दिन 234

अपनी शांति को बनाए रखें

बुद्धि भजन संहिता 101:1-8
नए करार 1 कुरिन्थियों 14:20-40
जूना करार 2 इतिहास 13:1-15:19

परिचय

सन 1555 में, लंदन के एक पूर्वी बिशप, निकोलस रिडले को उनके विश्वास के कारण ऑक्सफर्ड में खंभे से बाँधकर जला दिया गया था। रिडले की हत्या से पहली रात में, उनके भाई ने उनसे कहा था कि वह बंदीगृह में उनके साथ रहेंगे ताकि कुछ मदद और शांति दे सकें। निकोलस ने मना कर दिया और जवाब दिया कि वह बिस्तर पर जाकर उसी तरह से सोना चाहते थे जैसा कि वह अपने जीवन में हमेशा करते थे। वह अपनी जरुरतों को पूरा करने के लिए अपने प्रभु की अनंत भुजाओं की सामर्थ में विश्राम कर सकते थे, क्योंकि वह परमेश्वर की शांति को जानते थे।

शांति एक महान आशीष है। बाईबल में शब्द 'शांति' का एक बड़ा महत्व है। शांति के लिए इब्रानी शब्द, शालोम, ग्रीक शब्द ईरेन के द्वारा अनुवादित है, इसका अर्थ है युद्ध या शत्रुता की भावना की अनुपस्थिति से, कहीं परे रहना। यह किसी परिस्थिति की अनुपस्थिति नहीं बल्कि परमेश्वर की उपस्थिति और उनका राज्य करना है। इसका अर्थ है परिपूर्णता, विवेकशीलता, कुशल-क्षेम, परमेश्वर के साथ एकता – हर प्रकार की आशीष और भलाई।

दूसरों को शांति देने के लिए, हमें पहले अपने अंदर की शांति को खोजना है और इसे बनाए रखना है।

बुद्धि

भजन संहिता 101:1-8

दाऊद का एक गीत।

101मैं प्रेम और खरेपन के गीत गाऊँगा।
 यहोवा मैं तेरे लिये गाऊँगा।
2 मैं पूरी सावधानी से शुद्ध जीवन जीऊँगा।
 मैं अपने घर में शुद्ध जीवन जीऊँगा।

 हे यहोवा तू मेरे पास कब आयेगा
3 मैं कोई भी प्रतिमा सामने नहीं रखूँगा।
 जो लोग इस प्रकार तेरे विमुख होते हैं, मुझो उनसे घृणा है।
 मैं कभी भी ऐसा नहीं करूँगा।

4 मैं सच्चा रहूँगा।
 मैं बुरे काम नहीं करूँगा।
5 यदि कोई व्यक्ति छिपे छिपे अपने पड़ोसी के लिये दुर्वचन कहे,
 मैं उस व्यक्ति को ऐसा करने से रोकूँगा।
 मैं लोगों को अभिमानी बनने नहीं दूँगा
 और मैं उन्हें सोचने नहीं दूँगा, कि वे दूसरे लोगों से उत्तम हैं।

6 मैं सारे ही देश में उन लोगों पर दृष्टि रखूँगा।
 जिन पर भरोसा किया जा सकता और मैं केवल उन्हीं लोगों को अपने लिये काम करने दूँगा।
 बस केवल ऐसे लोग मेरे सेवक हो सकते जो शुद्ध जीवन जीते हैं।
7 मैं अपने घर में ऐसे लोगों को रहने नहीं दूँगा जो झूठ बोलते हैं।
 मैं झूठों को अपने पास भी फटकने नहीं दूँगा।

8 मैं उन दुष्टों को सदा ही नष्ट करूँगा, जो इस देश में रहते है।
 मै उन दुष्ट लोगों को विवश करूँगा, कि वे यहोवा के नगर को छोड़े।

समीक्षा

परमेश्वर के साथ शांति

'शांति ' और 'चुप रहना' – शब्द सकारात्मक रूप में – अक्सर साथ साथ जाते हैं। यह भजन निंदा करनेवाले और दुष्ट को 'चुप करने' के विषय में बताता है (वव.5-8)।

दाऊद परमेश्वर के 'प्रेम और न्याय' के गीत गाते हैं (व.1अ)। हम परमेश्वर के प्रेम के विषय में बहुत अधिक बातें करते हैं, लेकिन उनके न्याय के बारे में इतना नहीं करते, जो कि उतना ही महत्वपूर्ण है। न्याय की चिंता के बिना प्रेम, सच्चा प्रेम नहीं, क्योंकि प्रेम न्याय को पुकारता है।

केवल 'निर्दोष' (वव.2,6) 'उनके साथ रह' सकते हैं (व.6ब), उनकी 'सेवा कर सकते' हैं (व.6क), उनकी 'उपस्थिति में खड़े' रह सकते हैं (व.7)। निंदा (व.5अ), घमंड (व.5ब) और 'धोखा' (व.7) मुंह, हृदय और कार्य के पाप हैं। वे हमें परमेश्वर के दंड के अधीन करते हैं।

क्रूस के लिए परमेश्वर का धन्यवाद हो, जहाँ पर हमें 'प्रेम' और 'न्याय' मिलता है – सच्चाई और दया मिलती है। यहीं पर परमेश्वर 'सत्यनिष्ठ' हैं, और वे उन्हें सत्यनिष्ठ ठहराते हैं, जो उनमें विश्वास करते हैं (रोमियों 3:23-26)। क्रूस के बिना हम परमेश्वर से अलग हो जाएँगे (भजनसंहिता 101:8)।

प्रार्थना

पिता, आपका धन्यवाद क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, मैं विश्वास के द्वारा सत्यनिष्ठ ठहरा हूँ, और आपके साथ शांति में हूँ (रोमियो 5:1)। मेरी सहायता किजिए कि मैं प्रेम, न्याय और शांति के इस संदेश को विश्व में लाऊँ।

नए करार

1 कुरिन्थियों 14:20-40

20 हे भाईयों, अपने विचारों में बचकाने मत रहो बल्कि बुराइयों के विषय में अबोध बच्चे जैसे बने रहो। किन्तु अपने चिन्तन में सयाने बनो। 21 जैसा कि शास्त्र कहता है:

“उनका उपयोग करते हुए
जो अन्य बोली बोलते हैं,
उनके मुखों का उपयोग करते हुए जो पराए हैं।
मैं इनसे बात करूँगा,
पर तब भी ये मेरी न सुनेंगे।”

प्रभु ऐसा ही कहता है।

22 सो दूसरी भाषाएँ बोलने का वरदान अविश्वासियों के लिए संकेत है न कि विश्वासियों के लिये। जबकि परमेश्वर की ओर से बोलना अविश्वासियों के लिये नहीं, बल्कि विश्वासियों के लिये है। 23 सो यदि समूचा कलीसिया एकत्र हो और हर कोई दूसरी-दूसरी भाषाओं में बोल रहा हो तभी बाहर के लोग या अविश्वासी भीतर आ जायें तो क्या वे तुम्हें पागल नहीं कहेंगे। 24 किन्तु यदि हर कोई परमेश्वर की ओर से बोल रहा हो और तब तक कुछ अविश्वासी या बाहर के आ जाएँ तो क्या सब लोग उसे उसके पापों का बोध नहीं करा देंगे। सब लोग जो कह रहे हैं, उसी पर उसका न्याय होगा। 25 जब उसके मन के भीतर छिपे भेद खुल जायेंगे तब तक वह यह कहते हुए “सचमुच तुम्हारे बीच परमेश्वर है” दण्डवत प्रणाम करके परमेश्वर की उपासना करेगा।

तुम्हारी सभाएँ और कलीसिया

26 हे भाईयों, तो फिर क्या करना चाहिये? तुम जब इकट्ठे होते हो तो तुममें से कोई भजन, कोई उपदेश और कोई आध्यात्मिक रहस्य का उद्घाटन करता है। कोई किसी अन्य भाषा में बोलता है तो कोई उसकी व्याख्या करता है। ये सब बाते कलीसिया की आत्मिक सुदृढ़ता के लिये की जानी चाहिये। 27 यदि किसी अन्य भाषा में बोलना है तो अधिक से अधिक दो या तीन को ही बोलना चाहिये-बारी-बारी, एक-एक करके। और जो कुछ कहा गया है, एक को उसकी व्याख्या करनी चाहिये। 28 यदि वहाँ व्याख्या करने वाला कोई न हो तो बोलने वाले को चाहिये कि वह सभा में चुप ही रहे और फिर उसे अपने आप से और परमेश्वर से ही बातें करनी चाहिये।

29 परमेश्वर की ओर से उसके दूत के रूप में बोलने का जिन्हें वरदान मिला है, ऐसे दो या तीन व्यक्तियों को ही बोलना चाहिये और दूसरों को चाहिये कि जो कुछ उन्होंने कहा है, वे उसे परखते रहें। 30 यदि वहाँ किसी बैठे हुए पर किसी बात का रहस्य उद्घाटन होता है तो परमेश्वर की ओर से बोल रहे पहले वक्ता को चुप हो जाना चाहिये। 31 क्योंकि तुम एक-एक करके परमेश्वर की ओर से बोल सकते हो ताकि सभी लोग सीखेंऔरप्रोत्साहित हों। 32 नबियों की आत्माएँ नबियों के वश में रहती हैं। 33 क्योंकि परमेश्वर अव्यवस्था नहीं, शांति देता है। जैसा कि सन्तों की सभी कलीसियों में होता है।

34 स्त्रियों को चाहिये कि वे सभाओं में चुप रहें क्योंकि उन्हें बोलने की अनुमति नहीं है। बल्कि जैसा कि व्यवस्था के विधान में भी कहा गया है, उन्हे दब कर रहना चाहिये। 35 यदि वे कुछ जानना चाहती हैं तो उन्हें घर पर अपने-अपने पति से पूछना चाहिये क्योंकि एक स्त्री के लिये यह शोभा नहीं देता कि वह सभा में बोले।

36 क्या परमेश्वर का वचन तुमसे उत्पन्न हुआ? या वह मात्र तुम तक पहुँचा? निश्चित ही नहीं। 37 यदि कोई सोचता है कि वह नबी है अथवा उसे आध्यात्मिक वरदान प्राप्त है तो उसे पहचान लेना चाहिये कि मैं तुम्हें जो कुछ लिख रहा हूँ, वह प्रभु का आदेश है। 38 सो यदि कोई इसे नहीं पहचान पाता तो उसे भी नहीं पहचाना जायेगा।

39 इसलिए हे मेरे भाईयों, परमेश्वर की ओर से बोलने को तत्पर रहो तथा दूसरी भाषाओं में बोलने वालों को भी मत रोको। 40 किन्तु ये सभी बातें सही ढ़ंग से और व्यवस्थानुसार की जानी चाहियें।

समीक्षा

चर्च में शांति

'परमेश्वर गड़बड़ी के परमेश्वर नहीं बल्कि शांति के परमेश्वर हैं' (व.33)। पौलुस प्रेरित इस बात के प्रति स्पष्ट हैं कि आत्मा के वरदानों की रचनात्मकता और स्वाभाविकता, चर्च सभाओं में गड़बड़ी की अनुमति नहीं देते हैं। 'क्योंकि परमेश्वर गड़बड़ी के नहीं, परन्तु शान्ति के परमेश्वर हैं। जैसा पवित्र लोगों की सब कलीसिया में है।' (व.33, एम.एस.जी)।

पौलुस चर्च में शांतिमय, तालमेल और व्यवस्था के तरीके का वर्णन करते हैं -' सारी बातें शालीनता और व्यवस्थित रूप से की जाएँ' (व.40)। शायद से इसमें उचित रीति से चुप रहना पड़े (व.28) ताकि दूसरों को बोलने दे।

यह हमें बताता है कि आरंभिक कलिसिया में चर्च की सभाएँ कैसे होती थीं। स्पष्ट रूप से, वहाँ पर अपेक्षा की जाती थी कि नियमित रूप से आत्मा के वरदानों का अभ्यास किया जाएः' जब तुम इकट्ठे होते हो, तो हर एक के हृदय में भजन या उपदेश या अन्य भाषा या प्रकाश या अन्य भाषा का अर्थ बताना रहता है' (व.26)।

एक सही क्रम में वरदानों का अभ्यास किया जान चाहिए। आत्मिक वरदानों के विषय में कुछ भी विचित्र नहीं होना चाहिए। यह बात शायद से कुछ लोगों को चकित कर दे कि गायिका केटी पेरी ने एक बार कहा, 'अन्यभाषाओं में बोलना मेरे लिए उतनी ही सामान्य बात है जैसा कि 'खाने में नमक डालना।' यह परमेश्वर से की जानेवाली एक गुप्त, सीधी प्रार्थना भाषा है।'

पौलुस की टिप्पणी की भविष्यवाणी और अन्यभाषाएँ एक 'चिह्न' है, जो अक्सर उलझन में डालती है। उन्होंने व.22 में कहा (अन्यभाषाएँ अविश्वासीयों के लिए एक चिह्न है; भविष्यवाणी विश्वासीयों के लिए), और फिर व.23 में इसके विपरीत! ऐसा नहीं है कि पौलुस अपनी बात का विरोध करें।

मुझे लगता है कि पौलुस कह रहे हैं कि अन्यभाषा में बोलने के वरदान और भविष्यवाणी के वरदान को केवल उनके उचित तरीके से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इस पूरे अध्याय में पौलुस चर्च में व्यवस्थित तरीके से अन्यभाषाओं और भविष्यवाणी का इस्तेमाल किए जाने के विषय में निर्देश दे रहे हैं। जब अनुचित रीति से इसका इस्तेमाल किया जाता है, तो दोंनो ही गड़बड़ी का कारण हो सकते हैं (वव.6-12 और वव.29-33), जिसके कारण अविश्वासी सोचेंगे कि हम पागल है।

यदि चर्च सभाओं के संदर्भ के अंतर्गत उचित रीति से इस्तेमाल किया जाए, तो अन्यभाषाएँ और भविष्यवाणी दोनों ही परमेश्वर की उपस्थिति के एक अद्भुत संकेत ठहरेंगे (वव.22-25)। भविष्यवाणी अविश्वासीयों के लिए एक शक्तिशाली 'चिह्न' हो सकता है कि 'परमेश्वर सच में तुम्हारे बीच में है' (व.25)। हमने अक्सर ऐसा होते हुए देखा है।

जबकि अन्यभाषाओं में गाना एक सामूहिक गतिविधी है, अन्यभाषाओं में बोलना एक ऐसे व्यक्ति की गतिविधी है जिसमें अनुवाद किए जाने की आवश्यकता है। इसलिए, ' यदि अन्य भाषा में बातें करनी हों तो दो या ज्यादा से ज्यादा तीन जन बारी – बारी से बोलें, और एक व्यक्ति अनुवाद करे। परन्तु यदि अनुवाद करनेवला न हो, तो अन्य भाषा बोलनेवाला कलीसिया में शान्त रहे, और अपने मन से और परमेश्वर से बातें करे' (वव.27-28)।

इसी तरह से, भविष्यवाणी को बारी बारी से करना चाहिए। भविष्यवाणी की संख्या की कोई सीमा नहीं है। बोलनेवाला हमेशा पूर्ण नियंत्रण में होता हैः ' भविष्यद्वक्ताओं की आत्मा भविष्यद्वक्ताओं के वश में है ' (व.32)। शैतानी विश्व में, 'आत्मा' एक व्यक्ति का नियंत्रण ले लेता है और वे नियंत्रण खो देते हैं। पवित्र आत्मा के साथ ऐसा नहीं है। अन्यभाषा में बोलनेवाला व्यक्ति या भविष्यवाणी करनेवाला पूर्ण नियंत्रण में होता है। वे जब चाहें शुरुवात कर सकते हैं और वे जब चाहें रुक सकते हैं। ' क्योंकि परमेश्वर गड़बड़ी का नहीं, परन्तु शान्ति का परमेश्वर है' (व.33)।

पौलुस के इस निर्देशन के लिए बहुत से स्पष्टीकरण आगे रखे गए हैं कि महिलाओं को चर्च में चुप रहना चाहिए (व.34)। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि यहाँ पर पौलुस का ध्यान लैंगिग भूमिका पर नहीं है लेकिन सामूहिक आराधना के प्रबंध पर। वह उन परेशानीयों की श्रृंखला को संबोधित कर रहे हैं जो कुरिंथ की कलिसिया में उठे हैं। उन्होंने पहले ही इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि वह चाहते हैं कि महिलाएँ सभाओं में बोलें। वह लिखते हैं, 'हर महिला जो प्रार्थना या भविष्यवाणी करती है...' (11:5)।

यह बात स्पष्ट है कि पुरुष और महिला, दोनों ही केवल ग्राहक के रूप में नहीं बल्कि वितरक के रूप में आये हैं। हमें यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए कि 'मुझे चर्च से क्या मिल रहा है?' बल्कि, ' मैं चर्च में क्या दे रहा हूँ?' वे केवल ग्रहण करने के लिए नहीं आए थे बल्कि दूसरों की सहायता करने के लिए भी आए थे। ' जब तुम इकट्ठे होते हो, तो हर एक किसी चीज के साथ तैयार रहे जो सभी के लिए लाभदायक हो' (14:26, एम.एस.जी)। यदि हम सभी चर्च में योगदान करनेवाले के व्यवहार के साथ आएँगे, तो यह हमारी आराधना सभाओं को पूरी तरह से बदल देगा।

प्रार्थना

परमेश्वर, हमारी सहायता किजिए की हमारी सभी सभाओं में और दूसरी सभाओ में पवित्र आत्मा के वरदानों का अभ्यास करे, इस तरह से कि जब लोग चर्च में आए वे 'दंडवत करते हुए, परमेश्वर की आराधना करके कहें, 'परमेश्वर सच में तुम्हारे बीच है' (व.25)।

जूना करार

2 इतिहास 13:1-15:19

यहूदा का राजा अबिय्याह

13जब राजा यारोबाम इस्राएल के राजा के रूप में अट्ठारहवें वर्ष में था अबिय्याह यहूदा का नया राजा बना। 2 अबिय्याह यरूशलेम में तीन वर्ष तक राजा रहा। अबिय्याह की माँ मीकायाह थी। मीकायाह, ऊरीएल की पुत्री थी। ऊरीएल गिबा नगर का था और वहाँ अबिय्याह और यारोबाम के बीच युद्ध चल रहा था। 3 अबिय्याह की सेना में चार लाख वीर सैनिक थे। यारोबाम ने अबिय्याह के विरुद्ध युद्ध के लिये तैयारी की। उसके पास आठ लाख वीर सैनिक थे।

4 तब अबिय्याह एप्रैम के पर्वतीय प्रदेश में समारैम पर्वत पर खड़ा हुआ। अबिय्याह ने कहा, “यारोबाम और सारे इस्राएली मेरी बात सुनों! 5 तुम लोगों को जानना चाहिये कि यहोवा, इस्राएल के प्ररमेश्वर ने दाऊद और उसकी सन्तानों को इस्राएल का राजा होने का अधिकार सदैव के लिये दिया है। यहोवा ने दाऊद को यह अधिकार नमकवाली वाचा के साथ दिया। 6 किन्तु यारोबाम अपने स्वामी के विरुद्ध हो गया! यारोबाम जो नबात का पुत्र था, दाऊद के पुत्र सुलैमान के अधिकारियों में से एक था। 7 तब निकम्मे, बुरे व्यक्ति यारोबाम के मित्र हो गए तथा यारोबाम और वे बुरे व्यक्ति सुलैमान के पुत्र रहूबियाम के विरुद्ध हो गये। रहूबियाम युवक था और उसे अनुभव नहीं था। इसलिये रहूबियाम यारोबाम और उसके बुरे मित्रों को रोक न सका।

8 “तुम लोगों ने परमेश्वर के राज्य, जो दाऊद के पुत्रों द्वारा शासित है, हराने की योजना बनाई है। तुम लोगों की संख्या बहुत है और यारोबाम का तुम्हारे लिये बनाया गया सोने का बछड़ा तुम्हारा ईश्वर है! 9 तुम लोगों ने हारून के वंशज यहोवा के याजकों और लेवीवंशियों को निकाल बाहर किया है। तुमने पृथ्वी के अन्य देशों के समान अपने याजकों को चुना है। तब तो कोई भी व्यक्ति जो एक युवा बैल और सात मेंढ़े लाये, उन झूठे ‘ईश्वरों’ की सेवा करने वाला याजक बन सकता है।

10 “किन्तु जहाँ तक हमारी बात है यहोवा हमारा परमेश्वर है। हम यहूदा के निवासी लोगों ने यहोवा की आज्ञा पालन से इन्कार किया नहीं है! हम लोगों ने उसको छोड़ा नहीं है! जो याजक यहोवा की सेवा करते हैं, वे हारून की सन्तान हैं और लेवीवंशी यहोवा की सेवा करने में याजकों की सहायता करते हैं। 11 वे होमबलि चढ़ाते हैं और धूप की सुगन्धि यहोवा को हर सुबह— शाम जलाते हैं। वे मन्दिर में विशेष मेज पर रोटियाँ पंक्तियों में रखते भी हैं और वे सोने के दीपाधार पर रखे हुए दीपकों की देखभाल करते हैं ताकि हर संध्या को वह प्रकाश के साथ चले। हम लोग यहोवा, अपने परमेश्वर की सेवा सावधानी के साथ करते हैं। किन्तु तुम लोगों ने उसको छोड़ दिया है। 12 स्वयं परमेश्वर हम लोगों के साथ है। वह हमारा शासक है और उसके याजक हमारे साथ हैं। परमेश्वर के याजक अपनी तुरही तुम्हें जगाने और तुम्हें उसके पास आने को उत्साहित करने के लिये फूँकते हैं! ऐ इस्राएल के लोगो, अपने पूर्वजों के यहोवा, परमेश्वर के विरुद्ध मत लड़ो! क्योंकि तुम सफल नहीं होगे!”

13 किन्तु यारोबाम ने सैनिकों की एक टुकड़ी को चुपके—चुपके गुप्त रूप से अबिय्याह की सेना के पीछे भेजा। यारोबाम की सेना अबिय्याह की सेना के सामने थी। यारोबाम की सेना के गुप्त सैनिक अबिय्याह की सेना के पीछे थे। 14 जब अबिय्याह की सेना के यहूदा के सैनिकों ने चारों ओर देखा तो उन्होंने यारोबाम की सेना को आगे और पीछे से आक्रमण करते पाया। यहूदा के लोगों ने यहोवा को जोर से पुकारा और याजकों ने तुरहियाँ बजाईं। 15 तब अबिय्याह की सेना के लोगों ने उद्घोष किया। जब यहूदा के लोगों ने उद्घोष किया तो परमेश्वर ने यारोबाम की सेना को हरा दिया। इस्राएल की सारी यारोबाम की सेना अबिय्याह की यहूदा की सेना द्वारा हरा दी गई। 16 इस्राएल के लोग यहूदा के लोगों के सामने भाग खड़े हुए। परमेश्वर ने यहूदा की सेना द्वारा इस्राएल की सेना को हरवा दिया। 17 अबिय्याह की सेना ने इस्राएल की सेना को बुरी तरह हराया और इस्राएल के पाँच लाख उत्तम योद्धा मारे गये। 18 इस प्रकार उस समय इस्राएल के लोग पराजित और यहूदा के लोग विजयी हुए। यहूदा की सेना विजयी हुई क्योंकि वह अपने पूर्वजों के परमेश्वर, यहोवा पर आश्रित रही।

19 अबिय्याह की सेना ने यारोबाम की सेना का पीछा किया। अबिय्याह की सेना ने यारोबाम से बेतेल, यशाना तथा एप्रोन नगरों को ले लिया। उन्होंने उन नगरों और उनके आस पास के छोटे गावों पर अधिकार कर लिया।

20 यारोबाम पर्याप्त शक्तिशाली फिर कभी नहीं हुआ जब तक अबिय्याह जीवित रहा। यहोवा ने यारोबाम को मार डाला। 21 किन्तु अबिय्याह शक्तिशाली हो गया। उसने चौदह स्त्रियों से विवाह किया और वह बाईस पुत्रों तथा सोलह पुत्रियों का पिता था। 22 अन्य जो कुछ अबिय्याह ने किया, वह इद्दो नबी की पुस्तकों में लिखा है।

14अबिय्याह ने अपने पूर्वजों के साथ विश्राम लिया। लोगों ने उसे दाऊद के नगर में दफनाया। तब अबिय्याह का पुत्र आसा अबिय्याह के स्थान पर नया राजा हुआ। आसा के समय में देश में दस वर्ष शान्ति रही।

यहूदा का राजा आसा

2 आसा ने यहोवा परमेश्वर के सामने अच्छे और ठीक काम किये। 3 आसा ने उन विचित्र वेदियों को हटा दिया जिनका उपयोग मूर्तियों की पूजा के लिये होता था। आसा ने उच्च स्थानों को हटा दिया और पवित्र पत्थरों को नष्ट कर दिया और आसा ने अशेरा स्तम्भों को तोड़ डाला। 4 आसा ने यहूदा के लोगों को पूर्वजों के यहोवा परमेश्वर का अनुसरण करने का आदेश दिया। वह वही परमेश्वर है जिसका अनुसरण उनके पूर्वजों ने किया था और आसा ने लोगों को यहोवा के नियमों और आदेशों को पालन करने का आदेश दिया। 5 आसा ने उच्च स्थानों को और सुगन्धि की वेदियों को यहूदा के सभी नगरों से हटाया। इस प्रकार जब आसा राजा था, राज्य शान्त रहा। 6 आसा ने यहूदा में शान्ति के समय शक्तिशाली नगर बनाए। आसा इन दिनों युद्ध से मुक्त रहा क्योंकि यहोवा ने उसे शान्ति दी।

7 आसा ने यहूदा के लोगों से कहा, “हम लोग इन नगरों को बनाऐं और इनके चारों ओर चारदीवारी बनाऐं। हम गुम्बद, द्वार और द्वारों में छड़ें लगायें। जब तक हम लोग देश में हैं, यह करें। यह देश हमारा है क्योंकि हम लोगों ने अपने यहोवा परमेश्वर का अनुसरण किया है। उसने हम लोगों को सब ओर से शान्ति दी है।” इसलिये उन्होंने यह सब बनाया और वे सफल हुए।

8 आसा के पास यहूदा के परिवार समूह से तीन लाख और बिन्यामीन के परिवार समूह से दो लाख अस्सी हज़ार सेना थी। यहूदा के लोग बड़ी ढालें और भाले ले चलते थे। बिन्यामीन के लोग छोटी ढालें और धनुष से चलने वाले बाण ले चलते थे। वे सभी बलवान और साहसी योद्धा थे।

9 तब जेरह आसा की सेना के विरुद्ध आया। जेरह कूश का था। जेरह की सेना में एक लाख व्यक्ति और तीन सौ रथ थे। जेरह की सेना मारेशा नगर तक गई। 10 आसा जेरह के विरुद्ध लड़ने के लिये गया। आसा की सेना मारेशा के निकट सापता घाटी में युद्ध के लिये तैयार हुई।

11 आसा ने यहोवा परमेश्वर को पुकारा और कहा, “यहोवा, केवल तू ही बलवान लोगों के विरुद्ध कमजोर लोगों की सहायता कर सकता है! हे मेरे यहोवा परमेश्वर हमारी सहायता कर! हम तुझ पर आश्रित हैं। हम तेरे नाम पर इस विशाल सेना से युद्ध करते हैं। हे यहोवा, तू हमारा परमेश्वर है! अपने विरुद्ध किसी को जीतने न दे!”

12 तब यहोवा ने यहूदा की ओर से आसा की सेना का उपयोग कूश की सेना को पराजित करने के लिये किया और कूश की सेना भाग खड़ी हुई। 13 आसा की सेना ने कूश की सेना का पीछा लगातार गरार नगर तक किया। इतने अधिक कूश के लोग मारे गए कि वे युद्ध करने योग्य एक सेना के रूप में फिर इकट्ठे न हो सके। वे यहोवा और उसकी सेना के द्वारा कुचल दिये गये। आसा और उसकी सेना ने शत्रु से अनेक बहुमूल्य चीज़ें ले लीं। 14 आसा और उसकी सेना ने गरार के निकट के सभी नगरों को हराया। उन नगरों में रहने वाले लोग यहोवा से डरते थे। उन नगरों में असंख्य बहुमूल्य चीज़ें थीं। आसा की सेना उन नगरों से इन बहुमूल्य चीज़ों को साथ ले आई। 15 आसा की सेना ने उन डेरों पर भी आक्रमण किया जिनमें गड़रिये रहते थे। वे अनेक भेड़ें और ऊँट ले आए। तब आसा की सेना यरूशलेम लौट गई।

आसा के परिवर्तन

15परमेश्वर की आत्मा अजर्याह पर उतरी। अजर्याह ओदेद का पुत्र था। 2 अजर्याह आसा से मिलने गया। अजर्याह ने कहा, “आसा तथा यहूदा और बिन्यामीन के सभी लोगो मेरी सुनो! यहोवा तुम्हारे साथ तब है जब तुम उसके साथ हो। यदि तुम यहोवा को खोजोगे तो तुम उसे पाओगे। किन्तु यदि तुम उसे छोड़ोगे तो वह तुम्हें छोड़ देगा। 3 बहुत समय तक इस्राएल सच्चे परमेश्वर के बिना था और वे शिक्षक याजक और नियम के बिना थे। 4 किन्तु जब इस्राएल के लोग कष्ट में पड़े तो वे फिर इस्राएल के यहोवा परमेश्वर की ओर लौटे। उन्होंने यहोवा की खोज की और उसको उन्होंने पाया। 5 उन विपत्ति के दिनों में कोई व्यक्ति सुरक्षित यात्रा नहीं कर सकता था। सभी राष्ट्र बहुत अधिक उपद्रव ग्रस्त थे। 6 एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को और एक नगर दूसरे नगर को नष्ट करता था। यह इसलिये हो रहा था कि परमेश्वर हर प्रकार की विपत्तियों से उनको परेशान कर रहा था। 7 किन्तु आसा, तुम तथा यहूदा और बिन्यामीन के लोगो, शक्तिशाली बनो। कमजोर न पड़ो, ढीले न पड़ो क्योंकि तुम्हें अपने अच्छे काम का पुरस्कार मिलेगा!”

8 आसा ने जब इन बातों और ओदेद नबी के सन्देश को सुना तो वह बहुत उत्साहित हुआ। तब उसने सारे यहूदा और बिन्यामीन देश से घृणित मूर्तियों को हटा दिया और उसने एप्रैम के पहाड़ी प्रदेश में अपने अधिकार में लाए गए नगरों में मूर्तियों को हटाया और उसने यहोवा की उस वेदी की मरम्मत की जो यहोवा के मन्दिर के द्वार मण्डप के सामने थी।

9 तब आसा ने यहूदा और बिन्यामीन के सभी लोगों को इकट्ठा किया। उसने एप्रैम, मनश्शे और शिमोन परिवारों को भी इकट्ठा किया जो इस्राएल देश से यहूदा देश में रहने के लिये आ गए थे। उनकी बहुत बड़ी संख्या यहूदा में आई क्योंकि उन्होंने देखा कि आसा का यहोवा परमेश्वर, आसा के साथ है।

10 आसा के शासन के पन्द्रहवें वर्ष के तीसरे महीने में आसा और वे लोग यरूशलेम में इकट्ठे हुए। 11 उस समय उन्होंने यहोवा को सात सौ बैलों और सात हज़ार भेड़ों और बकरों की बलि दी। आसा की सेना ने उन जानवरों और अन्य बहुमूल्य चीज़ों को अपने शत्रुओं से लिया था। 12 तब उन्होंने पूर्वजों के यहोवा परमेश्वर की सेवा पूरे हृदय और पूरी आत्मा से करने की वाचा की। 13 कोई व्यक्ति जो यहोवा परमेश्वर की सेवा से इन्कार करता था, मार दिया जाता था। इस बात का कोई महत्व नहीं था कि वह व्यक्ति महत्त्वपूर्ण या साधारण है अथवा पुरुष या स्त्री है। 14 तब आसा और लोगों ने यहोवा की शपथ ली। उन्होंने उच्च स्वर में उद्घोष किया। उन्होंने तुरही और मेढ़ों के सींगे बजाए। 15 यहूदा से सभी लोग प्रसन्न थे क्योंकि उन्होंने पूरे हृदय से शपथ ली थी। उन्होंने पूरे हृदय से यहोवा का अनुसरण किया तथा येहोवा की खोज की और उसे पाया। इसलिये यहोवा ने उनके पूरे देश में शान्ति दी।

16 राजा आसा ने अपनी माँ माका को राजमाता के पद से हटा दिया। आसा ने यह इसलिये किया क्योंकि माका ने एक भयंकर अशेरा—स्तम्भ बनाया था। आसा ने इस स्तम्भ को काट दिया और इसे छोटे—छोटे टुकड़ों में ध्वस्त कर दिया। तब उसने उन छोटे टुकड़ों को किद्रोन घाटी में जला दिया। 17 उच्च स्थानों को यहूदा से नहीं हटाया गया, किन्तु आसा का हृदय जीवन भर यहोवा के प्रति श्रद्धालु रहा।

18 आसा ने उन पवित्र भेंटों को रखा जिन्हें उसने और उसके पिता ने यहोवा के मन्दिर में दिये थे। वे चीज़ें चाँदी और सोने की बनीं थीं। 19 आसा के शासन के पैंतीस वर्ष तक कोई युद्ध नहीं हुआ।

समीक्षा

देश में शांति

युद्ध देशों को बरबाद कर देता है (15:5,6)। यह मृत्यु, विनाश और सामान्य रूप से गरीबी को लाता है। दूसरी ओर, शांति देश को बढ़ाती और इसे समृद्ध करती है (14:7)।

जब आसा यहूदा का राजा बना, तब 'दस वर्षों तक देश में शांति थी' (व.1)। यह शांति परमेश्वर का उपहार था, 'परमेश्वर ने शांति बनायी रखी' (व.6, एम.एस.जी)।

शांति और विश्राम कैसे मिलता है? उत्तर, जो इतिहासकार बताते हैं, वह तीन बातें हैं:

  1. पूरे हृदय से परमेश्वर के पीछे हो लीजिये

जब उन्होनें 'परमेश्वर से प्रार्थना की' (13:14, एम.एस.जी) तब परमेश्वर ने 'उन्हें छुड़ाया' (व.16)। आसा ने 'यहूदा को आज्ञा दी की परमेश्वर के पीछे जाने का प्रयास करे' (14:4)। उन्होंने लोगों से कहा, ' सारा देश हमारे सामने पड़ा है, क्योंकि हम ने अपने परमेश्वर यहोवा की खोज की है; हमने उसकी खोज की और उसने हमको चारों ओर से विश्राम दिया है ' (व.7, एम.एस.जी)।

भविष्यवक्ता अजर्याह कहते हैं, ' यदि तुम उसकी खोज में लगे रहो, तब तो वह तुम से मिला करेगा' (15:2)। ' जब जब वे संकट में पड़कर इस्राएल के परमेश्वर की ओर फिरे और उसको ढूँढ़ा, तब तब वह उनको मिला ' (व.4)। ' उन्होंने वाचा बाँधी कि हम अपने पूरे मन और सारे प्राण से अपने पुर्वजों के परमेश्वर की खोज करेंगे' (व.12)।

वे पूरे हृदय से परमेश्वर की खोज करने लगे और 'यहोवा ने चारों ओर से उन्हें विश्राम दिया' (व.15, एम.एस.जी)

  1. पूरी तरह से परमेश्वर की आज्ञा मानें

जब आसा ने भविष्यवाणी को सुना, 'उसे साहस मिला' (व.8)। आसा ने यहूदा से कहा, 'परमेश्वर के नियमों और आज्ञाओं को मानों' (14:4)। भविष्यवक्ता अजर्याह ने कहा, ' यदि तुम उसको त्याग दोगे तो वह भी तुम को त्याग देगा ' (15:2)। यह लेखांश हमारे लिए परमेश्वर की वफादारी का एक उदाहरण है, जब हम पूरी तरह से उनकी आज्ञा मानने का निर्णय लेते हैं।

  1. पूरी तरह से परमेश्वर पर निर्भर रहिये

' यहूदी इस कारण प्रबल हुए कि उन्होंने अपने पितरों के परमेश्वर यहोवा पर भरोसा रखा था ' (13:18)। 'उन्होंने परमेश्वर पर भरोसा किया' (व.18, एम.एस.जी)। ' तब आसा ने अपने परमेश्वर यहोवा की यों दोहाई दी, 'हे यहोवा! जैसे तू सामर्थी की सहायता कर सकता है, वैसे ही शक्तिहीन की भी; हे हमारे परमेश्वर यहोवा! हमारी सहायता कर क्योंकि हमारा भरोसा तुझी पर है' (14:11)।

'परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से कटिबद्ध होने' का यही अर्थ है (15:17)। इसके परिणामस्वरूप आसा के काम को प्रतिफल मिला (व.7) और प्रभु परमेश्वर उनके साथ थे (व.9)। वहाँ पर शांति और विश्राम था।

प्रार्थना

परमेश्वर, मैं पूरे हृदय से आपके पीछे आना चाहता हूँ, पूरी तरह से आपकी आज्ञा मानना और पूरी तरह से आप पर निर्भर होना चाहता हूँ। मैं अपने जीवन में, चर्च में, अपने देश में और देशों के बीच में विश्राम और शांति के लिए प्रार्थना करता हूँ।

पिप्पा भी कहते है

2 इतिहास 15:5

'उस समय न तो जानेवाले को कुछ शांति होती थी, और न आनेवाले को, वरन् सारे देश के सब निवासियों में बड़ा ही कोलाहल होता था।'

हम आशीषित है कि ऐसे समय में जी रहे हैं जब यु.के. में यात्रा करना बहुत सी बार सुरक्षित है। आज विश्व के बहुत से भागों में 'बड़ी गड़बड़ी है' – लोग सताव, युद्ध और क्रूर शासन प्रणाली से भाग रहे हैं। हमें उन लोगों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और उनकी सहायता करनी चाहिए जो बदलाव के लिए काम कर रहे हैं।

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संदर्भ

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