धन को कैसे सम्भालें
परिचय
क्रिसमस के एक दिन बाद हम में से बहुत से लोग ऐसा अनुभव करते हैं कि हमारी जेब खाली हो गई है। परंतु, यह समस्या केवल क्रिसमस के समय में नहीं आती है। हम में से कई लोग जीवन में प्रतिदिन ऐसी समस्याओं का सामना करते हैं। किंतु हम इस विषय पर कलीसिया में बात नहीं करते। परंतु यीशु ने धन के विषय में बात की थी। पवित्र शास्त्र इसके बारे में बहुत कुछ कहता है। धन मायने रखता है। यह हमारे लिये मायने रखता है और परमेश्वर के लिये भी। आप धन को कैसे सम्भालेंगे?
नीतिवचन 31:10-20
आदर्श पत्नी
10 गुणवंती पत्नी कौन पा सकता है
वह जो मणि—मणिकों से कही अधिक मूल्यवान।
11 जिसका पति उसका विश्वास कर सकता है।
वह तो कभी भी गरीब नहीं होगा।
12 सद्पत्नी पति के संग उत्तम व्यवहार करती।
अपने जीवन भर वह उसके लिये कभी विपत्ति नहीं उपजाती।
13 वह सदा ऊनी और सूती कपड़े बुनाने में व्यस्त रहती।
14 वह जलयान जो दूर देश से आता है
वह हर कहीं से घर पर भोज्य वस्तु लाती।
15 तड़के उठाकर वह भोजन पकाती है।
अपने परिवार का और दासियों का भाग उनको देती है।
16 वह देखकर एवं परख कर खेत मोल लेती है
जोड़े धन से वह दाख की बारी लगाती है।
17 वह बड़ा श्रम करती है।
वह अपने सभी काम करने को समर्थ है।
18 जब भी वह अपनी बनायी वस्तु बेचती है, तो लाभ ही कमाती है।
वह देर रात तक काम करती है।
19 वह सूत कातती
और निज वस्तु बुनती है।
20 वह सदा ही दीन—दुःखी को दान देती है,
और अभाव ग्रस्त जन की सहायता करती है।
समीक्षा
रिश्तों को धन से ज्यादा प्राथमिक्ता दें
रिश्ते हमारे लिए धन से ज्यादा आवश्यक है। उदाहरण के लिए, धन एक दु:खी वैवाहिक जीवन को बदल नहीं सकता और दूसरी ओर, जिनके पास एक सुखी वैवाहिक जीवन है, 'उसे लाभ की घटी नहीं होती' (व. 11)। 'नेक स्वभाव की पत्नी कौन पा सकता है? क्योंकि उसका मूल्य मणि से भी बहुत अधिक है। उसके पति के मन में उसके प्रति विश्वास है, और उसे लाभ की घटी नहीं होती।' (वव. 10-11)
जैसे नीतिवचन के लेखक एक 'भली स्त्री' के बारे में समझाते हैं। वह इस बात से शुरू करते हैं कि, उस स्त्री का जीवन आर्थिक बातों से जुड़ा है। यह एक बहुत बड़ा उदाहरण है 'धन के प्रति उसके दृष्टिकोण' को लेकर। जैसे जॉन वेस्ली ने कहा है 'जितना कमा सकते हो कमाओ, जितना बचा सकते हो बचाओ और जितना खर्च कर सकते हो करो।'
- 'जितना कमा सकते हो कमाओ'
स्त्री बहुत ही मेहनती होती है। अपने कार्य और धन कमाने में वह रात ही को उठ बैठती है और अपने घराने को भोजन खिलाती है।' (व. 12-15अ)। 'वह किसी खेत के विषय में सोच विचार करती और मोल ले लेती है। वह परख लेती है कि उसका व्यापार लाभदायक है या नहीं।' (वव.16-18अ).
- 'जितना बचा सकते हो बचाओ'
'वह अपने हाथों से प्रसन्नता से काम करती है' (व. 13)। वह अपनी कमाई में से कुछ किनारे बचा कर रखती है (व. 16)।
- 'जितना दे सकते हो और खर्च कर सकते हो करो'
वो उदार मन की होती है। 'वह दिन के लिये मुट्ठी खोलती है और दरिद्रों को संभालने के लिए हाथ बढ़ाती है (व. 20)। उदारता से देना परमेश्वर की उदारता को दर्शाता है और गरीबों के प्रति प्रेम। यह भौतिकवाद को तोड़ने का एक तरीका है।
प्रार्थना
प्रभु मेरी सहायता कीजिये कि मैं एक अच्छा प्रबंधक बनूँ उन हर बातों के लिए जिसके विषय में आपने मुझ पर भरोसा किया है। ऐसा हो कि मैं हर वक्त उदारता से दे सकूँ, खास तौर पर गरीबों और ज़रूरतमंद लोगों को।
प्रकाशित वाक्य 18:1-17a
बाबुल का विनाश
18इसके बाद मैंने एक और स्वर्गदूत को आकाश से बड़ी शक्ति के साथ नीचे उतरते देखा। उसकी महिमा से सारी धरती प्रकाशित हो उठी। 2 शक्तिशाली स्वर से पुकारते हुए वह बोला:
“वह मिट गयी,
बाबुल नगरी मिट गयी।
वह दानवों का आवास बन गयी थी।
हर किसी दुष्टात्मा का वह बसेरा बन गयी थी।
हर किसी घृणित पक्षी का वह बसेरा बन गयी थी!
हर किसी अपवित्र, निन्दा योग्य पशु का।
3 क्योंकि उसने सब जनों को व्यभिचार के क्रोध की मदिरा पिलायी थी।
इस जगत के शासकों ने जो स्वयं जगाई थी उससे व्यभिचार किया था।
और उसके भोग व्यय से जगत के व्यापारी सम्पन्न बने थे।
4 आकाश से मैंने एक और स्वर सुना जो कह रहा था:
“हे मेरे जनों, तुम वहाँ से बाहर निकल आओ
तुम उसके पापों में कहीं साक्षी न बन जाओ;
कहीं ऐसा न हो, तुम पर ही वे नाश गिरें जो उसके रहे थे,
5 क्योंकि उसके पाप की ढेरी बहुत ऊँची गगन तक है।
परमेश्वर उसके बुरे कर्मों को याद कर रहा है।
6 हे! तुम भी तो उससे ठीक वैसा व्यवहार करो जैसा तुम्हारे साथ उसने किया था।
जो उसने तुम्हारे साथ किया उससे दुगुना उसके साथ करो।
दूसरों के हेतु उसने जिस कटोरे में मदिरा मिलाई वही मदिरा तुम उसके हेतु दुगनी मिलाओ।
7 क्योंकि जो महिमा और वैभव उसने
स्वयं को दिया तुम उसी ढँग से उसे यातनाएँ और पीड़ा दो क्योंकि
वह स्वयं अपने आप ही से कहती रही है, ‘मैं अपनी नृपासन विराजित महारानी
मैं विधवा नहीं
फिर शोक क्यों करूँगी?’
8 इसलिए वे नाश जो महामृत्यु,
महारोदन और वह दुर्भिक्ष भीषण है।
उसको एक ही दिन घेर लेंगे, और उसको जला कर भस्म कर देंगे क्योंकि परमेश्वर प्रभु जो बहुत सक्षम है,
उसी ने इसका यह न्याय किया है।
9 “जब धरती के राजा, जिन्होंने उसके साथ व्यभिचार किया और उसके भोग-विलास में हिस्सा बटाया, उसके जलने से निकलते धुआँ को देखेंगे तो वे उसके लिए रोयेंगे और विलाप करेंगे। 10 वे उसके कष्टों से डर कर वहीं से बहुत दूर ही खड़े हुए कहेंगे:
‘हे! शक्तिशाली नगर बाबुल!
भयावह ओ, हाय भयानक!
तेरा दण्ड तुझको बस घड़ी भर में मिल गया।’
11 “इस धरती पर के व्यापारी भी उसके कारण रोयेंगे और विलाप करेंगे क्योंकि उनकी वस्तुएँ अब कोई और मोल नहीं लेगा, 12 वस्तुएँ सोने की, चाँदी की, बहुमूल्य रत्न, मोती, मलमल, बैजनी, रेशमी और किरमिजी वस्त्र, हर प्रकार की सुगंधित लकड़ी हाथी दाँत की बनी हुई हर प्रकार की वस्तुएँ, अनमोल लकड़ी, काँसे, लोहे और संगमरमर से बनी हुई तरह-तरह की वस्तुएँ 13 दार चीनी, गुलमेंहदी, सुगंधित धूप, रस गंध, लोहबान, मदिरा, जैतून का तेल, मैदा, गेहूँ, मवेशी, भेड़े, घोड़े और रथ, दास, हाँ, मनुष्यों की देह और उनकी आत्माएँ तक।
14 ‘हे बाबुल! वे सभी उत्तम वस्तुएँ, जिनमें तेरा हृदय रमा था, तुझे सब छोड़ चली गयी हैं
तेरा सब विलास वैभव भी आज नहीं है।
अब न कभी वे तुझे मिलेंगी।’
15 “वे व्यापारी जो इन वस्तुओं का व्यापार करते थे और उससे सम्पन्न बन गए थे, वे दूर-दूर ही खड़े रहेंगे क्योंकि वे उसके कष्टों से डर गये हैं। वे रोते-बिलखते 16 कहेंगे:
‘कितना भयावह और कितनी भयानक है, महानगरी!
यह उसके हेतु हुआ। उत्तम मलमली वस्त्र पहनती थी
बैजनी और किरमिजी! और स्वर्ण से बहुमूल्य रत्नों से सुसज्जित
मोतियों से सजती ही रही थी।
17 और बस घड़ी भर में यह सारी सम्पत्ति मिट गयी।’
“फिर जहाज का हर कप्तान, या हर वह व्यक्ति जो जहाज से चाहे कहीं भी जा सकता है तथा सभी मल्लाह और वे सब लोग भी जो सागर से अपनी जीविका चलाते हैं, उस नगरी से दूर ही खड़े रहे
समीक्षा
अपना भरोसा धन पर मत रखिये
पवित्र शास्त्र में कोई मनाई नहीं है कि आप धन नहीं कमा सकते या इकट्ठा नहीं कर सकते, लेकिन यह सिर्फ इतना कहता है कि अपना भरोसा धन पर मत रखिये। यह आपकी असुरक्षा को लाता है और परमेश्वर से आपको दूर ले जाता है।
धन कोई अदल बदल का तटस्थ औपचारिक माध्यम नहीं है। यीशु ने कहा 'तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते' (मत्ती 6:24) 'मैमन' कार्थेज में धन का ईश्वर था। धन में ईश्वर बनने की सारी योग्यता है। यह सुरक्षा, आज़ादी, सामर्थ, प्रभाव, ओहदा और शौहरत जैसी चीजें प्रदान कर सकता है। यह प्रेरणादायक समर्पण और एकल दिमाग में अन्य मानसिकता के लिए सक्षम है। जैसे डेट्रिच बैहौफर ने कहा है 'हमारा हृदय केवल परमेश्वर की उपासना कर सकता है और एक ही के प्रति समर्पित हो सकता है।'
इस पद में यूहन्ना को एक दर्शन मिलता है 'महान बेबीलोन' के पतन (प्रकाशितवाक्य 18:2) और यह एक भविष्यवाणी के रूप में दिखाई देती है, जो अगले 320 वर्ष तक पूरी नहीं होगी - रोमी साम्राज्य का ढाया जाना AD 410 में।
यूहन्ना लिख रहे थे कि, साम्राज्य तो आनन्द मना रहा है, उसको कुछ चिंता नहीं है और वे सारा लाभ उठा रहे हैं। परंतु फिर भी यूहन्ना देखते हैं कि उनका चरित्र ही उनके ढाए जाने का कारण हुआ।
'बेबीलोन' कुछ चीजों को दर्शाता है जो अपने आपको परमेश्वर से बढ़कर दर्शाते हैं। यूहन्ना कुछ ऐसी बातों को रेखांकित करता है जो एक समाज के पतन का कारण बनती है।
- सामाजिक बुराई
'क्योंकि उसके व्यभिचार की भयानक मदिरा के कारण सब जातियाँ गिर गई हैं। और पृथ्वी के राजाओं ने उसके साथ व्यभिचार किया है' (व. 3अ)।
- अत्यधिक विलासपूर्ण वस्तुएँ
'और पृथ्वी के व्यापारी उसके सुख-विलास की बहुतायत के कारण धनवान हुए हैं।' (व. 3ब, व. 7, व. 9) 'जितनी उसने अपनी बड़ाई की और सुख विलास किया, उतनी उस को पीड़ा, और शोक दो' (व. 7)।
- मानव तस्करी
'और दास और मनुष्य के प्राण।' (व. 13) यूहन्ना इस बात को समझाना चाहता है कि दास कोई ढ़ांचा नहीं है कि उसे खरीदा और बेचा जा सके बल्कि वह भी एक इंसान है। यह मानव तस्करी पर एक टिप्पणी से भी बढ़कर है। यह एक टिप्पणी है उस सामानों पर जो जहाज़ के खेप में होते हैं। यह अमानवीय क्रूरता को दर्शाता है। जिस पर सम्पूर्ण साम्राज्य की उन्नति निर्भर करती है। आज ऐसा अनुमान लगाया गया है कि दुनिया में तकरीबन 3 करोड़ दास या गुलाम पाए हैं, यह हमारे समाज की शर्मनाक और घिनौनी बात है।
मानव तस्कती से धन और शौहरत आते हैं और जाते हैं, पर यूहन्ना अपने लोगों से कहते हैं कि बेबीलोन के पाप से दूषित मत हो। 'हे मेरे लोगो, उस में से निकल आओ कि तुम उसके पापों में भागी न हो' (व. 4)। यूहन्ना के वचन जैसे उस समय में प्रासंगिक थे वैसे आज भी हैं।
प्रार्थना
'हे प्रभु हमारी सहायता करिए कि हम अपने ढीठ स्वभाव को छोड़ें और धन पर भरोसा न रखें। हमारी सहायता करिए कि हम देह व्यापार और दासों की तस्करी पर रोक लगा सकें। धन्यवाद परमेश्वर कि साम्राज्य आता और जाता रहता है, परंतु आपका वचन सदा बना रहेगा।'
नहेमायाह 5:1-7:3
नहेमायाह द्वारा गरीबों की सहायता
5बहुत से गरीब लोग अपने यहूदी भाइयों के विरूद्ध शिकायत करने लगे थे। 2 उनमें से कुछ कहा करते थे, “हमारे बहुत से बच्चे हैं। यदि हमें खाना खाना है और जीवित रहना है तो हमें थोड़ा अनाज तो मिलना ही चाहिए!”
3 दूसरे लोगों का कहना है, “इस समय अकाल पड़ रहा है। हमें अपने खेत और घर गिरवी रखने पड़ रहे हैं ताकि हमें थोड़ा अनाज मिल सके।”
4 कुछ लोग यह भी कह रहे थे, “हमें अपने खेतों और अँगूर के बगीचों पर राजा का कर चुकाना पड़ता है किन्तु हम कर चुका नहीं पाते हैं इसलिए हमें कर चुकाने के वास्ते धन उधार लेना पड़ता है। 5 उन धनवान लोगों की तरफ़ देखो! हम भी वैसे ही अच्छे हैं जैसे वे हमारे पुत्र भी वैसे ही अच्छे हैं जैसे उनके पुत्र। किन्तु हमें अपने पुत्र—पुत्री दासों के रूप में बेचने पड़ रहे हैं। हममें से कुछ को तो दासों के रूप में अपनी पुत्रीयों को बेचना भी पड़ा है! ऐसा कुछ भी तो नहीं है जिसे हम कर सकें! हम अपने खेतों और अँगूर के बगीचों को खो चुके हैं! अब दूसरे लोग उनके मालिक हैं!”
6 जब मैंने उनकी ये शिकायतें सुनीं तो मुझे बहुत क्रोध आया। 7 मैंने स्वयं को शांत किया और फिर धनी परिवारों और हाकिमों के पास जा पहुँच। मैंने उनसे कहा, “तुम अपने ही लोगों को उस धन पर ब्याज चुकाने के लिये विवश कर रहे हो जिसे तुम उन्हें उधार देते हो! निश्चय ही तुम्हें ऐसा बन्द कर देना चाहिए!” फिर मैंने लोगों की एक सभा बुलाई 8 और फिर मैंने उन लोगों से कहा, “दूसरे देशों में हमारे यहूदी भाइयों को दासों के रूप में बेचा जाता था। उन्हें वापस खरीदने और स्वतन्त्र कराने के लिए हमसे जो बन पड़ा. हमने किया और अब तुम उन्हें फिर दासों के रूप में बेच रहे हो और हमें फिर उन्हें वापस लेना पड़ेगा!”
इस प्रकार वे धनी लोग और वे हाकिम चुप्पी साधे रहे। कहने को उनके पास कुछ नहीं था। 9 सो मैं बोलता चला गया। मैंने कहा, “तुम लोग जो कुछ कर रहे हो, वह उचित नहीं है! तुम यह जानते हो कि तुम्हें परमेश्वर से डरना चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए। तुम्हें ऐसे लज्जापूर्ण कार्य नहीं करने चाहिए जैसे दूसरे लोग करते हैं! 10 मेरे लोग, मेरे भाई और स्वयं मैं भी लोगों को धन और अनाज़ उधार पर देते हैं। किन्तु आओ हम उन कर्जों पर ब्याज चुकाने के लिये उन्हें विवश करना बन्द कर दें! 11 इसी समय तुम्हें उन के खेत, अँगूर के बगीचे, जैतून के बाग और उनके घर उन्हें वापस लौटा देने चाहिए और वह ब्याज भी तुम्हें उन्हें लौटा देना चाहिए जो तुमने उनसे वसूल किया है। तुमने उधार पर उन्हें जो धन, जो अनाज़ जो नया दाखमधु और जो तेल दिया है, उस पर एक प्रतिशत ब्याज वसूल किया है!”
12 इस पर धनी लोगों और हाकिमों ने कहा, “हम यह उन्हें लौटा देंगे और उनसे हम कुछ भी अधिक नहीं माँगेंगे। हे नहेमायाह, तू जैसा कहता है, हम वैसा ही करेंगे।”
इसके बाद मैंने याजकों को बुलाया। मैंने धनी लोगों और हाकिमों से यह प्रतिज्ञा करवाई कि जैसा उन्होंने कहा है, वे वैसा ही करेंगे। 13 इसके बाद मैंने अपने कपड़ों की सलवटें फाड़ते हुए कहा, “हर उस व्यक्ति के साथ, जो अपने वचन को नहीं निभायेगा, परमेश्वर तद्नुकूल करेगा। परमेश्वर उन्हें उनके घरों से उखाड़ देगा और उन्होंने जिन भी वस्तुओं के लिये काम किया है वे सभी उनके हाथ से जाती रहेंगी। वह व्यक्ति अपना सब कुछ खो बैठेगा!”
मैंने जब इन बातों का कहना समाप्त किया तो सभी लोग इनसे सहमत हो गये। वे सभी बोले, “आमीन!” और फिर उन्होंने यहोवा की प्रशंसा की और इस प्रकार जैसा उन्होंने वचन दिया था, वैसा ही किया 14 और फिर यहूदा की धरती पर अपने राज्यपाल काल के दौरान न तो मैंने और न मेरे भाईयों ने उस भोजन को ग्रहण किया जो राज्यपाल के लिये न्यायपूर्ण नहीं था। मैंने अपने भोजन को खरीदने के वास्ते कर चुकाने के लिए कभी किसी पर दबाव नहीं डाला। राजा अर्तक्षत्र के शासन काल के बीसवें साल से बत्तीसवें साल तक मैं वहाँ का राज्यपाल रहा। मैं बारह साल तक यहूदा का राज्यपाल रहा। 15 किन्तु मुझ से पहले के राज्यपालों ने लोगों के जीवन को दूभर बना दिया था। वे राज्यपाल लोगों पर लगभग एक पौंड चाँदी चालीस शकेल देने के लिए दबाव डाला करते थे। उन लोगों पर वे खाना और दाखमधु देने के लिये भी दबाव डालते थे। उन राज्यपालों के नीचे के हाकिम भी लोगों पर हुकूमत चलाते थे और जीवन को औऱ अधिक दूभर बनाते रहते थे। किन्तु मैं क्योंकि परमेश्वर का आदर करता था, और उससे डरता था, इसलिए मैंने कभी वैसे काम नहीं किये। 16 नगर परकोटे की दीवार को बनाने में मैंने कड़ी मेहनत की थी। वहाँ दीवार पर काम करने के लिए मेरे सभी लोग आ जुटे थे!
17 मैं, अपने भोजन की चौकी पर नियमित रूप से हाकिमों समेत एक सौ पचास यहूदियों को खाने पर बुलाया करता था। मैं चारों ओर के देशों के लोगों को भी भोजन देता था जो मेरे पास आया करते थे। 18 मेरे साथ मेरी मेज़ पर खाना खाने वाले लोगों के लिये इतना खाना सुनिश्चित किया गया था: एक बैल, छ: तगड़ी भेड़ें और अलग—अलग तरीके के पक्षी। इसके अलावा हर दसों दिन मेरी मेज़ पर हर प्रकार का दाखमधु लाया जाता था। फिर भी मैंने कभी ऐसे भोजन की मांग नहीं की, जो राज्यपाल के लिए अनुमोदित नहीं था। मैंने अपने भोजन का दाम चुकाने के लिये कर चुकाने के वास्ते, उन लोगों पर कभी दबाव नहीं डाला। मैं यह जानता था कि वे लोग जिस काम को कर रहे हैं वह बहुत कठिन है। 19 हे परमेश्वर, उन लोगों के लिये मैंने जो अच्छा किया है,तू उसे याद रख।
अधिक समस्याएँ
6इसके बाद सम्बल्लत, तोबियाह, अरब के रहने वाले गेशेम तथा हमारे दूसरे शत्रुओं ने यह सुना कि मैं परकोटे की दीवार का निर्माण करा चुका हूँ। हम उस दीवार में दरवाजे बना चुके थे किन्तु तब तक दरवाजों पर जोड़ियाँ नहीं चढ़ाई गई थीं। 2 सो सम्बल्लत और गेशेम ने मेरे पास यह सन्देश भिजवाया: “नहेमायाह, तुम आकर हमसे मिलो। हम ओनो के मैदान में कैफरीम नाम के कस्बे में मिल सकते हैं।” किन्तु उनकी योजना तो मुझे हानि पहुँचाने की थी।
3 सो मैंने उनके पास इस उत्तर के साथ सन्देश भेज दिया: “मैं यहाँ महत्वपूर्ण काम में लगा हूँ। सो मैं नीचे तुम्हारे पास नहीं आ सकता। मैं सिर्फ इसलिए काम बन्द नहीं करना चाहूँगा कि तुम्हारे पास आकर तुमसे मिल सकूँ।”
4 सम्बल्लत और गेमेश ने मेरे पास चार बार वैसे ही सन्देश भेजे और हर बार मैंने भी उन्हें वही उत्तर भिजवा दिया। 5 फिर पाँचवी बार सम्बल्लत ने उसी सन्देश के साथ अपने सहायक को मेरे पास भेजा। उसके हाथ में एक पत्र था जिस पर मुहर नहीं लगी थी। 6 उस पत्र में लिखा था:
“चारों तरफ एक अफवाह फैली हुई है। हर कहीं लोग उसी बात की चर्चा कर रहे हैं और गेमेश का कहना है कि वह सत्य है। लोगों का कहना है कितू और यहूदी, राजा से बगावत की योजना बना रहे हो और इसी लिए तुम यरूशलेम के नगर परकोटे का निर्माण कर रहे हो। लोगों का यह भी कहना है कितू ही यहूदियों का नया राजा बनेगा। 7 और यह अफ़वाह भी है कि तू ने यरूशलेम में अपने विषय में यह घोषणा करने के लिए भविष्यवक्ता भी चुन लिये हैं: ‘यहूदा में एक राजा है!’
“नहेमायाह! अब मैं तुझे चेतावनी देता हूँ। राजा अर्तक्षत्र इस विषय की सुनवाई करेगा सो हमारे पास आ और हमसे मिल कर इस बारे में बातचीत कर।”
8 सो मैंने सम्बल्लत के पास यह उत्तर भिजवा दिया: “तुम जैसा कह रहे हो वैसा कुछ नहीं हो रहा है। यह सब बातें तुम्हारी अपनी खोपड़ी की उपज हैं।”
9 हमारे शत्रु बस हमें डराने का जतन कर रहे थे। वे अपने मन में सोच रहे थे, “यहूदी लोग डर जायेंगे और काम को चलता रखने के लिये बहुत निर्बल पड़ जायेंगे और फिर परकोटे की दीवार पूरी नहीं हो पायेगी।”
किन्तु मैंने अपने मन में यह विनती की, “परमेश्वर मुझे मजबूत बना।”
10 मैं एक दिन दलायाह के पुत्र शमायाह के घर गया। दलायाह महेतबेल का पुत्र था। शमायाह को अपने घर में ही रुकना पड़ता था। शमायाह ने कहा, “नहेमायाह आओ हम परमेश्वर के मन्दिर के भीतर मिलें। आओ चलें भीतर हम मन्दिर के और बन्द द्वारों को कर लें आओ, वैसा करें हम क्यों? क्योंकि लोग हैं आ रहे मारने को तुझको। वे आ रहे हैं आज रात मार डालने को तुझको।”
11 किन्तु मैंने शमायाह से कहा, “क्या मेरे जैसे किसी व्यक्ति को भाग जाना चाहिए? तुम तो जानते ही हो कि मेरे जैसे व्यक्ति को अपने प्राण बचाने के लिये मन्दिर में नहीं भाग जाना चाहिए। सो मैं वहाँ नहीं जाऊँगा!”
12 मैं जानता था कि शमायाह को परमेश्वर ने नहीं भेजा है। मैं जानता था कि मेरे विरुद्ध वह इस लिये ऐसी झूठी भविष्यवाणियाँ कर रहा है कि तोबियाह और सम्बल्लत ने उसे वैसा करने के लिए धन दिया है। 13 शमायाह को मुझे तंग करने और डराने के लिये भाड़े पर रखा गया था। वे यह चाहते थे कि डर कर छिपने के लिये मन्दिर में भाग कर मैं पाप करू ताकि मेरे शत्रुओं के पास मुझे लज्जित करने और बदनाम करने का कोई आधार हो।
14 हे परमेश्वर! तोबियाह और सम्बल्लत को याद रख। उन बुरे कामों को याद रख जो उन्होंने किये हैं। उस नबिया नोअद्याह तथा उन नबियों को याद रख जो मुझे भयभीत करने का जतन करते रहे हैं।
परकोटे पूरा हो गया
15 इस प्रकार एलूल नाम के महीने की पच्चीसवीं तारीख को यरूशलेम का परकोटा बनकर तैयार हो गया। परकोटा की दीवार को बनकर पूरा होने में बावन दिन लगे। 16 फिर हमारे सभी शत्रुओं ने सुना कि हमने परकोटे बनाकर तैयार कर लिया है। हमारे आस—पास के सभी देशों ने देखा कि निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। इससे उनकी हिम्मत टूट गयी क्योंकि वे जानते थे कि हमने यह कार्य हमारे परमेश्वर की सहायता से पूरा किया है।
17 इसके अतिरिक्त उन दिनों जब वह दीवार बन कर पूरी हो चुकी थी तो यहूदा के धनी लोग तोबियाह को पत्र लिख—लिख कर पत्र भेजने लगे, तोबियाह उनके पत्रों का उत्तर दिया करता। 18 वे इन पत्रों को इसलिए भेजा करते थे कि यहूदा के बहुत से लोगों ने उसके प्रति वफादार बने रहने की कसम उठाई हुई थी। इसका कारण यह था कि वह आरह के पुत्र शकम्याह का दामाद था तथा तोबियाह के पुत्र यहोहानान ने मशुल्लाम की पुत्री से विवाह किया था। मशुल्लाम बेरेक्याह का पुत्र था, 19 तथा अतीतकाल में उन लोगों ने तोबियाह को एक विशेष वचन भी दे रखा था। सो वे लोग मुझसे कहते रहते थे कि तोबियाह कितना अच्छा है और उधर वे, जो काम मैं किया करता था, उनके बारे में तोबियाह को सूचना देते रहते थे। तोबियाह मुझे डराने के लिये पत्र भेजता रहता था।
7इस प्रकार हमने दीवार बनाने का काम पूरा किया। फिर हमने द्वार पर दरवाज़े लगाये। फिर हमने उस द्वार के पहरेदारों, मन्दिर के गायकों तथा लेवियों को चुना जो मन्दिर में गीत गाते और याजकों की मदद करते थे। 2 इसके बाद मैंने अपने भाई हनानी को यरूशलेम का हाकिम नियुक्त कर दिया। मैंने हनन्याह नाम के एक और व्यक्ति को चुना और उसे किलेदार नियुक्त कर दिया। मैंने हनानी को इसलिए चुना था कि वह बहुत ईमानदार व्यक्ति था तथा वह परमेश्वर से आम लोगों से कहीं अधिक डरता था। 3 तब मैंने हनानी और हनन्याह से कहा, “तुम्हें हर दिन यरूशलेम का द्वार खोलने से पहले घंटों सूर्य चढ़ जाने के बाद तक इंतजार करते रहना चाहिए और सूर्य छुपने से पहले ही तुम्हें दरवाजें बन्द करके उन पर ताला लगा देना चाहिए। यरूशलेम में रहने वाले लोगों में से तुम्हें कुछ और लोग चुनने चाहिए और उन्हें नगर की रक्षा करने के लिए विशेष स्थानों पर नियुक्त करो तथा कुछ लोगों को उनके घरों के पास ही पहरे पर लगा दो।”
समीक्षा
धन को संभालने में आदर्श बनें।
नहेम्याह एक बहुत ही अच्छा उदाहरण रहा है एक अगुवे के रूप में और उसने किस रीति से धन को संभाला। हम में से हरएक जन धन की आर्थिक समस्याओं से गुज़रते हैं। जब हमें घटी होती है, तब हम क्या करते हैं?
नहेम्याह इतनी भयंकर परिस्थिति का सामना कर रहा था। कई लोगों के पास जीवित रहने के लिये पर्याप्त भोजन नहीं था (व 5:2)। कुछ लोगों को अपना खेत और घर गिरवी रखना पड़ा (व. 3) और कुछ लोगों को माँग कर जीना पड़ा (व. 4)। हम नहेम्याह के उदाहरण से क्या सीख सकते हैं?
सबसे पहले उसने अपने मन में ध्यान से सोचा 'मन में सोच विचार किया........' (व. 7)। जब परिस्थितियाँ उलट पुलट हों तब जल्दबाज़ी करने की आवश्यकता नहीं है। शांतिपूर्वक बैठकर मन में सोच विचार करने की आवश्यक्ता है।
दूसरी बात, 'उसने एक सभा बुलाई' (व. 7ब)। कुछ बैठक किसी काम की नहीं होती। सिर्फ समय बरबाद होता है बिना कुछ काम के, परंतु कुछ सभाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण होती हैं। नहेम्याह को इन प्रकार की सभाओं का फर्क मालूम था। इसलिए 6वे अध्याय में उसने लोगों से बैठक में मिलने से इंकार कर दिया।
इधर नहेम्याह लोगों को बैठक में समझाता है कि वे लोग जो कर रहे हैं, वह गलत है। उन्हें लोगों को उधार के बदले ब्याज नहीं लेना चाहिये और वह उनसे कहता है 'आज ही उनको उनके खेत और दाख और जैतून की बारियाँ और घर फेर दो, और जो रुपया, अन्न, नया दाखमधु और तटका तेल तुम उनसे ले लेते हो, उसका सौवाँ भाग फेर दो।' (व. 11)
सभा सफल हुई। उन लोगों ने कहा 'हम उन्हें फेर देंगे, और उनसे कुछ न लेंगे। जैसा तुम चाहते हो, वैसा ही हम करेंगे।' (व. 12) लोगों ने वैसा ही किया जैसा उन्होंने वायदा किया था (व. 13)।
तीसरी और सबसे मुख्य बात कि उसने अपने जीवन को एक आदर्श उदाहरण के रूप में दिखाया:
व्यक्तिगत परमेश्वर का भय मानने के कारण नहेम्याह 'पिछले अधिपतियों के समान नहीं था, जो प्रजा पर भार डालते थे, वरन उसके सेवक भी प्रजा के ऊपर अधिकार चलाते थे' (व. 15)।
साधारण जीवन शैली
'अर्थात बारह वर्ष तक मैं और मेरे भाई अधिपति के हक का भोजन खाते रहें' (व. 14)।
- स्वयं का कोई लाभ नहीं
'और मेरे सब सेवक काम करने के लिये वहाँ इकट्ठे रहते थे, और हम लोगों ने कुछ भूमि मोल न ली...... तब भी मैंने अधिपति के हक का भोजन नहीं लिया, क्योंकि प्रजा पर काम का भार काफी था।' (व. 16-18)
- लोगों के प्रति उदारता
'फिर मेरी मेज पर खाने वाले एक सौ पचास यहूदी और हाकिम और वे भी थे, जो चारों ओर की अन्यजातियों में से हमारे पास आए थे' (व. 17)।
- एक मन से परिश्रम वे सब लोग यह सोच कर हमें डराना चाहते थे, कि उनके हाथ ढीले पड़ें और काम बन्द हो जाए। परन्तु अब हे परमेश्वर तू मुझे हियाव दे।' (व. 6:9)
नहेम्याह ने जिस कार्य की शुरुआत की, वह कार्य खत्म भी किया" बहुत से लोग काम शुरू तो करना जानते हैं, परंतु जैसे पीपा के पिता ऐसा कहते हैं कि ‘कार्य जारी रखना' यह बहुत कम लोगों में पाया जाता है। नहेम्याह उस कार्य को करता रहा, जब तक कि वह कार्य पूरा नहीं हो गया।
इस कार्य की सफलता ही इसका सही जवाब था, अर्थात बावन दिन के भीतर शहरपनाह बन गई। जब हमारे सब शत्रुओं ने यह सुना, तब हमारे चारों ओर रहने वाली अन्यजाती डर गई और बहुत लज्जित हुई। क्योंकि उन्होंने जान लिया था कि यह काम हमारे परमेश्वर की ओर से हुआ है' (व. 15-16)।
प्रार्थना
प्रभु मुझे ज्ञान दीजिए कि मैं धन को कैसे सम्भालूँ, मेरी सहायता कीजिये कि मैं अपने व्यक्तिगत जीवन में एक अच्छा उदाहरण बनूँ कि मैं कोई स्वयं का लाभ न देखूँ बल्कि एक अच्छा जीवन जीऊँ, परिश्रम करने वाला बनूँ और लोगों के प्रति उदार हृदय वाला व्यक्ति बनूँ।
पिप्पा भी कहते है
नीतिवचन 31:10-20
बल्कि मुझे अपर्याप्त लगता है जब मैं पढ़ती हूँ: ‘सबकुछ करने वाली, ‘सबकुछ रखने वाली’ और ‘सबकुछ बनने वाली’ स्त्री। सबसे ज्यादा महत्व यह नहीं सखता कि हम चीज़ों को किस तरह से करें, पर यह है कि हमारा और परमेश्वर का रिश्ता मजबूत हो।

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संदर्भ
डाइरिच बोनोफर, द कॉस्ट ऑफ डिसाइपलशिप, (एसएमजी, 1959; पॉकेट बुक्स: 1 टचस्टोन संस्करण 1995) पन्ना 176
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