दिन 224

चिंता और शांति

बुद्धि भजन संहिता 94:12-23
नए करार 1 कुरिन्थियों 7:1-16
जूना करार सभोपदेशक 1:1-3:22

परिचय

चिंता आपको जीवन के आनंद से दूर कर सकती है। चिंता का कारण बहुत कुछ हो सकता हैः स्वास्थ, काम (बेकार होना), धन (कर्ज, बिल जो भरना है और इत्यादि) और इसके अतिरिक्त बहुत कुछ। चिंता के कुछ और बड़े कारण हैं जो आज के नये नियम के लेखांश में लिखे गए हैं: संबंध, विवाह (या विवाह न होना), शारीरिक संबंध (या इसका ना होना), अकेलापन और तलाक।

हमारे पुराने नियम के लेखांश में, सभोपदेशक की पुस्तक बताती है कि अधिकतर चिंता जिसका हम अनुभव करते हैं वह किसी गहरी चीज के कारण होती है। इसका वर्णन हम अर्थहीन चिंता के रूप में कर सकते हैं। इन सब के बीच में, आप शांति में जीने के लिए बुलाए गए हैं।

बुद्धि

भजन संहिता 94:12-23

12 वह मनुष्य जिसको यहोवा सुधारता, अति प्रसन्न होगा।
 परमेश्वर उस व्यक्ति को खरी राह सिखायेगा।
13 हे परमेश्वर, जब उस जन पर दु:ख आयेंगे तब तू उस जन को शांत होने में सहायक होगा।
 तू उसको शांत रहने में सहायता देगा जब तक दुष्ट लोग कब्र में नहीं रख दिये जायेंगे।
14 यहोवा निज भक्तों को कभी नहीं त्यागेगा।
 वह बिन सहारे उसे रहने नहीं देगा।
15 न्याय लौटेगा और अपने साथ निष्पक्षता लायेगा,
 और फिर लोग सच्चे होंगे और खरे बनेंगे।

16 मुझको दुष्टों के विरूद्ध युद्ध करने में किसी व्यक्ति ने सहारा नहीं दिया।
 कुकर्मियों के विरूद्ध युद्ध करने में किसी ने मेरा साथ नहीं दिया।
17 यदि यहोवा मेरा सहायक नहीं होता,
 तो मुझे शब्द हीन (चुपचुप) होना पड़ता।
18 मुझको पता है मैं गिरने को था,
 किन्तु यहोवा ने भक्तों को सहारा दिया।
19 मैं बहुत चिंतित और व्याकुल था,
 किन्तु यहोवा तूने मुझको चैन दिया और मुझको आनन्दित किया।

20 हे यहोवा, तू कुटिल न्यायाधीशों की सहायता नहीं करता।
 वे बुरे न्यायाधीश नियम का उपयोग लोगों का जीवन कठिन बनाने में करते हैं।
21 वे न्यायाधीश सज्जनों पर प्रहार करते हैं।
 वे कहते हैं कि निर्दोष जन अपराधी हैं। और वे उनको मार डालते हैं।
22 किन्तु यहोवा ऊँचे पर्वत पर मेरा सुरक्षास्थल है,
 परमेश्वर मेरी चट्टान और मेरा शरणस्थल है।
23 परमेश्वर उन न्यायाधीशों को उनके बुरे कामों का दण्ड देगा।
 परमेश्वर उनको नष्ट कर देगा। क्योंकि उन्होंने पाप किया है।
 हमारा परमेश्वर यहोवा उन दुष्ट न्यायाधीशों को नष्ट कर देगा।

समीक्षा

अपनी चिंता के विषय में परमेश्वर को बताईये

क्या आप जानते हैं कि बहुत चिंता का अनुभव करना कैसा होता है? (व.19अ)

भजनसंहिता के लेखक ने यह अनुभव किया। वह लिखते हैं,"तू विपत्ति के दिनों में उस समय तक चैन देता रहता है...जब मैंने कहा,"मेरा पाँव फिसलने लगा है," तब हे यहोवा, तेरी करुणा ने मुझे थाम लिया। जब मेरे मन में बहुत सी चिंताएँ होती हैं, तब वे यहोवा, तेरी दी हुई शांति से मुझ को सुख मिलता है" (वव.13अ, 18-19)।

वह आगे कहते हैं,"परंतु यहोवा मेरा गढ़, और मेरा परमेश्वर मेरे शरण की चट्टान ठहरा है" (व.22)।

जब हम किसी बड़ी चिंता से घिर जाते हैं, तब सहायता के लिए परमेश्वर के पास जाईये। "जब मेरे मन में बहुत सी चिंताएँ होती हैं, तब हे यहोवा, तेरी दी हुई शांति से मुझ को सुख मिलता है" (व.19, एम.एस.जी)। परमेश्वर के प्रेम में हम राहत, सांत्वना और आनंद पाते हैं। परमेश्वर "विपत्ति के समय में चैन देते हैं" (व.13, एम.एस.जी)।

प्रार्थना

परमेश्वर आपका धन्यवाद क्योंकि आप विपत्ति के दिन में मुझे चैन देते हैं। आज मैं आपके पास आता हूँ और अपनी चिंताओं को आपके पास लाता हूँ.

नए करार

1 कुरिन्थियों 7:1-16

विवाह

7अब उन बातों के बारे में जो तुमने लिखीं थीं: अच्छा यह है कि कोई पुरुष किसी स्त्री को छुए ही नहीं। 2 किन्तु यौन अनैतिकता की घटनाओं की सम्भावनाओं के कारण हर पुरुष की अपनी पत्नी होनी चाहिये और हर स्त्री का अपना पति। 3 पति को चाहिये कि पत्नी के रूप में जो कुछ पत्नी का अधिकार बनता है, उसे दे। और इसी प्रकार पत्नी को भी चाहिये कि पति को उसका यथोचित प्रदान करे। 4 अपने शरीर पर पत्नी का कोई अधिकार नहीं हैं बल्कि उसके पति का है। और इसी प्रकार पति का भी उसके अपने शरीर पर कोई अधिकार नहीं है, बल्कि उसकी पत्नी का है। 5 अपने आप को प्रार्थना में समर्पित करने के लिये थोड़े समय तक एक दूसरे से समागम न करने की आपसी सहमती को छोड़कर, एक दूसरे को संभोग से वंचित मत करो। फिर आत्म-संयम के अभाव के कारण कहीं शैतान तुम्हें किसी परीक्षा में न डाल दे, इसलिए तुम फिर समागम कर लो। 6 मैं यह एक छूट के रूप में कह रहा हूँ, आदेश के रूप में नहीं। 7 मैं तो चाहता हूँ सभी लोग मेरे जैसे होते। किन्तु हर व्यक्ति को परमेश्वर से एक विशेष बरदान मिला है। किसी का जीने का एक ढंग है तो दूसरे का दूसरा।

8 अब मुझे अविवाहितों और विधवाओं के बारे में यह कहना है:यदि वे मेरे समान अकेले ही रहें तो उनके लिए यह उत्तम रहेगा। 9 किन्तु यदि वे अपने आप पर काबू न रख सकें तो उन्हें विवाह कर लेना चाहिये; क्योंकि वासना की आग में जलते रहने से विवाह कर लेना अच्छा है।

10 अब जो विवाहित हैं उनको मेरा यह आदेश है, (यद्यपि यह मेरा नहीं है, बल्कि प्रभु का आदेश है) कि किसी पत्नी को अपना पति नहीं त्यागना चाहिये। 11 किन्तु यदि वह उसे छोड़ ही दे तो उसे फिर अनब्याहा ही रहना चाहिये या अपने पति से मेल-मिलाप कर लेना चाहिये। और ऐसे ही पति को भी अपनी पत्नी को छोड़ना नहीं चाहिये।

12 अब शेष लोगों से मेरा यह कहना है, यह मैं कह रहा हूँ न कि प्रभु यदि किसी मसीही भाई की कोई एसी पत्नी है जो इस मत में विश्वास नहीं रखती और उसके साथ रहने को सहमत है तो उसे त्याग नहीं देना चाहिये। 13 ऐसे ही यदि किसी स्त्री का कोई ऐसा पति है जो पंथ का विश्वासी नहीं है किन्तु उसके साथ रहने को सहमत है तो उस स्त्री को भी अपना पति त्यागना नहीं चाहिये। 14 क्योंकि वह अविश्वासी पति विश्वासी पत्नी से निकट संबन्धों के कारण पवित्र हो जाता है और इसी प्रकार वह अविश्वासिनी पत्नी भी अपने विश्वासी पति के निरन्तर साथ रहने से पवित्र हो जाती है। नहीं तो तुम्हारी संतान अस्वच्छ हो जाती किन्तु अब तो वे पवित्र हैं।

15 फिर भी यदि कोई अविश्वासी अलग होना चाहता है तो वह अलग हो सकता है। ऐसी स्थितियों में किसी मसीही भाई या बहन पर कोई बंधन लागू नहीं होगा। परमेश्वर ने हमें शांति के साथ रहने को बुलाया है। 16 हे पत्नियो, क्या तुम जानती हो? हो सकता है तुम अपने अविश्वासी पति को बचा लो।

समीक्षा

अपनी स्थिती के साथ शांति में जीएँ

क्या आप महसूस करते हैं कि आप शांति का एक जीवन जी रहे हैं? "परमेश्वर ने हमें शांति में जीने के लिए बुलाया है" (व.15क)। आप कैसे इस "शांति" को पाते हैं? इस अध्याय में, पौलुस बताते हैं कि कैसे आप संबंध में, विवाह, अकेलेपन और अलगाव में शांति पाते हैं। वह इस प्रश्न को पूछकर शुरुवात करते हैं,"क्या शारीरिक संबंध रखना अच्छा है?" (व.1, एम.एस.जी)। वह उत्तर देते हैं,"निश्चित ही – लेकिन केवल एक निश्चित संदर्भ में" (व.2अ, एम.एस.जी)।

पौलुस दो विपरीत खतरों के बारे में बताते हैं: जो कहते हैं कि "सब कुछ उचित है" (अध्याय 6 देखें) जो अमरता, और आत्मिक संन्यास को लाता है, जो पूरी तरह से शरीर को नकारता है। जवाब में, पौलुस बहुत से प्रश्नों का उत्तर देते हैं:

  • क्या विवाह उन लोगों के लिए परमेश्वर की सामान्य इच्छा है?

विवाह सभी पुरुषों और महिलाओं के लिए मानक हैः " हर एक पुरुष की पत्नी, और हर स्त्री का पति हो" (व.2, एम.एस.जी)। परमेश्वर की सामान्य इच्छा है कि लोग विवाह करें ताकि उनके पास साथी हो वे(उत्पत्ति 2:18), "फूले-फले" (उत्पत्ति 1:28) और आनंदित हों (1कुरिंथियो 7:1-5)। अकेलापन अपवाद है। यह एक विशेष बुलाहट है।

यहाँ पर पौलुस कारण बताते हैं कि क्योंकि "बहुत व्यभिचार है" (व.2)। "यौन संबंध की कामना मजबूत होती है, लेकिन विवाह पर्याप्त मजबूत है कि उन्हें संतुष्ट करे और एक संतुलित और परिपूर्ण यौन जीवन प्रदान करे, ऐसे विश्व में जहाँ पर व्यभिचार है" (व.2, एम.एस.जी)। वह अपने विरोधियों से उनके ही शब्दों से निपटते हैं। वे अनैतिकता के विरूद्ध प्रतिक्रिया कर रहे हैं कि यौन संबंध और विवाह नहीं होने चाहिए,वे इस बात पर विवाद कर रहे थे।

पौलुस उत्तर देते हैं कि, सभी सकारात्मक कारणों के साथ साथ, अनैतिकता की ओर प्रलोभन एक अच्छा कारण है कि वे विवाह कर लें।

  • विवाह में यौन संबंध के प्रति मसीह व्यवहार क्या है?

विवाह में आत्मिक परिपूर्णता का रास्ता इसका परहेज करने से नहीं है। विवाह में यौन संबंध की स्वतंत्रता और यौन संबंध की समानता हैः" पति अपनी पत्नी का हक्क पूरा करे; और वैसे ही पत्नी भी अपने पति का" (व.3, एम.एस.जी)। " तुम एक दूसरे से अलग न रहो; परन्तु केवल कुछ समय तक आपस की सम्मति से कि प्रार्थना के लिये अवकाश मिले, और फिर एक साथ रहो; परन्तु मैं जो यह कहता हूँ वह अनुमति है न कि आज्ञा" (वव.5-6)।

  • क्या विवाहरहित रहना या विवाह करना बेहतर है?

पौलुस लिखते हैं कि दोनों ही परमेश्वर की ओर से उपहार हैं। वे दोनों अच्छे हैं (वव.7-9)। एक तरह से, विवाहहीन रहना सर्वश्रेष्ठ है (बाद में इसका कारण बताया गया है):"मैं यह चाहता हूँ कि जैसा मैं हूँ, वैसे ही सब मनुष्य हों; परन्तु हर एक को परमेश्वर की ओर से विशेष वरदान मिले हैं; किसी को किसी प्रकार का, और किसी को किसी और प्रकार का" (व.7, एम.एस.जी)। लेकिन विवाह करना भी एक अच्छी बात है (व.9)।

  • क्या एक मसीह को कभी दूसरे मसीह से तलाक लेना चाहिए?

इस लेखांश का सामान्य सिद्धांत, और बाकी नया नियम इस प्रश्न का उत्तर देता है,"नहीं: यदि तुम विवाहित हो, तो विवाहित रहो...एक पति को अपनी पत्नी को छोड़ने का अधिकार नहीं" (वव.10-11, एम.एस.जी)। निश्चित ही, यह बहुत ही जटिल समस्या है। ( यीशु की जीवन शैली में, मैंने इस प्रश्न पर और बारीकी से देखने की कोशिश की है, अध्याय 6)।

  • उन लोगों के साथ संबंध के विषय में क्या जो मसीह नहीं हैं?

पौलुस एक मसीह को ऐसे व्यक्ति से विवाह करने के लिए उत्साहित नहीं करते हैं जो कि एक मसीह नहीं है (2कुरिंथियो 6:14-7:1; 1कुरिंथियो 7:39)। किंतु, यदि वे पहले से ही विवाहित हैं, तो यह बहुत ही अलग बात है। उन्हें किसी विवाहित संबंध से छुटकारा पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

पौलुस के विरोधी चिंता कर रहे थे कि ऐसे एक व्यक्ति से विवाह करना जो एक मसीह नहीं है, वह विवाह को दूषित कर देगा। पौलुस का उत्तर है कि मामला विपरीत हैः" क्योंकि ऐसा पति जो विश्वास न रखता हो, वह पत्नी के कारण पवित्र ठहरता है; और ऐसी पत्नी जो विश्वास नहीं रखती, पति के कारण पवित्र ठहरती है; नहीं तो तुम्हारे बाल – बच्चे अशुद्ध होते, परन्तु अब तो पवित्र हैं।" (व.14, एम.एस.जी)। " परंतु जो पुरुष विश्वास नहीं रखता, यदि वह अलग हो तो अलग होने दो, ऐसी दशा में कोई भाई या बहन बन्धन में नहीं। परमेश्वर ने हमें मेलमिलाप के लिये बुलाया है।" (व.15 देखें)।

प्रार्थना

परमेश्वर, हमारी सहायता कीजिए कि जिस किसी स्तर पर हम अपने आपको पायें, हमारी वैवाहिक स्थिति के बावजूद, हम आपके स्तर से जीये और आपकी शांति को जाने।

जूना करार

सभोपदेशक 1:1-3:22

1ये उपदेशक के शब्द हैं। उपदेशक दाऊद का पुत्र था और यरूशलेम का राजा था।

2 उपदेशक का कहना है कि हर वस्तु अर्थहीन है और अकारथ है! मतलब यह कि हर बात व्यर्थ है! 3 इस जीवन में लोग जो कड़ी मेहनत करते हैं, उससे उन्हें सचमुच क्या कोई लाभ होता है? नहीं!

वस्तुएँ अपरिवर्तनशील हैं

4 एक पीढ़ी आती है और दूसरी चली जाती है किन्तु संसार सदा यूँ ही बना रहता है। 5 सूरज उगता है और फिर ढल जाता है और फिर सूरज शीघ्र ही उसी स्थान से उदय होने की शीघ्रता करता है।

6 वायु दक्षिण दिशा की ओर बहती है और वायु उत्तर की ओर बहने लगती है। वायु एक चक्र में घूमती रहती है और फिर वायु जहाँ से चली थी वापस वहीं बहने लगती है।

7 सभी नदियाँ एक ही स्थान की ओर बार—बार बहा करती है। वे सभी समुद्र से आ मिलती हैं, किन्तु फिर भी समुद्र कभी नहीं भरता।

8 शब्द वस्तुओं का पूरा—पूरा वर्णन नहीं कर सकते। लेकिन लोग अपने विचार को व्यक्त नहीं कर पाते, सदा बोलते ही रहते हैं। शब्द हमारे कानों में बार—बार पड़ते हैं किन्तु उनसे हमारे कान कभी भी भरते नहीं हैं। हमारी आँखें भी, जो कुछ वे देखती हैं, उससे कभी अघाती नहीं हैं।

कुछ भी नया नहीं है

9 प्रारम्भ से ही वस्तुएँ जैसी थी वैसी ही बनी हुई हैं। सब कुछ वैसे ही होता रहेगा, जैसे सदा से होता आ रहा है। इस जीवन में कुछ भी नया नहीं है।

10 कोई व्यक्ति कह सकता है, “देखो, यह बात नई है!” किन्तु वह बात तो सदा से हो रही थी। वह तो हमसे भी पहले से हो रही थी!

11 वे बातें जो बहुत पहले घट चुकी हैं, उन्हें लोग याद नहीं करते और आगे भी लोग उन बातों को याद नहीं करेंगे जो अब घट रही हैं और उसके बाद भी अन्य लोग उन बातों को याद नहीं रखेंगे जिन्हें उनके पहले के लोगों ने किया था।

क्या बुद्धि से आनन्द मिलता है?

12 मैं, जो कि एक उपदेशक हूँ, यरूशलेम में इस्राएल का राजा हुआ करता था और आज भी हूँ। 13 मैंने निश्चय किया कि मैं इस जीवन में जो कुछ होता है उसे जानने के लिये अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए उसका अध्ययन करूँ। मैंने जाना कि परमेश्वर ने हमें करने के लिये जो यह काम दिया है वह बहुत कठिन है। 14 इस पृथ्वी पर की सभी वस्तुओं पर मैंने दृष्टि डाली और देखा कि यह सब कुछ व्यर्थ है। यह वैसा ही है जैसा वायु को पकड़ना। 15 तुम उन बातों को बदल नहीं सकते। यदि कोई बात टेढ़ी है तो तुम उसे सीधी नहीं कर सकते और यदि किसी वस्तु का अभाव है तो तुम यह नहीं कह सकते कि वह वस्तु वहाँ है।

16 मैंने अपने आप से कहा, “मैं बहुत बुद्धिमान हूँ। मुझसे पहले यरूशलेम में जिन राजाओं ने राज्य किया है, मैं उन सब से अधिक बुद्धिमान हूँ। मैं जानता हूँ कि वास्तव में बुद्धि और ज्ञान क्या है!”

17 मैंने यह जानने का निश्चय किया कि मूर्खतापूर्ण चिन्तन से विवेक और ज्ञान किस प्रकार श्रेष्ठ हैं। किन्तु मुझे ज्ञात हुआ कि विवेकी बनने का प्रयास वैसा ही है जैसे वायु को पकड़ने का प्रयत्न। 18 क्योंकि अधिक ज्ञान के साथ हताशा भी उपजती है। वह व्यक्ति जो अधिक ज्ञान प्राप्त करता है वह अधिक दुःख भी प्राप्त करता है।

क्या “मनो—विनोद” से सच्चा आनन्द मिलता है?

2मैंने अपने मन में कहा, “मुझे मनो विनोद करना चाहिए। मुझे हर वस्तु का जितना रस मैं ले सकूँ, उतना लेना चाहिय।” किन्तु मैंने जाना कि यह भी व्यर्थ है। 2 हर समय हँसते रहना भी मूर्खता है। मनो विनोद से मेरा कोई भला नहीं हो सका।

3 सो मैंने निश्चय किया कि मैं अपनी देह को दाखमधु से भर लूँ यद्यपि मेरा मस्तिष्क मुझे अभी ज्ञान की राह दिखा रहा था। मैंने यह मूर्खता पूर्ण आचरण किया, क्योंकि मैं आनन्द का कोई मार्ग ढूँढना चाहता था। मैं चाहता था कि लोगों के लिये अपने जीवन के थोड़े से दिनों में क्या करना उत्तम है, इसे खोज लूँ।

क्या कड़ी मेहनत से सच्चा आनन्द मिलता है?

4 फिर मैंने बड़े—बड़े काम करने शुरू किये। मैंने अपने लिये भवन बनवाएँ और अँगूर के बाग लगवाए। 5 मैंने बगीचे लगवाएँ और बाग बनवाए। मैंने सभी तरह के फलों के पेड़ लगवाये। 6 मैंने अपने लिये पानी के तालाब बनवाए और फिर इन तालाबों के पानी को मैं अपने बढ़ते पेड़ों को सींचने के काम में लाने लगा। 7 मैंने दास और दासियाँ खरीदीं और फिर मेरे घर में उत्पन्न हुए दास भी थे। मैं बड़ी बड़ी वस्तुओं का स्वामी बन गया। मेरे पास झुँड के झुँड पशु और भेड़ों के रेवड़ थे। यरूशलेम में किसी भी व्यक्ति के पास जितनी वस्तुएँ थीं, मेरे पास उससे भी अधिक वस्तुएँ थीं।

8 मैंने अपने लिये चाँदी सोना भी जमा किया। मैंने राजाओं और उनके देशों से भी खजाने एकत्र किये। मेरे पास बहुत सी वेश्याएँ थीं।

9 मैं बहुत धनवान और प्रसिद्ध हो गया। मुझसे पहले यरूशलेम में जो भी कोई रहता था, मैं उससे अधिक महान था। मेरी बुद्धि सदा मेरी सहायता किया करती थी। 10 मेरी आँखों ने जो कुछ देखा और चाहा उसे मैंने प्राप्त किया। मैं जो कुछ करता, मेरा मन सदा उससे प्रसन्न रहा करता और यह प्रसन्नता मेरे कठिन परिश्रम का प्रतिफल थीं।

11 किन्तु मैंने जो कुछ किया था जब उस पर दृष्टि डाली और अपने किये कठिन परिश्रम के बारे में विचार किया तो मुझे लगा यह सब समय की बर्बादी थी! यह ऐसा ही था जैसा वायु को पकड़ना। इस जीवन में हम जो कुछ श्रम करते हैं उस सबकुछ का उचित परिणाम हमें नहीं मिलता।

हो सकता है इसका उत्तर बुद्धि हो

12 जितना एक राजा कर सकता है, उससे अधिक कोई भी व्यक्ति नहीं कर सकता। तुम जो भी कुछ करना चाह सकते हो, वह सबकुछ कोई राजा अब तक कर भी चुका होगा। मेरी समझ में आ गया कि एक राजा तक जिन कामों को करता है, वे सब भी व्यर्थ हैं। सो मैंने फिर बुद्धिमान बनने, मूर्ख बनने और सनकीपन के कामों को करने के बारे में सोचना आरम्भ किया। 13 मैंने देखा कि बुद्धि मूर्खता से उसी प्रकार उत्तम है जिस प्रकार अँधेरे से प्रकाश उत्तम होता है। 14 यह वैसे ही है जैसे: एक बुद्धिमान व्यक्ति, वह कहाँ जा रहा है, उसे देखने के लिये अपनी बुद्धि का उपयोग, अपनी आँखों की तरह करता है। किन्तु एक मूर्ख व्यक्ति उस व्यक्ति के समान है जो अंधेरे में चल रहा है।

किन्तु मैंने यह भी देखा कि मूर्ख और बुद्धिमान दोनों का अंत एक ही प्रकार से होता हैं। दोनों ही अंत में मृत्यु को प्राप्त करते हैं। 15 अपने मन में मैंने सोचा, “किसी मूर्ख व्यक्ति के साथ जो घटता है वह मेरे साथ भी घटेगा सो इतना बुद्धिमान बनने के लिये इतना कठिन परिश्रम मैंने क्यों किया?” अपने आपसे मैंने कहा, “बुद्धिमान बनना भी बेकार है।” 16 बुद्धिमान व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति दोनों ही मर जायेंगे और लोग सदा के लिये न तो बुद्धिमान व्यक्ति को याद रखेंगे और न ही किसी मूर्ख व्यक्ति को। उन्होंने जो कुछ किया था, लोग उसे आगे चल कर भुला देंगे। इस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति वास्तव में एक जैसे ही हैं।

क्या सच्चा आनन्द जीवन में है?

17 इसके कारण मुझे जीवन से घृणा हो गई। इस विचार से मैं बहुत दुःखी हुआ कि इस जीवन में जो कुछ है सब व्यर्थ है। बिल्कुल वैसा ही जैसे वायु को पकड़ने की कोशिश करना।

18 मैंने जो कठिन परिश्रम किया था, उससे घृणा करना आरम्भ कर दिया। मैंने देखा कि वे लोग जो मेरे बाद जीवित रहेंगे उन वस्तुओं को ले लेंगे जिनके लिये मैंने कठोर परिश्रम किया था। मैं अपनी उन वस्तुओं को अपने साथ नहीं ले जा सकूँगा। 19 जिन वस्तुओं के लिये मैंने मन लगाकर कठिन परिश्रम किया था उन सभी वस्तुओं पर किसी दूसरे ही व्यक्ति का नियन्त्रण होगा और मैं तो यह भी नहीं जानता कि वह व्यक्ति बुद्धिमान होगा या मूर्ख। पर यह सब भी तो अर्थहीन ही है।

20 इसलिए मैंने जो भी कठिन परिश्रम किया था, उस सब के विषय में मैं बहुत दुःखी हुआ। 21 एक व्यक्ति अपनी बुद्धि, अपने ज्ञान और अपनी चतुराई का प्रयोग करते हुए कठिन परिश्रम कर सकता हैं। किन्तु वह व्यक्ति तो मर जायेगा और जिन वस्तुओं के लिये उस व्यक्ति ने कठिन परिश्रम किया था, वे किसी दूसरे ही व्यक्ति को मिल जायेंगी। उन व्यक्तियों ने वस्तुओं के लिये कोई काम तो नहीं किया था, किन्तु उन्हें वह सभी कुछ हासिल हो जायेगा। इससे मुझे बहुत दुःख होता है। यह न्यायपूर्ण तो नहीं है। यह तो विवेकपूर्ण नहीं है।

22 अपने जीवन में सारे परिश्रम और संघर्ष के बाद आखिर एक मनुष्य को वास्तव में क्या मिलता है? 23 अपने सारे जीवन में वह कठिन परिश्रम करता रहा किन्तु पीड़ा और निराशा के अतिरिक्त उसके हाथ कुछ भी नहीं लगा। रात के समय भी मनुष्य का मन विश्राम नहीं पाता। यह सब भी अर्थहीन ही है।

24-25 जीवन का जितना आनन्द मैंने लिया है क्या कोई भी ऐसा व्यक्ति और है जिसने मुझे से अधिक जीवन का आनन्द लेने का प्रयास किया हो? नहीं! मुझे जो ज्ञान हुआ है वह यह है: कोई व्यक्ति जो अच्छे से अच्छा कर सकता है वह है खाना, पीना और उस कर्म का आनन्द लेना जो उसे करना चाहिये। मैंने यह भी समझा है कि यह सब कुछ परमेश्वर से ही प्राप्त होता है। 26 यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को प्रसन्न करता है तो परमेश्वर उसे बुद्धि, ज्ञान और आनन्द प्रदान करता है। किन्तु वह व्यक्ति जो उसे अप्रसन्न करता है, वह तो बस वस्तुओं के संचय और उन्हें ढोने का ही काम करता रहेगा। परमेश्वर बुरे व्यक्तियों से लेकर अच्छे व्यक्तियों को देता रहता है। इस प्रकार यह समग्र कर्म व्यर्थ है। यह वैसा ही है जैसे वायु को पकड़ने का प्रयत्न करना।

एक समय है…

3हर बात का एक उचित समय होता है। और इस धरती पर हर बात एक उचित समय पर ही घटित होगी।

2 जन्म लेने का एक उचित समय निश्चित है,
और मृत्यु का भी।
एक समय होता है पेड़ों के रोपने का,
और उनको उखाड़ने का।
3 घात करने का होता है एक समय,
और एक समय होता है उसके उपचार का।
एक समय होता है जब ढहा दिया जाता,
और एक समय होता है करने का निर्माण।
4 एक समय होता है रोने—विलाप करने का,
और एक समय होता है करने का अट्टाहस।
एक समय होता है होने का दुःख मग्न,
और एक समय होता है उल्लास भरे नाचका।
5 एक समय होता है जब हटाए जाते हैं पत्थर,
और एक समय होता है उनके एकत्र करने का।
एक समय होता है बाध आलिंगन में किसी के स्वागत का,
और एक समय होता है, जब स्वागत उन्हीं का किया नहीं जाता है।
6 एक समय होता है जब होती है किसी की खोज,
और आता है एक समय जब खोज रूक जाती है।
एक समय होता है वस्तुओं के रखने का,
और एक समय होता है दूर फेंकने का चीज़ों को।
7 होता है एक समय वस्त्रों को फाड़ने का,
फिर एक समय होता जब उन्हें सिया जाता है।
एक समय होता है साधने का चुप्पी,
और होता है एक समय फिर बोल उठने का।
8 एक समय होता है प्यार को करने का,
और एक समय होता जब घृणा करी जाती है।
एक समय होता है करने का लड़ाई,
और होता है एक समय मेल का मिलाप का।

परमेश्वर अपने संसार का नियन्त्रण करता है

9 क्या किसी व्यक्ति को अपने कठिन परिश्रम से वास्तव में कुछ मिल पाता है? नहीं। क्योंकि जो होना है वह तो होगा ही। 10 मैंने वह कठिन परिश्रम देखा है जिसे परमेश्वर ने हमें करने के लिये दिया है। 11 अपने संसार के बारे में सोचने के लिये परमेश्वर ने हमें क्षमता प्रदान की है। परन्तु परमेश्वर जो करता है, उन बातों को पूरी तरह से हम कभी नहीं समझ सकते। फिर भी परमेश्वर हर बात, उचित और उपयुक्त समय पर करता है।

12 मैंने देखा है कि लोगों के लिये सबसे उत्तम बात यह है कि वे प्रयत्न करते रहें और जब तक जीवित रहें आनन्द करते रहें। 13 परमेश्वर चाहता है कि हर व्यक्ति खाये पीये और अपने कर्म का आनन्द लेता रहे। ये बातें परमेश्वर की ओर से प्राप्त उपहार हैं।

14 मैं जानता हूँ कि परमेश्वर जो कुछ भी घटित करता है वह सदा घटेगा ही। लोग परमेश्वर के काम में से कुछ घटी भी वृद्धि नहीं कर सकते और इसी तरह लोग परमेस्शवर के काम में से कुछ घटी भी नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर ने ऐसा इसलिए किया कि लोग उसका आदर करें। 15 जो अब हो रहा है पहले भी हो चुका हैं। जो कुछ भविष्य में होगा वह पहले भी हुआ था। परमेश्वर घटनाओं को बार—बार घटित करता है।

16 इस जीवन में मैंने ये बातें भी देखी हैं। मैंने देखा है कि न्यायालय जहाँ न्याय और अच्छाई होनी चाहिये, वहाँ आज बुराई भर गई है। 17 इसलिये मैंने अपने मन से कहा, “हर बात के लिये परमेश्वर ने एक समय निश्चित किया है। मनुष्य जो कुछ करते हैं उसका न्याय करने के लिये भी परमेश्वर ने एक समय निश्चित किया है। परमेश्वर अच्छे लोगों और बुरे लोगों का न्याय करेगा।”

क्या मनुष्य पशुओं जैसे ही हैं?

18 लोग एक दूसरे के प्रति जो कुछ करते हैं उनके बारे में मैंने सोचा और अपने आप से कहा, “परमेश्वर चाहता है कि लोग अपने आपको उस रूप में देखें जिस रूप में वे पशुओं को देखते हैं।” 19 क्या एक व्यक्ति एक पशु से उत्तम हैं? नहीं। क्यों? क्योंकि हर वस्तु नाकारा है। मृत्यु जैसे पशुओं को आती है उसी प्रकार मनुष्यों को भी। मनुष्य और पशु एक ही श्वास लेते हैं। क्या एक मरा हुआ पशु एक मरे हुए मनुष्य से भिन्न होता है? 20 मनुष्यों और पशुओं की देहों का अंत एक ही प्रकार से होता है। वे मिट्टी से पैदा होते हैं और अंत में वे मिट्टी में ही जाते हैं। 21 कौन जानता है कि मनुष्य की आत्मा का क्या होता है? क्या कोइ जानता है कि एक मनुष्य की आत्मा परमेश्वर के पास जाती है जबकि एक पशु की आत्मा नीचे उतरकर धरती में जा समाती है?

22 सो मैंने यह देखा कि मनुष्य जो सबसे अच्छी बात कर सकता है वह यह है कि वह अपने कर्म में आनन्द लेता रहे। बस उसके पास यही है। किसी व्यक्ति को भविष्य की चिन्ता भी नहीं करनी चाहिये। क्योंकि भविष्य में क्या होगा उसे देखने में कोई भी उसकी सहायता नहीं कर सकता।

समीक्षा

अर्थहीनता के बजाय उद्देश्य को खोजिये

"मनुष्य जो धरती पर मन लगा लगाकर परिश्रम करता है उससे उसको क्या लाभ होता है?" (2:22)। यह भाव "सूर्य के नीचे" इस पुस्तक में अठ्ठाईस बार लिखा है। यह अर्थ के लिए एक खोज का वर्णन करता है जो कभी भी इस जीवन और इस विश्व के परे नहीं जाता है।

सभोपदेशक कहानी है अर्थ के लिए एक व्यक्ति की चिंतित तलाश। 3000 साल पहले सुलैमान के रूप में, लेखक विभिन्न क्षेत्रों की खोज करते हैं।

जॉयस मेयर लिखती हैं,"सुलैमान एक व्यस्त व्यक्ति थे; उन्होंने वह सब जाँचा जो जाँच सकते थे और वह सब किया जो वहाँ पर करने के लिए था, लेकिन उनके अनुभव के अंत में, वह परिपूर्ण न हुए और कड़वे हो गए..निचोड़ लिए गए, निराश हो गए और उदास हो गए।" सभोपदेशक जीवन के विषय में इन निराशाओं को व्यक्त करता है।

यूजन पीटरसन लिखते हैं,"सभोपदेशक इसे परमेश्वर के बारे में अधिक नहीं कहते हैं; लेखक इसे बाईबल की दूसरी पैंसठ किताबों पर छोड़ देते हैं। उनका काम है यह दिखाना कि अपने आपसे हमारे जीवन के अर्थ और परिपूर्णता को पाने में हम पूरी तरह से असक्षम हैं...यह प्रकट करना है और हर अक्खड़ और अज्ञात अपेक्षा को नकारना है कि हम अपनी शर्तों से अपना जीवन जी सकते हैं।"

सुलैमान पता लगाते हैं कि "सबकुछ बेकार है, बहुत बेकार है – कोई भी इसमें अर्थ नहीं पाता है" (व.1:8, एम.एस.जी)। "उसके सब दिन तो दुखों से भरे रहते हैं, और उसका काम खेद के साथ होता है, रात को भी उसका मन चैन नहीं पाता। यह भी व्यर्थ ही है" (2:23, एम.एस.जी)।

  1. बुद्धिमान होना

वह "बुद्धि" और "ज्ञान" के पीछे जाने से शुरुवात करते हैं (1:18अ), लेकिन यह केवल "बहुत दुख" और "बहुत शोक" लाता है (व.18ब)। "जितना अधिक आप जानते, उतना अधिक आप चोट खाते हैं" (व.18ब, एम.एस.जी)। बुद्धि और ज्ञान को प्राप्त करना चिंता के अंतिम कारण से नहीं निपटता है – व्यर्थता।

  1. सुखवाद

सुखवाद एक शिक्षा है कि आनंद अच्छा और उचित लक्ष्य है। "मैंने अपने आपसे कहा,"चल, मैं तुझ को आनंद के द्वारा जाचूँगा, इसलिये आनंदित और मगन हो" (2:1, एम.एस.जी)। वह "हँसी" के द्वारा बावलेपन को जाँचते हैं (व.2)। "वह दाखमधु पीकर मन बहलाते हैं" (व.3)। "मैंने अपने लिए गायकों और गायिकाओं को रखा" (व.8)। वह यौन संबंध का आनंद उठाते हैं,"और कामनियाँ भी" (व.8ब)। असल में सुलैमान की 700 पत्नियाँ और 300 दासियाँ थी। और इससे भी वह संतुष्ट नहीं हुए।

वह अंत में कहते हैं,"तब मैं ने फिर से अपने हाथों के सब कामों को, अपने सब परिश्रम को देखा, तो क्या देखा कि सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है" (व.11)। वह आनंद की विडंबना का अनुभव करते हैं –घटने का नियम वापस आता है। लोग जितना अधिक आनंद की खोज करते हैं, उतना ही कम उन्हें मिलता है।

  1. भौतिकता

भौतिकता "प्रवत्ति है कि आत्मिक मूल्य के लिए भौतिक संपत्ति रखें।" वह विभिन्न "कार्य" करते हैं (व.4)। वह जायदाद को प्राप्त करते हैं (वव.4-6)। उनके पास काम करने के लिए बहुत से पुरुष और महिलाएँ होती हैं (व.7)। उनके पास बहुत सी संपत्ति हैं (व.7ब)। वह पैसा प्राप्त करते हैं:"मैंने चाँदी और सोना और राजाओं और प्रांतो के बहुमूल्य पदार्थों का भी संग्रह किया" (व.8)। वह महानता, सफलता और यश प्राप्त करते हैं (व.9)। उनके पास एक सफल नौकरी और कैरिअर है (व.10ब)। तब भी मृत्यु इस संपूर्ण खोज को "व्यर्थ" कर देती है (व.16-18)।

सभोपदेशक ऐसा प्रश्न उठाता है जिसका उत्तर नये नियम में है। अर्थ "सूर्य के नीचे नहीं" बल्कि,"पुत्र में मिलता है।"

प्रार्थना

परमेश्वर, आपका धन्यवाद क्योंकि यीशु में, मैं व्यर्थता की चिंता के लिए उत्तर को पाता हूँ। आपका धन्यवाद कि उनमें मैं सच्ची शांति और मेरे जीवन के लिए उद्देश्य को पाता हूँ।

पिप्पा भी कहते है

सभोपदेशक 3:1

"हर चीज का एक समय है..."

लेकिन एक वर्ष में बाईबल के लिए अधिक समय नहीं लगता है (यद्यपि मैं छुट्टि पर हूँ!)।

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संदर्भ

युयून पीटरसन, द मैसेज,"सभोपदेशक का परिचय," (नवप्रेस, 1993), पी.882

जॉयस मेयर, द एव्रीडे लाईफ बाईबल, (फेथवर्ड्स, 2014) पी.1017

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