दिन 109

अब भी ज्यादा देर नहीं हुई है

बुद्धि नीतिवचन 10:1-10
नए करार लूका 18:31-19:10
जूना करार व्यवस्था विवरण 29:1-30:10

परिचय

मुझे अपने आपको जवान समझना पसंद है. हाल ही में, मैंने सुना कि मध्यम आयु पैंतीस वर्ष से लेकर अठ्ठावन वर्ष की आयु तक है. इसके आधार पर, मैं जवान भी नहीं हूँ, मैं मध्यम आयु का भी नहीं हूँ!

अक्सर लोग मध्य-आयु वाले समय को 'मध्यम जीवन के संकट' का समय कहते हैं. एक मध्य जीवन का संकट बढ़ती उम्र के कारण हो सकता है, या उम्र के बढ़ने के साथ-साथ बदलाव, परेशानियाँ, या काम पर, कैरिअर में, संबंधों में, बच्चों पर और उम्र के बढ़ने पर भौतिक बदलाव पर, पछतावे से हो सकता है.

जो लोग मध्य जीवन के संकंट का अनुभव करते हैं वे अक्सर एक अपरिभाषित सपने या लक्ष्य को खोज रहे होते हैं. शायद हमें उन लक्ष्यों के लिए पछतावा है जो अब तक पूरे नहीं हुए हैं. शायद से हम अत्यधिक सफल सहकर्मीयों के बीच में अपमान से डरें हुए. एक जवान होने के एहसास को पाने की इच्छा करते हैं.

इन सभी चीजों के बीच में किसी चीज की कमी महसूस होती रहती है. अक्सर मध्यम जीवन संकट में एक बुद्धि होती है, जैसे व्यक्ति उन चीजों की बहुतायता के खालीपन को महसूस करते हैं जिनके लिए वे अत्यधिक लालसा करते थे (यहाँ तक कि यदि वे इसे किसी के साथ बदल दें, तब भी यह हमेशा बुद्धिमानी का काम नहीं होगा).

मैंने अक्सर आश्चर्य किया है कि क्या जक्कई, जिसके विषय में हमने आज के नये नियम के लेखांश में पढ़ा, क्या वह मध्यम जीवन सकंट से गुजर रहा था. चाहे वह गुजर रहा था या नहीं गुजर रहा था, उसे उत्तर मिल गया, जिसे बहुत से लोग ढ़ूँढ़ रहे हैं, जब वह यीशु से मिला.

इससे अंतर नहीं पड़ता है कि आप गलत दिशा में कितने लंबे समय से यात्रा कर रहे हैं, आप हमेशा वापस लौट सकते हैं. यीशु के साथ नई शुरुवात करने के लिए और यह सुनिश्चित करने के लिए आपका जीवन सही दिशा में रखा जाता है, कभी भी बहुत देर हो चुकी है जैसी कोई बात नहीं है.

बुद्धि

नीतिवचन 10:1-10

सुलैमान की सूक्तियाँ

10एक बुद्धिमान पुत्र अपने पिता को आनन्द देता है
 किन्तु एक मूर्ख पुत्र, माता का दुःख होता है।

2 बुराई से कमाये हुए धन के कोष सदा व्यर्थ रहते हैं!
 जबकि धार्मिकता मौत से छुड़ाती है।

3 किसी नेक जन को यहोवा भूखा नहीं रहने देगा,
 किन्तु दुष्ट की लालसा पर पानी फेर देता है।

4 सुस्त हाथ मनुष्य को दरिद्र कर देते हैं,
 किन्तु परिश्रमी हाथ सम्पत्ति लाते हैं।

5 गर्मियों में जो उपज को बटोर रखता है, वही पुत्र बुद्धिमान है;
 किन्तु जो कटनी के समय में सोता है वह पुत्र शर्मनाक होता है।

6 धर्मी जनों के सिर आशीषों का मुकुट होता
 किन्तु दुष्ट के मुख से हिंसा ऊफन पड़ती।

7 धर्मी का वरदान स्मरण मात्र बन जाये;
 किन्तु दुष्ट का नाम दुर्गन्ध देगा।

8 वह आज्ञा मानेगा जिसका मन विवेकशील है,
 जबकि बकवासी मूर्ख नष्ट हो जायेगा।

9 विवेकशील व्यक्ति सुरक्षित रहता है,
 किन्तु टेढ़ी चाल वाले का भण्डा फूटेगा।

10 जो बुरे इरादे से आँख से इशारा करे, उसको तो उससे दुःख ही मिलेगा।
 और बकवासी मूर्ख नष्ट हो जायेगा।

समीक्षा

'हिलने वाली कुर्सी को जाँच' लीजिए

एक सफल व्यवसायी, जो एक असाधारण रूप से ईमानदार व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं, उन्होंने मुझे बताया कि वह अपने सभी निर्णयों में 'हिलने वाली कुर्सी की जाँच' को लगाते हैं. वह कल्पना करते हैं कि एक दिन अपने रिटायरमेंट के समय अपनी हिलने वाली कुर्सी पर बैठकर उन निर्णयों को देख रहे हैं जो उन्होंने लिए थे. उनका निर्णय क्या होगा कि कौन सा निर्णय अच्छा था और कौन सा निर्णय बुरा था? यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अभी वह जो निर्णय लेते हैं उन पर बाद में ना पछतायें.

यह लेखांश हमें उन चीजों को दिखाता है जिसे हमें नकारना है, जैसे कि द्वेष (व.10), मूर्खताभरी गपशप (वव.8,10) और आलसीपन (व.4).

ईमानदारी और विश्वसनीयता बिना पछतावे के जीवन की कुंजी है. 'दुष्ट के धन से लाभ नहीं होता; एक ईमानदार जीवन मृत्यु से बचाता है' (व.2, एम.एस.जी.). 'एक अच्छा और ईमानदार जीवन एक आशीषित स्मरण है; एक दुष्ट जीवन सड़ी हुई बदबू छोड़ जाता है' (व.7, एम.एस.जी.).

यदि आप ईमानदारी से और भरोसे के साथ जीवन बिताते हैं तो आप 'निर्भीक और चिंतामुक्त रहेंगे' (व.9अ, एम.एस.जी.). 'परंतु जो टेढ़ी चाल चलता है उसकी चाल प्रकट हो जाती है'(व.9अ, एम.एस.जी.).

प्रार्थना

परमेश्वर, आज मेरी सहायता कीजिए कि मैं बुद्धिमान और सत्यनिष्ठ बनूँ (वव.3,7), द्वेष (व.10) और मूर्खताभरी गपशप से दूर रहूँ (वव.8,10), परिश्रम (व.4), ईमानदारी और भरोसे (व.9) का एक जीवन जीऊँ.

नए करार

लूका 18:31-19:10

यीशु मर कर जी उठेगा

31 फिर यीशु उन बारह प्रेरितों को एक ओर ले जाकर उनसे बोला, “सुनो, हम यरूशलेम जा रहे हैं। मनुष्य के पुत्र के विषय में नबियों द्वारा जो कुछ लिखा गया है, वह पूरा होगा। 32 हाँ, वह विधर्मियों को सौंपा जायेगा, उसकी हँसी उड़ाई जायेगी, उसे कोसा जायेगा और उस पर थूका जायेगा। 33 फिर वे उसे पीटेंगे और मार डालेंगे और तीसरे दिन यह फिर जी उठेगा।” 34 इनमें से कोई भी बात वे नहीं समझ सके। यह कथन उनसे छिपा ही रह गया। वे समझ नहीं सके कि वह किस विषय में बता रहा था।

अंधे को आँखें

35 यीशु जब यरीहो के पास पहुँच रहा था तो भीख माँगता हुआ एक अंधा, वहीं राह किनारे बैठा था। 36 जब अंधे ने पास से लोगों के जाने की आवाज़ सुनी तो उसने पूछा, “क्या हो रहा है?”

37 सो लोगों ने उससे कहा, “नासरी यीशु यहाँ से जा रहा है।”

38 सो अंधा यह कहते हुए पुकार उठा, “दाऊद के बेटे यीशु! मुझ पर दया कर।”

39 वे जो आगे चल रहे थे उन्होंने उससे चुप रहने को कहा। किन्तु वह और अधिक पुकारने लगा, “दाऊद के पुत्र, मुझ पर दया कर।”

40 यीशु रुक गया और उसने आज्ञा दी कि नेत्रहीन को उसके पास लाया जाये। सो जब वह पास आया तो यीशु ने उससे पूछा, 41 “तू क्या चाहता है? मैं तेरे लिये क्या करूँ?”

उसने कहा, “हे प्रभु, मैं फिर से देखना चाहता हूँ।”

42 इस पर यीशु ने कहा, “तुझे ज्योति मिले, तेरे विश्वास ने तेरा उद्धार किया है।”

43 और तुरन्त ही उसे आँखें मिल गयीं। वह परमेश्वर की महिमा का बखान करते हुए यीशु के पीछे हो लिया। जब सब लोगों ने यह देखा तो वे परमेश्वर की स्तुति करने लगे।

जक्कई

19यीशु यरीहो में प्रवेश करके नगर से होकर जा रहा था 2 वहाँ जक्कई नाम का एक व्यक्ति भी मौजूद था। वह कर वसूलने वालों का मुखिया था। सो वह बहुत धनी था। 3 वह यह देखने का जतन कर रहा था कि यीशु कौन है, पर भीड़ के कारण वह देख नहीं पा रहा था क्योंकि उसका कद छोटा था। 4 सो वह सब के आगे दौड़ता हुआ एक गूलर के पेड़ पर जा चढ़ा ताकि, वह उसे देख सके क्योंकि यीशु को उसी रास्ते से होकर निकलना था।

5 फिर जब यीशु उस स्थान पर आया तो उसने ऊपर देखते हुए जक्कई से कहा, “जक्कई, जल्दी से नीचे उतर आ क्योंकि मुझे आज तेरे ही घर ठहरना है।”

6 सो उसने झटपट नीचे उतर प्रसन्नता के साथ उसका स्वागत किया। 7 जब सब लोगों ने यह देखा तो वे बड़बड़ाने लगे और कहने लगे, “यह एक पापी के घर अतिथि बनने जा रहा है!”

8 किन्तु जक्कई खड़ा हुआ और प्रभु से बोला, “हे प्रभु, देख, मैं अपनी सारी सम्पत्ति का आधा गरीबों को दे दूँगा और यदि मैंने किसी का छल से कुछ भी लिया है तो उसे चौगुना करके लौटा दूँगा!”

9 यीशु ने उससे कहा, “इस घर पर आज उद्धार आया है, क्योंकि यह व्यक्ति भी इब्राहीम की ही एक सन्तान है। 10 क्योंकि मनुष्य का पुत्र जो कोई खो गया है, उसे ढूँढने और उसकी रक्षा के लिए आया है।”

समीक्षा

अपने जीवन को सही दिशा में रखे

यीशु हमारे जीवन के लिए छुटकारे और बदलाव को संभव बनाने के लिए आए.

वह बारह को अलग करते हैं (18:31) और समझाते हैं कि उनके आने के उद्देश्य में लोग उन्हें ठट्ठों में उड़ाएँगे, उनका अपमान करेंगे, और उन पर थूकेंगे, और कोड़े मारेंगे और घात करेंगे (व.32). लेकिन 'तीसरे दिन' वह फिर जी उठेंगे (व.33). यह यीशु का क्रूस पर चढ़ाया जाना और पुनरुत्थान है जो हर मनुष्य के लिए आशा प्रदान करता है.

अंधा मनुष्य एक ऐसा उदाहरण है जिसका जीवन यीशु से मिलने पर पूरी तरह से बदल गया. एक मनुष्य जिसका जीवन सड़क के किनारे बैठकर भीख माँगते हुए समाप्त हो चुका था, उसका जीवन बदल गया जब वह दया के लिए पुकारता है. यीशु उससे कहते हैं: 'आगे बढ़ो –और देखो! तुम्हारें विश्वास ने तुम्हें बचाया है और चंगा किया है!' वह तुरंत चंगा हो गयाः वह देखने लगा – और फिर परमेश्वर की महिमा करते हुए यीशु के पीछे चलने लगा (वव.42-43अ, एम.एस.जी.).

इसके बाद, जक्कई यीशु से मिलता है. शायद से जक्कई जवान नहीं थे. 'प्रमुख महसूल लेने वाले' के रूप में, वह अपने पेशे के सबसे ऊँचे पद पर पहुंच चुके थे (19:2). वह अब भी दौड़ सकते थे और एक पेड़ पर चढ़ सकते थे (व.4) – लेकिन वह जवान नहीं हो रहे थे. वह अमीर बन चुके थे (व.2) और शायद से उनका काम उनके लिए प्राथमिकता था. प्रमुख महसूल लेने वाले के रूप में जक्कई के अधीन काम करने वाले लोग थे.

बहुत सी बार उनका प्रमोशन हुआ होगा, और वह संतोष के साथ अपनी पिछली उपलब्धियों को देख सकते थे. फिर भी, एक महसूल लेने वाले के रूप में इस कार्य की व्यक्तिगत कीमत थी समाज से बहिष्कार और गुमनामी. जक्कई की दशा वाले लोग उनके काम पर पछताते हैं और अपने चुने हुए जीवन में अपने आपको फँसा हुआ पाते हैं.

अवश्य ही उनका परिवार होगा, और हमने उसके 'घर' के विषय में पढ़ा है (व.9). शायद से वह उनके लिए कठोर परिश्रम करते थे. एक मध्यम जीवन का संकट पारिवारिक जीवन को तबाह कर देता है. एक व्यक्ति जो मध्यम जीवन के संकंट में है वह अपने नजदीकी लोगों पर गुस्सैल, उदास और अक्खड़ बन जाता है - यह महसूस करते हुए कि इससे अंतर नही पड़ता है कि वह कितना कठिन परिश्रम करते हैं, उनके परिवार को उससे अधिक की आवश्यकता है जितना कि वह कमा सकते हैं.

जक्कई निश्चित ही एक धार्मिक परिवार से था. उसके माता-पिता उसे जक्कई बुलाते थेः यानि 'सत्यनिष्ठ'. लेकिन अब धार्मिक लोग उसे एक 'पापी' के रूप में देखते थे (व.7) क्योंकि वह अपने ही लोगों से कर्ज लेकर रोमन राज्य के लोगों को देते थे और स्वयं के लिए इसमें से बहुत कुछ ले लेते थे.

फिर भी, 'वह देखना चाहते थे कि यीशु कौन हैं' (व.3). उसने निश्चय ही जाना होगा कि उन्हें जरुरत है. उनके संपूर्ण पैसे में, सफलता में, पारिवारिक जीवन में और 'धर्म' में कुछ कमी है. जक्कई यीशु के जाने बिना उन्हें देखना चाहते थे (व.4).

बहुत से लोग महसूस करते हैं कि उनके पाप और असिद्धता के कारण परमेश्वर उनसे दूर हो जाएंगे. लेकिन परमेश्वर असिद्ध लोगों से प्रेम करते हैं और, वह आपसे दूर जाने के बजाय, आपके पास आते हैं.

जक्कई समझ नहीं सके कि आप परमेश्वर से छिप नहीं सकते हैं. यीशु उसे जानते थे और यीशु को उनका नाम भी पता था. जक्कई समझ नहीं पाये कि यीशु उनसे प्रेम करते थे और उनके बारे में जानना चाहते थे (व.5). जीवन में आपने जो कुछ किया हो और जो कुछ् आपकी असिद्धता हो, यीशु आपसे प्रेम करते हैं और आपके साथ एक संबंध में रहना चाहते हैं. किंतु उन्हें एक उत्तर की आवश्यकता है. जक्कई से मिलने पर, यीशु ने कहा, 'तुरंत नीचे आ जाओ' (व.5).

जक्कई ने अपने आपको दीन किया और यीशु की आज्ञा मानी. उसने इसे नकारा नहीं. वह तुरंत नीचे उतरे और आनंद के साथ उनका स्वागत किया (व.6). यीशु भीड़ की नकारात्मक प्रतिक्रिया के कारण पीछे नहीं हटे (व.7).

इसके परिणामस्वरूप जक्कई के जीवन में एक पूर्ण बदलाव आया (व.8 से लेकर). उसने निर्णय लिया कि 'अपनी आधी संपत्ति गरीबों को दे देंगे, और यदि मैंने किसी को धोखा दिया है, तो मैं चार गुना कीमत चुकाऊँगा' (व.8). संपत्ति के लिए उनका बर्ताव पूरी तरह से बदल गया. हमारे लिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि, 'मुझे कितना मिल सकता है?' लेकिन, 'मैं कितना दे सकता हूँ?' (व.8).

उसका संपूर्ण जीवन बदल गया. यीशु ने उनसे कहा, 'आज उद्धार इस घर में आया है' (व.9). यीशु के आगमन से उसके घराने में उद्धार आया. उद्धार का अर्थ है स्वतंत्रता. इसका अर्थ है यीशु के साथ एक संबंध जो अनंतकाल तक बना रहता है. यह मध्यम जीवन सकंट को भी दृष्टिकोण में रखता है.

अंत में, जक्कई की तरह आप समाज में परमेश्वर के बदलाव के एक भाग बन सकते है. जक्कई और उनके घराने में बदलाव ने गरीबों को लाभ पहुँचाया और जिन लोगों को धोखा मिला था उन्हें न्याय दिलाया.

प्रार्थना

परमेश्वर, आपका धन्यवाद क्योंकि आप मुझसे प्रेम करते हैं और आप मेरे जीवन को बेहतर बनाने के लिए एक सकंट का इस्तेमाल करते हैं. आज मुझे आपसे मिलने में सहायता कीजिए.

जूना करार

व्यवस्था विवरण 29:1-30:10

मोआब में वाचा

29ये बातें उस वाचा का अंग हैं जिस वाचा को यहोवा ने मोआब प्रदेश मे इस्राएल के लोगों के साथ मूसा से करने को कहा। यहोवा ने इस वाचा को उस साक्षीपत्र से अतिरिक्त किया जिसे उसने इस्राएल के लोगों के साथ होरेब (सीनै) पर्वत पर किया था।

2 मूसा ने सभी इस्राएली लोगों को इकट्ठा बुलाया। उसने उनसे कहा, “तुमने वह सब कुछ देखा जो याहोवा ने मिस्र देश में किया। तुमने वह सब भी देखा जो उसने फिरौन, फिरौन के प्रमुखों और उसके पूरे देश के साथ किया। 3 तुमने उन बड़ी मुसीबतों को देखा जो उसने उन्हें दीं। तुमने उसके उन चमत्कारों और बड़े आश्चर्यों को देखा जो उसने किये। 4 किन्तु आज भी तुम नहीं समझते कि क्या हुआ। यहोवा ने सचमुच तुमको नहीं समझाया जो तुमने देखा और सुना। 5 यहोवा तुम्हें चालीस वर्ष तक मरुभूमि से होकर ले जाता रहा और उस लम्बे समय के बीच तुम्हारे वस्त्र और जूते फटकर खत्म नहीं हुए। 6 तुम्हारे पास कुछ भी भोजन नहीं था। तुम्हारे पास कुछ भी दाखमधु या कोई अन्य पीने की चीज़ नहीं थी। किन्तु यहोवा ने तुम्हारी देखभाल की उसने यह इसलिए किया कि तुम समझोगे कि वह यहोवा, तुम्हारा परमेश्वर है।

7 “जब तुम इस स्थान पर आए तब हेशबोन का राजा सीहोन और बाशान का राजा ओग हम लोगों के विरुद्ध लड़ने आए। किन्तु हम लोगों ने उन्हें हराया। 8 तब हम लोगों ने ये प्रदेश रूबेनियों, गादियों और मनश्शे के आधे लोगों को उनके कब्जे में दे दिया। 9 इसलिए, इस वाचा के आदेशों का पालन पूरी तरह करो। तब जो कुछ तुम करोगे उसमे सफल होगे।

10 “आज तुम सभी यहोवा अपने परमेश्वर के सामने खड़े हो। तुम्हारे प्रमुख, तुम्हारे अधिकारी, तुम्हारे बुजुर्ग (प्रमुख) और सभी अन्य लोग यहाँ हैं। 11 तुम्हारी पत्नियाँ और बच्चे यहाँ हैं तथा वे विदेशी भी यहाँ हैं जो तुम्हारे बीच रहते हैं एवं तुम्हारी लकड़ियाँ काटते और पानी भरते हैं। 12 तुम सभी यहाँ यहोवा अपने परमेश्वर के साथ एक वाचा करने वाले हो। यहोवा तुम लोगों के साथ यह वाचा आज कर रहा है। 13 इस वाचा द्वारा यहोवा तुम्हें अपने विशेष लोग बना रहा है और वह स्वंय तुम्हारा परमेश्वर होगा। उसने यह तुमसे कहा है। उसने तुम्हारे पूर्वजों इब्राहीम, इसहाक और याकूब को यह वचन दिया था। 14 यहोवा अपना वचन देकर केवल तुम लोगों के साथ ही वाचा नहीं कर रहा है। 15 वह यह वाचा हम सभी के साथ कर रहा है जो यहाँ आज यहोवा अपने परमेश्वर के सामने खड़े हैं। किन्तु यह वाचा हमारे उन वंशजों के लिये भी है जो यहाँ आज हम लोगों के साथ नहीं हैं। 16 तुम्हें याद है कि हम मिस्र में कैसे रहे और तुम्हें याद है कि हमने उन देशों से होकर कैसे यात्रा की जो यहाँ तक आने वाले हमारे रास्ते पर थे। 17 तुमने उनकी घृणित चीज़ें अर्थात् लकड़ी, पत्थर, चाँदी, और सोने की बनी देवमूर्तियाँ देखीं। 18 निश्चय कर लो कि आज यहाँ हम लोगों में कोई ऐसा पुरुष, स्त्री, परिवार या परिवार समूह नहीं है जो यहोवा, अपने परमेश्वर के विपरीत जाता हो। कोई भी व्यक्ति उन राष्ट्रों के देवताओं की सेवा करने नहीं जाना चाहिए। जो लोग ऐसा करते हैं वे उस पौधे की तरह हैं जो कड़वा, जहरीला फसल पैदा करता है।

19 “कोई व्यक्ति इन अभिशापों को सुन सकता है और अपने को संतोष देता हुआ कह सकता है, ‘मैं जो चाहता हूँ करता रहूँगा। मेरा कुछ भी बुरा नहीं होगा।’ वह व्यक्ति अपने ऊपर ही आपत्ति नहीं बुलाएगा अपितु वह सबके ऊपर अच्छे लोगों पर भी बुलाएगा। 20-21 यहोवा उस व्यक्ति को क्षमा नहीं करेगा। नहीं, यहोवा उस व्यक्ति पर क्रोधित होगा और बौखला उठेगा। इस पुस्तक में लिखे सभी अभिशाप उस पर पड़ेंगे। यहोवा उसे इस्रएल के सभी परिवार समूहों से निकाल बाहर करेगा। यहोवा उसको पूरी तरह नष्ट करेगा। सभी आपत्तियाँ जो इस पुस्तक में लिखी गई हैं, उस पर आयेंगी। वे सभी बातें उस वाचा का अंश हैं जो व्यवस्था की पुस्तक में लिखी गई हैं।

22 “भविष्य में, तुम्हारे वंशज और बहुत दूर के देशों से आने वाले विदेशी लोग देखेंगे कि देश कैसे बरबाद हो गया है। वे उन लोगों को देखेंगे जिन्हें यहोवा उनमें लायेगा। 23 सारा देश जलते गन्धक और नमक से ढका हुआ बेकार हो जाएगा। भूमि में कुछ भी बोया हुआ नहीं रहेगा। कुछ भी, यहाँ तक कि खर—पतवार भी यहाँ नहीं उगेंगे। यह देश उन नगरों—सदोम, अमोरा, अदमा और सबोयीम, की तरह नष्ट कर दिया जाएगा। जिन्हें यहोवा, ने तब नष्ट किया था जब वह बहुत क्रोधित था।

24 “सभी दूसरे राष्ट्र पूछेंगे, ‘यहोवा ने इस देश के साथ ऐसा क्यों किया? वह इतना क्रोधित क्यों हुआ?’ 25 उत्तर होगा: ‘यहोवा इसलिए क्रोधित हुआ कि इस्राएल के लोगों ने यहोवा, अपने पूर्वजों के परमेश्वर की वाचा तोड़ी। उन्होंने उस वाचा का पालन करना बन्द कर दिया जिसे योहवा ने उनके साथ तब किया था जब वह उन्हें मिस्र देश से बाहर लाया था। 26 इस्राएल के लोगों ने ऐसे अन्य देवाताओं की सेवा करनी आरम्भ की जिनकी पूजा का ज्ञान उन्हें पहले कभी नहीं था। यहोवा ने अपने लोगों से उन देवताओं की पूजा करना मना किया था। 27 यही कारण है कि यहोवा इस देश के लोगों के विरुद्ध बहुत क्रोधित हो गया। इसलिए उसने इस पुस्तक में लिखे गए सभी अभिशापों को इन पर लागू किया। 28 यहोवा उन पर बहुत क्रोधित हुआ और उन पर बौखला उठा। इसलिए उसने उनके देश से उन्हें बाहर किया। उसने उन्हें दूसरे देश में पहुँचाया जहाँ वे आज हैं।’

29 “कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें यहोवा हमारे परमेश्वर ने गुप्त रखा है। उन बातों को केवल वह ही जानता है। किन्तु यहोवा ने हमें अपने नियमों की जानकारी दी है! वह व्यवस्था हमारे लिये और हमारे वंशजों के लिये है। हमें इसका पालन सदैव करना चाहिए!

इस्राएलियों की वापसी का वचन

30“जो मैंने कहा है वह तुम पर घटित होगा। तुम आशीर्वाद से अच्छी चीजें पाओगे और अभिशाप से बुरी चीज़ें पाओगे। यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुम्हें दूसरे राष्ट्रों में भेजेगा। तब तुम इनके बारे में सोचोगे। 2 उस समय तुम और तुम्हारे वंशज यहोवा, अपने परमेश्वर के पास लौटेंगे। तुम पूरे हृदय और आत्मा से उन आदेशों का पालन करोगे जो आज हम ने दिये हैं उनका पूरा पालन करोगे। 3 तब यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुम पर दयालु होगा। यहोवा तुम्हें फिर स्वतन्त्र करेगा। वह उन राष्ट्रों से तुम्हें लौटाएगा जहाँ उसने तुम्हें भेजा था। 4 चाहे तुम पृथ्वी के दूरतम स्थान पर भेज दिये गये हो, यहोवा, तुम्हारा परमेश्वर तुमको इकट्ठा करेगा और तुम्हें वहाँ से वापस लाएगा। 5 यहोवा तुम्हें उस देश में लाएगा जो तुम्हारे पूर्वजों का था और वह देश तुम्हारा होगा। यहोवा तुम्हारा भला करेगा और तुम्हारे पास उससे अधिक होगा, जितना तुम्हारे पूर्वजों के पास था और तुम्हारे राष्ट्र में उससे अधिक लोग होंगे जितने उनके पास कभी थे। 6 यहोवा तुम्हारा परमेश्वर, तुम्हें और तुम्हारे वंशजों को परिशुद्ध करेगा कि वे उसकी आज्ञा का पालन करना चाहेंगे। तब तुम यहोवा को सम्पूर्ण हृदय से प्रम करोगे और तुम जीवित रहोगे!

7 “और यहोवा तुम्हारा परमेश्वर इन अभिशापों को तुम्हारे उन शत्रुओं पर उतारेगा जो तुमसे घृणा करते हैं तथा तुम्हें परेशान करते हैं 8 और तुम फिर यहोवा की आज्ञा का पालन करोगे। तुम उन सभी आदेशों का पालन करोगे जिन्हें मैंने आज तुम्हें दिये है। 9 यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुम्हें उन सब में सफल बनाएगा जो तुम करोगे। वह तुम्हें बहुत से बच्चों के लिये, तुम्हारे मवेशियों को बहुत बछड़े और तुम्हारे खेतों को अच्छी फ़सल होने का वरदान देगा। यहोवा तुम्हारे लिए भला होगा। यहोवा तुम्हारा भला करने में वैसा ही आनन्दित होगा जैसा आनन्दित वह तुम्हारे पूर्वजों का भला करने में होता था। 10 किन्तु तुम्हें वह सब कुछ करना चाहिए जो यहोवा तुम्हारा परमेश्वर तुमसे करने को कहता है। तुम्हें उसके आदेशों को मानना और व्यवस्था की पुस्तक में लिखे गए नियमों का पालन करना चाहिए। तुम्हें यहोवा अपने परमेश्वर की ओर अपने पूरे हृदय और आत्मा से हो जाना चाहिए। तब ये सभी अच्छी बातें तुम्हारे लिये होंगी।

समीक्षा

संपूर्ण हृदय का एक जीवन जीयें

हाल ही में मैं, दोपहर के भोजन के लिए एक छिय्यासी वर्षीय महिला के पास में बैठा था. वह एक पहियो वाली कुर्सी पर बैठी हुई थी. मैंने जल्द ही जान लिया कि उनका शरीर असफल हो रहा था, लेकिन उनका दिमाग नहीं. उन्होंने बहुत कुछ कठिन धारणाओं से संबंधित प्रश्न पूछे. जब मैंने उनसे पूछा कि उनके अनुसार इन प्रश्नों का उत्तर क्या है, तब उन्होंने इस लेखांश से एक वचन लेकर उत्तर दियाः 'गुप्त बातें हमारे परमेश्वर यहोवा के वश में है; परंतु जो प्रकट की गई हैं वे सदा के लिये हमारे और हमारे वंश के वश में रहेंगी' (29:29).

उसने कहा कि वह समझ चुकी थी कि कुछ चीजों का उत्तर हम जानते हैं, लेकिन दूसरे (जैसे कि वह जिस तरह के प्रश्न को बता रही थी!) शायद से इस जीवन में हमें उनका उत्तर पता न हो. वे 'रहस्यमय चीजों' के भाग थे जो 'परमेश्वर के वश में हैं'.

किंतु, यें कुछ चीजे हैं जो हमारे वश में हैं. परमेश्वर ने हम पर प्रकट किया है कि कैसे 'अच्छी तरह से और बुद्धिपूर्वक' जीवन जीना है (व.9, एम.एस.जी). हमें 'परमेश्वर से मन फिराना' बंद करना चाहिए' (व.18), यह सोचते हुए कि मैं जैसे चाहूँ वैसे जीऊंगा, धन्यवाद, ' और आखिर में 'सभी के जीवन को बरबाद' कर देते हैं (व.19, एम.एस.जी.).

आपके जीवन को महान बनाने का तरीका है पूरे दिल से परमेश्वर की बातें सुनना और मानना (30:2-10): 'अपने पूरे हृदय से और प्राण से उनकी आज्ञा मानना... वह आप पर दया करेंगे; वह वापस आकर टुकड़ो को बटोरेंगे...और आप एक नई शुरुवात करेंगे, परमेश्वर की बातें सुनते हुए और मानते हुए...यहाँ पर कुछ भी आधे हृदय से नहीं; आपको अवश्य ही परमेश्वर के पास लौट आना है, आपके परमेश्वर के पास, पूरी तरह से, हृदय और प्राण कुछ भी न छोड़ते हुए' (वव.2-10 एम.एस.जी.).

एक संपूर्ण हृदय वाला जीवन जीने की शुरुवात करने में बहुत देर नहीं हुई है.

प्रार्थना

परमेश्वर, मेरी सहायता कीजिए कि अब से मैं आपके प्रति पूरे हृदय की आज्ञाकारिता का एक जीवन जीऊँ. मेरी सहायता कीजिए कि मैं भटक न जाऊँ. होने दीजिए कि एक नई शुरुवात हो. मेरी सहायता कीजिए कि पूरे हृदय से आपकी आज्ञा मानूँ.

पिप्पा भी कहते है

लूका 19:1-10

मैं एक बार गुड फ्रायडे को त्रफलघर स्केवअर में पैशन ऑफ जीसस, नाटक देखने गया था. वहाँ पर इतने लोग थे कि देखना एक चुनौती था. कद में छोटा होने के कारण मुझे जक्कई की तरह महसूस हुआ जो यीशु के पास पहुँचने की कोशिश कर रहा था. यदि वहाँ पर एक पेड़ होता तो मैं अवश्य ही उस पर चढ़ जाता !

मैंने मेज पर खड़े होने की कोशिश की, दीवार पर देखने की कोशिश करते हुए. पहरेदार ने दो बार मुझे निकाल दिया! यह बहुत ही निराशाजनक था. मैं यीशु को देखना चाहता था (चाहे यह नकली हो!). अवश्य ही जक्कई के लिए यह उत्साहित करने वाली और सांस को थाम देने वाला अनुभव था क्योंकि यीशु ने भीड़ में सबसे अधिक ध्यान उस पर दिया. यीशु हमें देखते हैं और हमें खोजते हैं, यदि हम महत्वहीन भी महसूस करते हैं.

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संदर्भ

नोट्स:

जहाँ पर कुछ बताया न गया हो, उन वचनों को पवित्र बाइबल, न्यू इंटरनैशनल संस्करण एन्ग्लिसाइड से लिया गया है, कॉपीराइट © 1979, 1984, 2011 बिबलिका, पहले इंटरनैशनल बाइबल सोसाइटी, हूडर और स्टोगन पब्लिशर की अनुमति से प्रयोग किया गया, एक हॅचेट यूके कंपनी सभी अधिकार सुरक्षित। ‘एनआईवी’, बिबलिका यू के का पंजीकृत ट्रेडमार्क संख्या 1448790 है।

जिन वचनों को (एएमपी, AMP) से चिन्हित किया गया है उन्हें एम्प्लीफाइड® बाइबल से लिया गया है. कॉपीराइट © 1954, 1958, 1962, 1964, 1965, 1987 लॉकमैन फाउंडेशन द्वारा प्राप्त अनुमति से उपयोग किया गया है। (www.Lockman.org)

जिन वचनों को (एमएसजी MSG) से चिन्हित किया गया है उन्हें मैसेज से लिया गया है। कॉपीराइट © 1993, 1994, 1995, 1996, 2000, 2001, 2002. जिनका प्रयोग एनएवीप्रेस पब्लिशिंग ग्रुप की अनुमति से किया गया है।

एक साल में बाइबल

  • एक साल में बाइबल

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