तक यरूशलेम में राज्य किया। अमस्याह की माँ यरूशलेम की निवासी यहोअद्दीन थी। 3 अमस्याह ने वे कार्य किये जिन्हें यहोवा ने अच्छा बताया था। किन्तु उसने अपने पूर्वज दाऊद की तरह परमेश्वर का अनुसरण पूरी तरह से नहीं किया। अमस्याह ने वे सारे काम किये जो उसके पिता योआश ने किये थे। 4 उसने उच्च स्थानों को नष्ट नहीं किया। लोग उन पूजा के स्थानों पर तब तक बलि देते और सुगन्धि जलाते थे।

5 जिस समय अमस्याह का राज्य पर दृढ़ नियन्त्रण था, उसने उन अधिकारियों को मार डाला जिन्होंने उसके पिता को मारा था। 6 किन्तु उसने हत्यारों के बच्चों को, मूसा के व्यवस्था किताब में लिखे नियमों के कारण नहीं मारा। यहोवा ने अपना यह आदेश मूसा के व्यवस्था में दिया थाः “माता—पिता बच्चों द्वारा कुछ किये जाने के कारण मारे नहीं जा सकते और बच्चे अपने माता—पिता द्वारा कुछ किये जाने के कारण मारे नहीं जा सकते। कोई व्यक्ति केवल अपने अपने ही किये बुरे कार्य के लिये मारा जा सकता है।”

7 अमस्याह ने नमक घाटी में दस हज़ार एदोमियों को मार डाला। युद्ध में अमस्याह ने सेला को जीता और उसका नाम योक्तेल रखा। वह स्थान आज भी योक्तेल कहा जाता है।

अमस्याह योआश के विरुद्ध युद्ध छेड़ना चाहता है

8 अमस्याह ने इस्राएल के राजा येहू के पुत्र यहोआहाज के पुत्र योआश के पास सन्देशवाहक भेजा। अमस्याह के सन्देश में कहा गया, “आओ, हम परस्पर युद्ध करें। आमने सामने होकर एक दूसरे का मुकाबला करें।”

9 इस्राएल के राजा योआश ने यहूदा के राजा अमस्याह को उत्तर भेजा। योआश ने कहा, “लबानोन की एक कटीली झाड़ी ने लबानोन के देवदारु पेड़ के पास एक सन्देश भेजा। सन्देश यह था, ‘अपनी पुत्री, मेरे पुत्र के साथ विवाह के लिये दो।’ किन्तु लबानोन का एक जंगली जानवर उधर से निकला और कटीली झाड़ी को कुचल गया। 10 यह सत्य है कि तुमने एदोम को हराया है। किन्तु तुम एदोम पर विजय के कारण घमण्डी हो गए हो। अपनी प्रसिद्धि का आनन्द उठाओ तथा घर पर रहो। अपने लिये परेशानियाँ मत मोल लो। यदि तुम ऐसा करोगे तुम गिर जाओगे और तुम्हारे साथ यहूदा भी गिरेगा!”

11 किन्तु अमस्याह ने योआश की चेतावनी अनसुनी कर दी। अतः इस्राएल का राजा योआश यहूदा के राजा अमस्याह के विरुद्ध उसके ही नगर बेतशेमेश में लड़ने गया। 12 इस्राएल ने यहूदा को पराजित किया। यहूदा का हर एक आदमी घर भाग गया। 13 बेतशेमेश में इस्राएल के राजा योआश ने अहज्याह के पौत्र व योआश के पुत्र यहूदा के राजा अमस्याह को बन्दी बना लिया। योआश अमस्याह को यरूशलेम ले गया। योआश ने एप्रैम द्वार से कोने के फाटक तक लगभग छः सौ फुट यरूशलेम की दीवार को गिरवाया। 14 तब योआश ने सारा सोना—चाँदी और जो भी बर्तन यहोवा के मन्दिर और राजमहल के खजाने में थे, उन सब को लूट लिया। योआश ने कुछ लोगों को बन्दी बना लिया। तब वह शोमरोन को वापस लौट गया।

15 जो सभी बड़े कार्य योआश ने किये, साथ ही साथ यहूदा के राजा अमस्याह के साथ वह कैसे लड़ा, इस्राएल के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में लिखे गए हैं। 16 योआश मरा और अपने पूर्वजों के साथ दफनाया गया। योआश शोमरोन में इस्राएल के राजाओं के साथ दफनाया गया। योआश का पुत्र यारोबाम उसके बाद नया राजा हुआ।

अमस्याह की मृत्यु

17 यहूदा के राजा योआश का पुत्र अमस्याह इस्राएल के राजा यहोआहाज के पुत्र योआश की मृत्यु के बाद पन्द्रह वर्ष तक जीवित रहा। 18 अमस्याह ने जो बड़े काम किये वे यहूदा के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में लिखे गए हैं। 19 लोगों ने यरूशलेम में अमस्याह के विरुद्ध एक योजना बनाई। अमस्याह लाकीश को भाग निकला। किन्तु लोगों ने अमस्याह के विरुद्ध लाकीश को अपने आदमी भेजे और उन लोगों ने लाकीश में अमस्याह को मार डाला। 20 लोग घोड़ों पर अमस्याह के शव को वापस ले आए। अमस्याह दाऊद नगर में अपने पूर्वजों के साथ यरूशलेम में दफनाया गया।

अजर्याह यहूदा पर अपना शासन आरम्भ करता है

21 तब यहूदा के सभी लोगों ने अजर्याह को नया राजा बनाया। अजर्याह सोलह वर्ष का था। 22 इस प्रकार अमस्याह मरा और अपने पूर्वजों के साथ दफनाया गया। तब अजर्याह ने एलत को फिर बनाया और इसे यहूदा को वापस दे दिया।

समीक्षा

हर उस अवसर का लाभ लें जो परमेश्वर आपको देते हैं

इस्राएल और यहूदा के राजाओं के निराश करने वाले इतिहास के बीच में, एलीशा के जीवन में एक घटना घटती है जो हमें उत्साहित करती है कि हर उस अवसर का लाभ लें जो परमेश्वर हमें देते हैं, और निरंतर बने रहे और कभी हार न माने।

लीडर्स एक मिश्रित बैग है। कुछ 'परमेश्वर की नजरों में बुरा करते हैं' (13:2,11)। कुछ 'परमेश्वर की नजरों में सही करते हैं' (14:3)।

परमेश्वर असाधारण रूप से अनुग्रही हैं और जब यहोआहाज, जिसने परमेश्वर की नजरों में बुरा किया था, 'यहोवा के सामने गिड़गिड़ाया...और यहोवा ने उसकी सुन ली' (13:4)। जब कभी आप परमेश्वर से विनती करते हैं तब वह आपकी बातें सुनते हैं।

इस्राएल के लीडर्स की इस सूची में, योआश शायद से सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। उसने वह किया जो 'परमेश्वर की नजरों में सही था' (12:2), यहाँ तक कि यदि यह उसके राज्य करने का केवल एक भाग था।

योआश ने एक ईमारत बनाने का कार्य लिया। बहुत से कामों की तरह, इसमें उनकी अपेक्षा से अधिक समय लगाः'याजकों ने भवन में जो टूटा-फूटा था, उसे योआश राजा के तेईसवें वर्ष तक नहीं सुधारा था' (व.6)। राजा एक सभा बुलाते हैं और पूछते हैं, 'भवन में जो कुछ टूटा-फूटा है, उसे तुम क्यों नहीं सुधारते?' (व.7)।

वे काम करना शुरु करते हैं। वे पैसे को जमा करते हैं जिसकी उन्हें आवश्यकता है (व.11)। उन सभी ने पूर्ण ईमानदारी के साथ काम किया (व.15) और उन्नति हुई।

निश्चित ही, आज परमेश्वर का मंदिर अब एक भौतिक ईमारत नहीं है लेकिन परमेश्वर के लोग हैं। हमारे पैसे और प्रयास को परमेश्वर के लोगों को बढ़ाने में लगना चाहिए –संख्या में (सुसमाचार का प्रचार करना), वयस्क बनाने में (चेला बनाने में) और समुदाय की देशभाल में (सामाजिक बदलाव)। किंतु, कभी कभी हमें इसके लिए ईमारत की आवश्यकता पड़ती है और जब आवश्यक होता है, तब चर्च की आंतरिक संरचना पर पैसा खर्च करना गलत बात ही है।

ईमारतों की चुनौतियों के साथ-साथ, परमेश्वर के लोगों ने लड़ाईयों की चुनौती का सामना किया। विशेषरूप से, इस लेखांश में हम देखते हैं कि कैसे उन्हें अराम का सामना करना पड़ा। एलीशा इस्राएल के राजा से कहते हैं, 'एक धनुष और कुछ तीर लो...तीर लो...भूमि पर मारो' (13:15-18)। राजा ने 'तीन बार मारा और वह रूक गए' (व.18क)। एलीशा ने कहा, 'तुझे तो पाँच छह बार मारना चाहिये था, ऐसा करने से तू अराम को यहाँ तक मारता कि उनका अंत कर डालता, परंतु अब तू उन्हें तीन ही बार मारेगा' (व.19)।

मुझे याद है जब 1999 में इन वचनों को मैं पढ़ रहा था, 1998 में प्रथम अल्फा सभा के बाद, देश को अल्फा में बुलाते हुए कि आकर यीशु के विषय में सुसमाचार को सुनें। हम आश्चर्य कर रहे थे कि दूसरी सभा लेनी है या नहीं या दूसरे वर्ष का इंतजार करना है या इसी तरह से। जैसे ही मैंने इन वचनों को पढ़ा मैंने समझ लिया कि हमें निरंतर भूमि पर मारने की आवश्यकता है।

आज आप जिस किसी चुनौती का सामना कर रहे हैं, निरंतर प्रार्थना करते रहे, भरोसा करते रहे, परमेश्वर की सेवा करने के लिए अवसर ढूंढ़ते रहे और कभी हार न मानें!

प्रार्थना

परमेश्वर, जैसे ही हम आने वाले समय में चुनौतियों का सामना करते हैं, हमें दृढ़संकल्प दीजिए कि हार न मानें परंतु बने रहे और अंत तक बने रहें।

पिप्पा भी कहते है

2 राजाओं 12:18

योआश ने अराम के राजा हजाएल को खरीद लिया, जो उसपर प्रहार करने ही वाला था – उसे मंदिर के सभी खजाने देने के द्वारा।

कभी कभी, किसी क्रोधित व्यक्ति के पास एक उपहार भेजना अच्छा काम करता है।

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संदर्भ

सी.एस. लेविस, मसीहत,(विलियम कॉलिन, 2012) पी.पी.140-141

जॉन एफ. केनेडि,

एड्रेस ऑफ सेनटर जॉन एफ केनेडि एक्सेप्टिंग द डेमोक्रेटिक पार्टी नॉमिनेशन फॉर द प्रेसिडेंसी ऑफ द युनायटे स्टेट्स – मेमोरियल कोलिसम, लॉस ऐंजेलेस, जुलाई 15,1960

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