दिन 214

आशाहीन समाप्ति या अनंत आशा?

बुद्धि भजन संहिता 89:46-52
नए करार रोमियों 14:19-15:13
जूना करार 1 इतिहास 11:1-12:22

परिचय

इक्कीस वर्षीय मैथ्यु तीन साल से बेघर थे। मार्क रूसेल (जो चर्च सेना के प्रमुख के रूप में नियुक्त किए गए थे, वे केवल बीस वर्ष के थे) वह उनसे लंदन के चेअरिंग क्रॉस की सड़क पर मिले, उन्हें कुछ भोजन दिया और उन्हें मसीह में ले आए।

जैसे ही वह वहाँ से जाने के लिए खड़े हुए, उन्होंने कहा, “मैथ्यु, अगले महीने मैं मंच पर से हजारों लोगों से बातें करुंगा। तुम क्या चाहते हो कि मैं आज इंग्लैंड के चर्च को कौन सी सलाह दूँ?”

मैथ्यु ने जवाब दिया, “चर्च का काम है वाद-विवाद करना बंद करें और लोगों को आशा दें।”

मार्क रूशेल ने कहा, “मैंने कभी भी एक बेहतर परिभाषा नहीं सुनी है कि हमें क्या करना चाहिएः क्या हमारे पास आशा का एक सुसमाचार नहीं है? एक सुसमाचार जो आशा लाता है? जीवन का एक सुसमाचार, बदलाव का एक सुसमाचार और अनंत जीवन की एक आशा, यीशु की आशा।” बहुत से लोग केवल आशाहीन अंत को देखते हैं; लेकिन यीशु के साथ आप एक अनंत आशा का आनंद ले सकते हैं।

आशा तीन महान सिद्धांतवाले गुणों में से एक है –दूसरा है प्रेम और विश्वास। जैसा कि रेनियरो कॅन्टालमेसा लिखते हैं, “वे तीन बहनों की तरह हैं। उनमें से दो बड़ी हो चुकी हैं और दूसरी एक छोटी बच्ची है। वे दोनों हाथ थामें साथ-साथ चलती हैं और बच्ची आशा बीच में चलती है। उन्हें देखने से ऐसा लगता है कि बड़ी वाली बच्चें को खींच रही है, लेकिन यह उल्टा है; यह छोटी लड़की है जो दो बड़ी बहनों को खींच रही है। आशा, विश्वास और प्रेम को खींचती है। आशा के बिना सब कुछ रूक जाता है।”

बुद्धि

भजन संहिता 89:46-52

46 हे यहोवा, तू हमसे क्या सदा छिपा रहेगा
 क्या तेरा क्रोध सदा आग सा धधकेगा
47 याद कर मेरा जीवन कितना छोटा है।
 तूने ही हमें छोटा जीवन जीने और फिर मर जाने को रचा है।
48 ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो सदा जीवित रहेगा और कभी मरेगा नहीं।
 कब्र से कोई व्यक्ति बच नहीं पाया। 49 हे परमेश्वर, वह प्रेम कहाँ है जो तूने अतीत में दिखाया था
 तूने दाऊद को वचन दिया था कि तू उसके वंश पर सदा अनुग्रह करेगा।
50-51 हे स्वामी, कृपा करके याद कर कि लोगों ने तेरे सेवकों को कैसे अपमानित किया।
 हे यहोवा, मुझको सारे अपमान सुनने पड़े हैं।
 तेरे चुने हुए राजा को उन्होंने अपमानित किया।

52 यहोवा, सदा ही धन्य है!
आमीन, आमीन!

समीक्षा

यीशु के द्वारा अनंत जीवन की आशा को जाने

“आशा के बिना जीना ऐसा है जैसे जीना बंद कर देना, “ योडर डोस्टोस्की ने लिखा। “जो ऑक्सीजन फेफड़ों के लिए है, वही आशा जीवन के अर्थ के लिए है, “ एमिल ब्रुनर ने लिखा।

इस भजन के अंत में आशा का एक उद्घोष है, “यहोवा सर्वदा धन्य रहेगा। आमीन फिर आमीन।” (व.52)। भजनसंहिता के लेखक आशा को पकड़े रखते हैं इस तथ्य के बावजूद कि वह अपनी ही स्थिति से लड़ रहे हैं।

  1. कष्ट और उदासी के बीच में आशा
  • ”हे यहोवा कब तक?” (व.46अ) यह एक शडंब्दाबर प्रश्न है। यह उदासी की एक पुकार है। क्या यह कष्ट सर्वदा चलता रहेगा?
  1. जीवन की संक्षिप्तता और मृत्यु की अपरिहार्यता के बावजूद आशा
  • जीवन बहुत छोटा हैः”मेरा स्मरण कर कि मैं कैसा अनित्य हूँ” (व.47अ)। यदि मृत्यु अंत है तो कोई अर्थ या उद्देश्य नहीं है। “तू ने सब मनुष्यों को क्यों व्यर्थ सिरजा है” (व.47ब)। कोई भी अपने आपको मृत्यु में से जीवित नहीं कर सकता हैः”कौन पुरुष सदा अमर रहेगा? क्या कोई अपने प्राण को अधोलोक से बचा सकता है?” (व.48)।

लेकिन भजनसंहिता के लेखक पुनरुत्थान की आशा को छोड़ते नहीं हैं। वह जानते हैं कि मनुष्य अपने आपको नहीं बचा सकते हैं। वह परमेश्वर की ओर देखते हैं: “हे प्रभु, तेरी प्राचीनकाल की करुणा कहाँ रही, जिसके विषय में तू ने अपनी सच्चाई की शपथ दाऊद से खाई थी” (वव.49-51)। जिसे भजनसंहिता के लेखक ने केवल धुँधली रूपरेखा में देखा, वह नये नियम में पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया गया है।

प्रार्थना

परमेश्वर आपका धन्यवाद क्योंकि मृत्यु में से यीशु मसीह के पुनरुत्थान के द्वारा आपने हमें एक जीवित आशा दी है, हमें एक उत्तराधिकार में ला दिया है जो कभी नष्ट नहीं हो सकती, खराब नहीं हो सकती या लुप्त नहीं हो सकती” (1पतरस 1:3-4)।

नए करार

रोमियों 14:19-15:13

19 इसलिए, उन बातों में लगें जो शांति को बढ़ाती हैं और जिनसे एक दूसरे को आत्मिक बढ़ोतरी में सहायता मिलती है। 20 भोजन के लिये परमेश्वर के काम को मत बिगाड़ो। हर तरह का भोजन पवित्र है किन्तु किसी भी व्यक्ति के लिये वह कुछ भी खाना ठीक नहीं है जो किसी और भाई को पाप के रास्ते पर ले जाये। 21 माँस नहीं खाना श्रेष्ठ है, शराब नहीं पीना अच्छा है और कुछ भी ऐसा नहीं करना उत्तम है जो तेरे भाई को पाप में ढकेलता हो।

22 अपने विश्वास को परमेश्वर और अपने बीच ही रख। वह धन्य है जो जिसे उत्तम समझता है, उसके लिए अपने को दोषी नहीं पाता। 23 किन्तु यदि कोई ऐसी वस्तु को खाता है, जिसके खाने के प्रति वह आश्वस्त नहीं है तो वह दोषी ठहरता है। क्योंकि उसका खाना उसके विश्वास के अनुसार नहीं है और वह सब कुछ जो विश्वास पर नहीं टिका है, पाप है।

15हम जो आत्मिक रूप से शक्तिशाली हैं, उन्हें उनकी दुर्बलता सहनी चाहिये जो शक्तिशाली नहीं हैं। हम बस अपने आपको ही प्रसन्न न करें। 2 हम में से हर एक, दूसरों की अच्छाइयों के लिए इस भावना के साथ कि उनकी आत्मिक बढ़ोतरी हो, उन्हें प्रसन्न करे। 3 यहाँ तक कि मसीह ने भी स्वयं को प्रसन्न नहीं किया था। बल्कि जैसा कि मसीह के बारे में शास्त्र कहता है: “उनका अपमान जिन्होंने तेरा अपमान किया है, मुझ पर आ पड़ा है।” 4 हर वह बात जो शास्त्रों में पहले लिखी गयी, हमें शिक्षा देने के लिए थी ताकि जो धीरज और बढ़ावा शास्त्रों से मिलता है, हम उससे आशा प्राप्त करें। 5 और समूचे धीरज और बढ़ावे का स्रोत परमेश्वर तुम्हें वरदान दे कि तुम लोग एक दूसरे के साथ यीशु मसीह के उदाहरण पर चलते हुए आपस में मिल जुल कर रहो।

6 ताकि तुम सब एक साथ एक स्वर से हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमपिता, परमेश्वर को महिमा प्रदान करो। 7 इसलिए एक दूसरे को अपनाओ जैसे तुम्हें मसीह ने अपनाया। यह परमेश्वर की महिमा के लिए करो। 8 मैं तुम लोगों को बताता हूँ कि यह प्रकट करने को कि परमेश्वर विश्वसनीय है उनके पुरखों को दिये गए परमेश्वर के वचन को दृढ़ करने को मसीह यहूदियों का सेवक बना। 9 ताकि ग़ैर यहूदी लोग भी परमेश्वर को उसकी करुणा के लिए महिमा प्रदान करें। शास्त्र कहता है:

“इसलिये ग़ैर यहूदियों के बीच
तुझे पहचानूँगा और तेरे नाम की महिमा गाऊँगा।”

10 और यह भी कहा गया है,

“हे ग़ैर यहूदियो, परमेश्वर के चुने हुए लोगों के साथ प्रसन्न रहो।”

11 और फिर शास्त्र यह भी कहता है,

“हे ग़ैर यहूदी लोगो, तुम प्रभु की स्तुति करो।
और सभी जातियो, परमेश्वर की स्तुति करो।”

12 और फिर यशायाह भी कहता है,

“यिशै का एक वंशज प्रकट होगा
जो ग़ैर यहूदियों के शासक के रूप में उभरेगा।
ग़ैर यहूदी उस पर अपनी आशा लगाएँगे।”

13 सभी आशाओं का स्रोत परमेश्वर, तुम्हें सम्पूर्ण आनन्द और शांति से भर दे जैसा कि उसमें तुम्हारा विश्वास है। ताकि पवित्र आत्मा की शक्ति से तुम आशा से भरपूर हो जाओ।

समीक्षा

पवित्र आत्मा के द्वारा आशा के साथ प्रवाहित होईये

विश्वास हमारे जीवन में आशा, आनंद और शांति को मुक्त करता है। संदेह हमारे आनंद और शांति को चुरा लेता है। विश्वास का अर्थ है “आशा के परमेश्वर” पर भरोसा करना। पौलुस प्रार्थना करते हैं, “ परमेश्वर जो आशा के दाता हैं तुम्हें विश्वास करने में सब प्रकार के आनन्द और शान्ति से परिपूर्ण करें, कि पवित्र आत्मा की सामर्थ से तुम्हारी आशा बढ़ती जाए” (15:13)।

आशा का उद्गम “आशा के परमेश्वर हैं।” आशा के कारण हैं यीशु। आपमें आशा का स्त्रोत हैं पवित्र आत्मा। यह आशा आशावादी सोच नहीं है। यह उस पर आधारित है कि परमेश्वर ने हमारे लिए क्या किया है और हमारे अंदर क्या कर रहे हैं।

यह आशा हमारे दैनिक जीवन के लिए प्रेरणा का बल है। जैसा कि एर्विन मॅकमेनस बताते हैं, आशा “ हमारी असफलताओं, हमारे दर्द और हमारे डर के मलबे से बाहर निकालती है, उस चीज के ऊपर उठने के लिए जो कभी ऐसी लगती थी कि इसे जीता नहीं जा सकता है। सहने, डटे रहने, जीतने की हमारी योग्यता को इस मासूम दिखने वाली सामग्री से ईंधन मिलता है, वह है आशा।”

संपूर्ण विश्व के लिए आशा यीशु में है। वह इस्राएल के लिए आशा हैं। वह हम सभी के लिए भी आशा हैं। इसे साबित करने के लिए पौलुस पुराने नियम में से बहुत से लेखांशो को दोहराते हैं, यशायाह की भविष्यवाणी के वचनों को लेते हुए कि यीशु “ उठेगा, उस पर अन्यजातियाँ आशा रखेंगी” (व.12, एम.एस.जी)।

पौलुस आशा के विभिन्न पहलुओं को देखने में हमारी सहायता करते हैं जो आज यीशु विश्व में लाते हैं, जिनमें यें भी शामिल हैं:

  1. एकता के लिए आशा

अ.पौलुस निरंतर विनती करते हैं कि हर प्रयास एकता के लिए किया जाता हैः “ इसलिये हम उन बातों में लगे रहें जिनसे मेल – मिलाप और एक दूसरे का सुधार हो” (14:19)। मसीह में अपने भाईयों और बहनों के प्रति संवेदनशील होने के द्वारा इस एकता को सुरक्षित रखें और अनावश्यक रूप से उन्हें ठोकर मत मारो (14:20-15:1)। “ हम में से हर एक अपने पड़ोसी को उनकी भलाई के लिये प्रसन्न करे कि उनकी उन्नति हो” (व.2)।

ब. यीशु के उदाहरण के पीछे चलिए “ क्योंकि मसीह ने अपने आप को प्रसन्न नहीं किया” (व.3)। यीशु की तरह, परमेश्वर को प्रसन्न कीजिए, नाकि अपने आपको प्रसन्न कीजिए या लोगों को प्रसन्न कीजिए। लोगों को प्रसन्न करने वाले वे लोग हैं जो लोगों को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं यहाँ तक कि यदि इसे करने के लिए उन्हें अपने विवेक से समझौता करना पड़ता है। पौलुस ने लोगों को प्रसन्न रखने की कोशिश की, जब कि उन्हें प्रसन्न रखने के कारण उन्होंने परमेश्वर को अप्रसन्न नहीं किया (गलातियों 1:10; 1कुरिंथियो 10:33)।

  1. वचनो से आशा

अ. बाईबल का उद्देश्य है कि हमें आशा दें। “ जितनी बातें पहले से लिखी गई, वे हमारी ही शिक्षा के लिये लिखी गई हैं कि हम धीरज और पवित्रशास्त्र के प्रोत्साहन द्वारा आशा रखें” (रोमियो 15:4)। वचनो के द्वारा आप यीशु और उस आशा के विषय में जानते हैं जो कि उनमें हैं। अपनी आशा को जगाये रखने का तरीका है नियमित रूप से वचनो का अध्ययन करना।

यह आशा “पूर्ण आनंद और शांति को लाती है जैसे ही आप उनमें भरोसा करते हैं” (व.13)। मुझे पसंद है जिस तरह से कोरी टेन बून इसे बताते हैं:”आनंद और शांति का अर्थ है अपने चेहरे पर मुस्कान और एक खाली सूटकेस के साथ जाना।”

प्रार्थना

परमेश्वर आपका धन्यवाद क्योंकि जैसे ही आपने यीशु को मृत्यु में से जीवित किया, एक दिन आप मुझे उनके साथ पूर्ण और अनंत जीवन के लिए जिलाएंगे। होने दीजिए कि पवित्र आत्मा मुझे इतना भर दें कि मैं आशा से उमड़ने लगूं।

जूना करार

1 इतिहास 11:1-12:22

दाऊद इस्राएल का राजा होता है

11इस्राएल के सभी लोग हेब्रोन नगर में दाऊद के पास आए। उन्होंने दाऊद से कहा, “हम तुम्हारे ही रक्त माँस हैं। 2 अतीत में, तुमने युद्ध में हमारा संचालन किया। तुमने हमारा तब भी संचालन किया जब शाऊल राजा था। हे दाऊद, यहोवा ने तुझ से कहा, तुम मेरे लोगों अर्थात् इस्राएल के लोगों के गड़रिया हो। तूम मेरे लोगों के ऊपर शासक होगे।”

3 इस्राएल के सभी प्रमुख दाऊद के पास हेब्रोन नगर में आए। दाऊद ने हेब्रोन में उन प्रमुखों के साथ यहोवा के सामने एक वाचा की। प्रमुखों ने दाऊद का अभिषेक किया। इस प्रकार उसे इस्राएल का राजा बनाया गया। यहोवा ने वचन दिया था कि यह होगा। यहोवा ने शमूएल का उपयोग यह वचन देने के लिये किया था।

दाऊद यरूशलेम पर अधिकार करता है

4 दाऊद और इस्राएल के सभी लोग यरूशलेम नगर को गए। यरूशलेम उन दिनों यबूस कहा जाता था। उस नगर में रहने वाले लोग यबूसी कहे जाते थे। 5 उस नगर के निवासियों ने दाऊद से कहा, “तुम हमारे नगर के भीतर प्रवेश नहीं कर सकते।” किन्तु दाऊद ने उन लोगों को पराजित कर दिया। दाऊद ने सिय्योन के किले पर अधिकार कर लिया। यह स्थान “दाऊद नगर” बना।

6 दाऊद ने कहा, “वह व्यक्ति जो यबूसी लोगों पर आक्रमण का संचालन करेगा, मेरी पूरी सेना का सेनापति होगा।” अतः योआब ने आक्रमण का संचालन किया। योआब सरूयाह का पुत्र था। योआब सेना का सेनापति हो गया।

7 तब दाऊद ने किले में अपना महल बनाया। यही कारण है उसका नाम दाऊद नगर पड़ा। 8 दाऊद ने किले के चारों ओर नगर बसाया। उसने इसे मिल्लो से नगर के चारों ओर की दीवार तक बसाया। योआब ने नगर के अन्य भागों की मरम्मत की। 9 दाऊद महान बनता गया। सर्वशक्तिमान यहोवा उसके साथ था।

दाऊद के विशिष्ठ वीर

10 दाऊद के विशिष्ठ वीरों के ऊपर के प्रमुखों की यह सूची हैः ये वीर दाऊद के साथ उसके राज्य में बहुत शक्तिशाली बन गये। उन्होंने और इस्राएल के सभी लोगों ने दाऊद की सहायाता की और उसे राजा बनाया। यह ठीक वैसा ही हुआ जैसा परमेश्वर ने वचन दिया था।

11 यह दाऊद के विशिष्ठ वीरों की सूची हैः

यशोबाम हक्मोनी लोगों में से था। यशोबाम रथ अधिकारियों का प्रमुख था। यशोबाम ने अपने भाले का उपयोग तीन सौ व्यक्तियों से युद्ध करने के लिये किया। उसने एक ही बार में उन तीन सौ व्यक्तियों को मार डाला

12 एलीआजार दाऊद के विशिष्ठ वीरों में दूसरा था। एलीआजार दोदो का पुत्र था। दोदो अहोही से था। एलीआजार तीन वीरों में से एक था। 13 एलीआजर पसदम्मीम में दाऊद के साथ था। पलिश्ती लोग उस स्थान पर युद्ध करने आये। उस स्थान पर एक जौ से भरा खेत था। वही स्थान, जहाँ इस्राएली लोग पलिश्ती लोगों से भागे थे। 14 किन्तु वे तीन वीर उस खेत के बीच रुक गए थे और पलिश्तियों से लड़े तथा उन्हें हरा डाला था और इस प्रकार यहोवा ने इस्राएलियों को बड़ी विजय दी थी।

15 एक बार, दाऊद अदुल्लाम गुफा के पास था और पलिश्ती सेना नीचे रपाईम की घाटी में थी। तीस वीरों में से तीन वीर उस गुफा तक, लगातार रेंगते हुए दाऊद के पास पहुँचे।

16 अन्य अवसर पर, दाऊद किले में था, और पलिश्ती सेना का एक समूह बेतलेहेम में था। 17 दाऊद प्यासा था। अतः उसने कहा, “मैं चाहता हूँ कि मुझे कोई थोड़ा पानी बेतलेहेम में नगर द्वार के पास के कुएँ से दे।” दाऊद सचमुच यह नहीं चाहता था। वह केवल बात कर रहा था। 18 तब तीन वीरों ने पलिश्ती सेना के बीच से युद्ध करते हुए अपना रास्ता बनाया और नगर—द्वार के निकट बेतलेहेम के कुएँ से पानी लिया। तीनों वीर दाऊद के पास पानी ले गए। किन्तु दाऊद ने पानी पीने से इन्कार कर दिया। उसने पानी को यहोवा के नाम पर अर्पण कर, उण्डेल दिया। 19 दाऊद ने कहा, “परमेश्वर, मैं इस पानी को नहीं पी सकता। इन व्यक्तियों ने मेरे लिये इस पानी को लाने में अपने जीवन को खतरे में डाला। अतः यदि मैं इस पानी को पीता हूँ तो यह उनका खून पीने के समान होगा।” इसलिये दाऊद ने उस जल को पीने से इन्कार किया। तीनों वीरों ने उस तरह के बहुत से वीरता के काम किये।

अन्य वीर योद्धा

20 योआब का भाई, अबीशै, तीन वीरों का प्रमुख था। वह अपने भाले से तीन सौ व्यक्तियों से लड़ा और उन्हें मार डाला। अबीशै तीन वीरों की तरह प्रसिद्ध हो गाया। 21 अबीशै तीस विरों से अधिक प्रसिद्ध था। वह उनका प्रमुख हो गया, यद्यपि वह तीन प्रमुख वीरों में से नहीं था।

22 यहोयादा का पुत्र बनायाह, कबजेल का एक वीर योद्धा था। बनायाह ने बड़े पराक्रम किये। उसने मोआब देश के दो सर्वोत्तम व्यक्तियों को मार डाला। वह जमीन के अन्दर एक माँद में घुसा और वहाँ एक शेर को भी मार डाला। वह उस दिन हुआ जब बर्फ गिर रही थी। 23 बनायाह ने मिस्र के एक व्यक्ति को मार डाला। वह व्यक्ति लगभग पाँच हाथ ऊँचा था। उस मिस्र के पुरुष के पास एक बहुत बड़ा और भारी भाला था। यह बुनकर के करघे के विशाल डण्डे के समान था और बनायाह के पास केवल एक लाठी थी। किन्तु बनायाह ने मिस्री से भाला छीन लिया। बनायाह ने मिस्री के अपने भाले का उपयोग किया और उसे मार डाला। 24 ये कार्य थे जिन्हें योहयादा के पुत्र बनायह ने किये। बनायाह तीन वीरों की तरह प्रसिद्ध हुआ। 25 बनायाह तीस वीरों में सबसे अधिक प्रसिद्ध था, किन्तु वह तीन प्रमुख वीरों में सम्मिलित नहीं किया गया। दाऊद ने बनायाह को अपने अंगरक्षकों का प्रमुख चुना।

तीस वीर

26 बलिष्ठ वीर (तीस वीर) ये थेः

असाहेल, योआब का भाई,

एल्हानान, दोदो का पुत्र एल्हानान बेतलेहेम नगर का थाः

27 हरोरी लोगों में से शम्मोत,

पलोनी लोगों में से हेलेस;

28 इक्केश का पुत्र, ईरा, ईरा तकोई नगर का था,

अनातोत नगर का अबीएजेर;

29 होसाती लोगों में से सिब्बके,

अहोही से ईलै,

30 नतोपाई लोगों में से महरै;

बाना का पुत्र हेलेद नतोपाई लोगों में से था;

31 रीबै का पुत्र इतै, इतै बिन्यामीन के गिबा नगर से था,

पिरातोनी लोगों में से बनायाह;

32 गाश घाटीयों से हूरै;

अराबा लोगों में से अबीएल,

33 बहूरीमी लोगों में से अजमावेत;

शल्बोनी लोगों में से एल्याबा;

34 हाशेम के पुत्र गीजोई हाशेम लोगों में से था;

शागे का पुत्र योनातान, योनातान हरारी लोगों मे से था;

35 सकार का पुत्र अहीआम, अहीआम हरारी लोगों में से था;

ऊर का पुत्र एलीपाल;

36 मेकराई लोगों में से हेपेर;

पलोनी लोगों में से अहिय्याह;

37 कर्मेली लोगों में से हेस्रो,

एज्बै का पुत्र नारै;

38 नातान का भाई योएल;

हग्री का पुत्र मिभार;

39 अम्मोनी लोगों में से सेलेक,

बेरोती नहरै (नहरै योआब का कवचवाहक था। योआब सरूयाह का पुत्र था)

40 येतेरी लोगों में से ईरा;

इथ्री लोगों में से गारेब;

41 हित्ती लोगों में से ऊरिय्याह;

अहलै का पुत्र जाबाद;

42 शीजा का पुत्र अदीना, शीजा रूबेन के परिवार समूह से था (अदीना रूबेन के परिवार समूह का प्रमुख था। परन्तु वह भी अपने साथ के तीस वीरों में से एक था।)

43 माका का पुत्र हानान;

मेतेनी लोगों में से योशापात;

44 अशतारोती लोगों में से उज्जिय्याह;

होताम के पुत्र शामा और यीएल, होताम अरोएरी लोगों में से था;

45 शिम्री का पुत्र यदीएल;

तीसी लोगों से योहा, योहा यदीएल का भाई था;

46 महवीमी लोगों में से एलीएल;

एलनाम के पुत्र यरीबै और योशव्याह;

मोआबी लोगों में से यित्मा;

47 मसोबाई लोगों में से एलीएल; ओबेद; और यासीएल।

वे वीर पुरुष जो दाऊद के साथ हुए

12यह उन पुरुषों की सूची है जो दाऊद के पास आए। जब दाऊद सिकलग नगर में था। दाऊद तब भी कीश के पुत्र शाऊल से अपने को छिपा रहा था। इन पुरुषों ने दाऊद को युद्ध में सहायता दी थी। 2 ये व्यक्ति अपने दायें या बायें हाथ से धनुष से बाण द्वारा बेध सकते थे। अपनी गुलेल से दायें या बांये हाथ से पत्थर फेंक सकते थे। वे बिन्यामीन परिवार समूह के शाऊल के सम्बन्धी थे। उनके नाम ये थेः

3 उनका प्रमुख अहीएजेर और योआज (अहीएजेर और योआज शमाआ के पुत्र थे।) शमाआ गिबावासी लोगों में से था। यजीएल और पेलेत (यजीएल और पेलेत अजमावेत के पुत्र थे।), अनातोती नगर के बराका और येहू। 4 गिबोनी नगर का यिशमायाह; (यिशमायाह तीनों वीरों के साथ एक वीर था और वह तीन वीरों का प्रमुख भी था।); गदेरा लोगों में से यिर्मयाह, यहजीएल, योहानान और योजाबाद; 5 एलूजै, यरीमोत बाल्याह, और शमर्याह; हारुपी से शपत्याह; 6 कोरह परिवार समूह से एल्काना, यिशिय्याह; अजरेल, योएजेर और याशोबाम सभी; 7 गदोर नगर से यरोहाम के पुत्र योएला और जबद्याह।

गादी लोग

8 गाद के परिवार समूह का एक भाग मरुभूमि में दाऊद से उसके किले में आ मिला। वे युद्ध के लिये प्रशिक्षित सैनिक थे। वे भाले और ढाल के उपयोग में कुशल थे। वे सिंह की तरह भयानक दिखते थे और वे हिरन की तरह पहाड़ों में दौड़ सकते थे।

9 गाद के परिवार समूह की सेना का प्रमुख एजेर था। ओबद्याह अधिकार में दूसरा था। एलीआब अधिकार में तीसरा था। 10 मिश्मन्ना अधिकार में चौथा था। यिर्मयाह अधिकार में पाँचवाँ था। 11 अत्तै अधिकार में छठा था। एलीएल अधिकार में सातवाँ था। 12 योहानान अधिकार में आठवाँ था। एलजाबाद अधिकार में नवाँ था। 13 यिर्मयाह अधिकार में दसवाँ था। मकबन्नै अधिकार में ग्यारहवाँ था।

14 वे लोग गादी सेना के प्रमुख थे। उस समूह का सबसे कमजोर सैनिक भी शत्रु के सौ सेनिकों से युद्ध कर सकता था। उस समूह का सर्वाधिक बलिष्ठ सैनिक शत्रु के एक हजार सैनिकों से युद्ध कर सकता था। 15 गाद के परिवार समूह के वे सैनिक थे जो वर्ष पहले महीने में यरदन के उस पार गए। यह वर्ष का वह समय था, जब यरदान नदी में बाढ़ आयी थी। उन्होंने घाटियों में रहने वाले सभी लोगों का पीछा करके भगाया। उन्होंने उन लोगों को पूर्व और पश्चिम में पीछा करके भगाया।

अन्य योद्धा दाऊद के साथ आते हैं

16 बिन्यामीन और यहूदा के परिवार समूह के अन्य लोग भी दाऊद के पास किले में आए। 17 दाऊद उनसे मिलने बाहर निकला। दाऊद ने उनसे कहा, “यदि तुम् लोग शान्ति के साथ मेरी सहायता करने आए हो तो, मैं तुम लोगों का स्वागत करता हूँ। मेरे साथ रहो। किन्तु यदि तुम मेरे विरुद्ध जासूसी करने आए हो, जबकि मैंने तुम्हारा कुछ भी बुरा नहीं किया, तो हमारे पूर्वजों का परमेश्वर देखेगा कि तुमने क्या किया और दण्ड देगा।”

18 अमासै तीस वीरों का प्रमुख था। अमासै पर आत्मा उतरी। अमासै ने कहा,

“दाऊद हम तुम्हारे हैं।
यिशै—पुत्र, हम तुम्हारे साथ हैं!
शान्ति, शान्ति हो तम्हारे साथ!
शान्ति उन लोगों को जो तुम्हारी सहायता करें।
क्यों? क्योंकि तुम्हारी परमेश्वर, तुम्हारा सहायता करता है!”

तब दाऊद ने इन लोगों का स्वागत किया। उसने अपनी सेना में उन्हें प्रमुख बनाया।

19 मनश्शे के परिवार समूह के कुछ लोग भी दाऊद के साथ हो गये। वे दाऊद के साथ तब हुए जब वह पलिश्तियों के साथ शाऊल से युद्ध करने गया। किन्तु दाऊद और उसके लोगों ने वास्तव में पलिश्तियों की सहायता नहीं की। पलिश्तियों के प्रमुख दाऊद के विषय में सहायक के रूप में बातें करते रहे, किन्तु तब उन्होंने उसे भेज देने का निर्णय लिया। उन शासकों ने कहा, “यदि दाऊद अपने स्वामी शाऊल के पास जाएगा, तो हमारे सिर काट डाले जाएंगे!” 20 ये मनश्शे के लोग थे जो दाऊद के साथ उस समय मिले जब वह सिकलगः अदना, योजाबाद, यदीएल, मीकाएल, योजाबाद, एलीहू और सिल्लतै नगरों को गया। वे सभी मनेश्शे के परिवार समूह के सेनाध्यक्ष थे। 21 वे दाऊद की सहायता बुरे लोगों से युद्ध करने में करते थे। वे बुरे लोग पूरे देश में घूमते थे और लोगों की चीजें चुराते थे। मनश्शे के ये सभी वीर योद्धा थे। वे दाऊद की सेना में प्रमुख हुए।

22 दाऊद की सहायता के लिये प्रतिदिन अधिकाधिक व्यक्ति आते रहे। इस प्रकार दाऊद के पास विशाल और शक्तिशाली सेना हो गई।

समीक्षा

राजा के आगमन में अपनी आशा रखिये

हमारी आशा यीशु, राजा में है, जो एक दिन वापस आयेंगे और सर्वदा के लिए अपने राज्य को स्थापित करेंगे। जैसे ही हमने पुराने नियम के राजाओं के विषय में पढ़ा, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि अपनी सर्वश्रेष्ठ स्थिति में भी, वे राजा यीशु की केवल अस्पष्ट परछाई थे।

इतिहासकार की आँखो में, दाऊद आदर्श राजा थेः”तब भी इस्रालियों का अगुआ आप ही थे, और तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझ से कहा, “मेरी प्रजा इस्राएल का चरवाहा, और मेरी प्रजा इस्राएल का प्रधान तू ही होगा” (11:2)। उन्होंने “दाऊद को इस्राएल के ऊपर राजा अभिषिक्त किया, जैसा कि परमेश्वर ने वायदा किया था” (व.3)। “दाऊद की प्रतिष्ठा अधिक बढ़ती गई और सेनाओं का यहोवा उसके संग था” (व.9)।

दाऊद ने यह सब अपने आपसे नहीं किया। उन्हें अपने आस-पास एक दल की आवश्यकता थी। उनके पास तीस शूरवीरों का एक समूह था, जिसमें बड़ा पेड़ शामिल था। मैं उन शक्तिशाली पुरुषों और महिलाओं का बहुत ही आभारी हूँ जो पीपा और मेरी सहायता करते और हमें उत्साहित करते हैं जैसे ही हम अगुवाई करने की कोशिश करते हैं। हमारे आस-पास एक अद्भुत समूह के बिना, हम वह नहीं कर सकते थे जो हम करते हैं।

तीस पुरुषों के प्रधान, अमासै, “ में परमेश्वर का आत्मा समाया” उसने दाऊद से कहा, “हम तेरी ओर के हैं...हम कटिबद्ध हैं...तेरा कुशल ही कुशल हो और तेरे सहायकों का कुशल हो” (12:18-22, एम.एस.जी.)। अवश्य ही यह दाऊद के लिए एक बड़ा उत्साह रहा होगा।

इन वचनो में हम परमेश्वर के राज्य के साथ इस्राएल के राज्य का एक सीधा समीकरण देते हैं (1इतिहास 28:5; 1इतिहास 29:23; 2इतिहास 13:8 देखें)। निरंतर राजा होने के विषय में कोई प्रश्न नहीं था क्योंकि इसे परमेश्वर ने सुरक्षित रखा था।

फिर भी, जब इतिहास के लेखक इसे लिख रहे थे (सैकड़ो सालों बाद) वहाँ पर कोई राजा नहीं था। उन्होंने भूतकाल के विषय में लिखा इस आशा में कि भविष्य में दाऊद के समान एक राजा उठेंगे। यह इस्राएल की आशा थी –एक आने वाला राजा। यीशु वह राजा थे। वह “अभिषिक्त, ““मसीहा” थे (भजनसंहिता 89:51)।

अब हमारी आशा यीशु के आगमन में है। जैसा कि बिशप लेसली न्युबिगिन इसे बताते हैं, “मसीह के लिए क्षितिज है “वह वापस आयेंगे” और “हम परमेश्वर के आगमन की बाट जोहते हैं।” यह कल या किसी भी समय हो सकता है, लेकिन यह क्षितिज रेखा है। वह क्षितिज रेखा मेरे लिए मूलभूत है, और यह आशावादी होना संभव बनाता है और इसलिए जीवन अर्थपूर्ण हो जाता है।”

प्रार्थना

पिता, आपका धन्यवाद क्योंकि इस्राएल की सारी आशा पूरी हो गई जब यीशु, अभिषिक्त राजा आये। आपका धन्यवाद क्योंकि हम उनके आगमन की बाट जोह रहे हैं। “सर्वदा परमेश्वर की स्तुति हो! आमीन और आमीन” (व.52)।

पिप्पा भी कहते है

1इतिहास 11:10-25

मेरे परिवार में शक्तिशाली पुरुष (और महिलाएं) हैं। वे अन्याय के दानवों पर जय पा रहे हैं। वे सूटकेस ले जाने में भी उपयोगी हैं

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संदर्भ

बिशप लेसली न्युबिगिन एक्सर्प्ट फ्रॉम, एंद्रियु वॉकर, विभिन्न सुसमाचारक्रिश्चन ऑर्थोडॉक्सी एण्ड मॉडर्न थियोलोजिस, (सोसायटि फॉर प्रमोटिंग क्रिश्चन नॉलेज, 1993)

एर्विन मेकमनस, सोल व्रेविंग (थॉमस नेल्सन, 2008) पी.2

रेनियरो कॅन्टालमेसा, मसीह में जीवन (लिटुर्जिकल प्रेस, 2002) पी.81

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