दिन 204

परमेश्वर, सहायता करें!

बुद्धि भजन संहिता 88:9-18
नए करार रोमियों 7:7-25
जूना करार होशे 6:1-7:16

परिचय

मैं अक्सर प्रार्थना करता हूँ, 'सहायता करें!' बाईबल में भी यह सबसे सामान्य प्रार्थना है। यह एक प्रार्थना है जिसे आप हर दिन, हर स्थिति में कर सकते हैं। आप परमेश्वर से सहायता माँग सकते हैं। आपके लिए परमेश्वर की इच्छा है कि आप उनके साथ एक ऐसे संबंध में आ जाएँ जो कि वास्तविक और हृदय से है।

बुद्धि

भजन संहिता 88:9-18

9 मेरे दु:खों के लिये रोते रोते मेरी आँखे सूज गई हैं।

 हे यहोवा, मैं तुझसे निरतंर प्रार्थना करता हूँ।
 तेरी ओर मैं अपने हाथ फैला रहा हूँ।
10 हे यहोवा, क्या तू अद्भुत कर्म केवल मृतकों के लिये करता है?
 क्या भूत (मृत आत्माएँ) जी उठा करते हैं और तेरी स्तुति करते हैं? नहीं। 11 मरे हुए लोग अपनी कब्रों के बीच तेरे प्रेम की बातें नहीं कर सकते।
 मरे हुए व्यक्ति मृत्युलोक के भीतर तेरी भक्ति की बातें नहीं कर सकते।
12 अंधकार में सोये हुए मरे व्यक्ति उन अद्भुत बातों को जिनको तू करता है, नहीं देख सकते हैं।
 मरे हुए व्यक्ति भूले बिसरों के जगत में तेरे खरेपन की बातें नहीं कर सकते।

13 हे यहोवा, मेरी विनती है, मुझको सहारा दे!
 हर अलख सुबह मैं तेरी प्रार्थना करता हूँ।
14 हे यहोवा, क्या तूने मुझको त्याग दिया?
 तूने मुझ पर कान देना क्यों छोड़ दिया?

15 मैं दुर्बल और रोगी रहा हूँ।
 मैंने बचपन से ही तेरे क्रोध को भोगा है। मेरा सहारा कोई भी नहीं रहा।
16 हे यहोवा, तू मुझ पर क्रोधित है
 और तेरा दण्ड मुझको मार रहा है।
17 मुझे ऐसा लगता है, जैसे पीड़ा और यातनाएँ सदा मेरे संग रहती हैं।
 मैं अपनी पीड़ाओं और यातनाओं में डूबा जा रहा हूँ।
18 हे यहोवा, तूने मेरे मित्रों और प्रिय लोगों को मुझे छोड़ चले जाने को विवश कर दिया।
 मेरे संग बस केवल अंधकार रहता है।

समीक्षा

टूटे हुए संबंधो में सहायता

नकार दिया जाना हमेशा चोट पहुँचाता है – विशेष रूप से जब ऐसा कोई व्यक्ति यह करता है जिससे हम प्रेम करते हैं या जो हमारे बहुत करीब है। टूट हुए संबंध दर्दभरे हैं – विशेषत जब हम महसूस करते हैं कि एक ’प्रेमी, ' एक ’पड़ोसी' या एक करीबी मित्र ने हमें ’छोड़' दिया है। भजनसंहिता के लेखक महसूस करते हैं क्योंकि ’प्रेमी और पड़ोसी दोनों ने मुझे छोड़ दिया है; मेरे पास केवल एक मित्र बचा है वह है अंधकार' (व.18, एम.एस.जी)।

वह कहते हैं, 'क्योंकि जहाँ तक मुझे याद था मैं दुखी था' (व.15, एम.एस.जी.)। स्थिति बहुत ही निराशाजनक लगती हैः अंधकार (व.12), परमेश्वर के द्वारा नकारा गया महसूस करते हुए (व.14), क्लेश (व.15अ), आतंक और उदासी (व.15ब)। ’वह दिन भर जल के समान मुझे घेरे रहता है; वह मेरे चारों ओर दिखाई देता है' (व.17, एम.एस.जी.)।

फिर भी एक आशा है। आशा इस तथ्य से आती है कि इन सभी के बीच में, वह हर दिन की शुरुवात परमेश्वर को पुकारने के द्वारा करते हैं:’हे यहोवा, मैं लगातार तुझे पुकारता और अपने हाथ तेरी ओर फैलाता आया हूँ' (व.9ब)।

शायद से आज आप एक संबंध के साथ संघर्ष कर रहे हैं: आपके विवाह में, काम पर, चर्च में या एक नजदीकी मित्र के साथ। आपकी स्थिति चाहे कितनी बुरी क्यों न दिखाई दे, हमेशा एक आशा है यदि आप सहायता के लिए परमेश्वर को पुकारेंगे।

प्रार्थना

`हे यहोवा, मैंने तेरी दोहाई दी है; और भोर को मेरी प्रार्थना तुझ तक पहुँचेगी' (व.13)। हे परमेश्वर, मैं आपकी ओर अपने हाथ फैलाता हूँ। मैं आपसे सहायता मांगता हूँ...

नए करार

रोमियों 7:7-25

पाप से लड़ाई

7 तो फिर हम क्या कहें? क्या हम कहें कि व्यवस्था पाप है? निश्चय ही नहीं। जो भी हो, यदि व्यवस्था नहीं होती तो मैं पहचान ही नहीं पाता कि पाप क्या है? यदि व्यवस्था नहीं बताती, “जो अनुचित है उसकी चाहत मत करो” तो निश्चय ही मैं पहचान ही नहीं पाता कि अनुचित इच्छा क्या है। 8 किन्तु पाप ने मौका मिलते ही व्यवस्था का लाभ उठाते हुए मुझमें हर तरह की ऐसी इच्छाएँ भर दीं जो अनुचित के लिए थीं। व्यवस्था के अभाव में पाप तो मर गया। 9 एक समय मैं बिना व्यवस्था के ही जीवित था, किन्तु जब व्यवस्था का आदेश आया तो पाप जीवन में उभर आया। 10 और मैं मर गया। वही व्यवस्था का आदेश जो जीवन देने के लिए था, मेरे लिए मृत्यु ले आया। 11 क्योंकि पाप को अवसर मिल गया और उसने उसी व्यवस्था के आदेश के द्वारा मुझे छला और उसी के द्वारा मुझे मार डाला।

12 इस तरह व्यवस्था पवित्र है और वह विधान पवित्र, धर्मी और उत्तम है। 13 तो फिर क्या इसका यह अर्थ है कि जो उत्तम है, वही मेरी मृत्यु का कारण बना? निश्चय ही नहीं। बल्कि पाप उस उत्तम के द्वारा मेरे लिए मृत्यु का इसलिए कारण बना कि पाप को पहचाना जा सके। और व्यवस्था के विधान के द्वारा उसकी भयानक पापपूर्णता दिखाई जा सके।

मानसिक द्वन्द्व

14 क्योंकि हम जानते हैं कि व्यवस्था तो आत्मिक है और मैं हाड़-माँस का भौतिक मनुष्य हूँ जो पाप की दासता के लिए बिका हुआ है। 15 मैं नहीं जानता मैं क्या कर रहा हूँ क्योंकि मैं जो करना चाहता हूँ, नहीं करता, बल्कि मुझे वह करना पड़ता है, जिससे मैं घृणा करता हूँ। 16 और यदि मैं वही करता हूँ जो मैं नहीं करना चाहता तो मैं स्वीकार करता हूँ कि व्यवस्था उत्तम है। 17 किन्तु वास्तव में वह मैं नहीं हूँ जो यह सब कुछ कर रहा है, बल्कि यह मेरे भीतर बसा पाप है। 18 हाँ, मैं जानता हूँ कि मुझ में यानी मेरे भौतिक मानव शरीर में किसी अच्छी वस्तु का वास नहीं है। नेकी करने के इच्छा तो मुझ में है पर नेक काम मुझ से नहीं होते। 19 क्योंकि जो अच्छा काम मैं करना चाहता हूँ, मैं नहीं करता बल्कि जो मैं नहीं करना चाहता, वे ही बुरे काम मैं करता हूँ। 20 और यदि मैं वही काम करता हूँ जिन्हें करना नहीं चाहता तो वास्तव में उनका कर्ता जो उन्हें कर रहा है, मैं नहीं हूँ, बल्कि वह पाप है जो मुझ में बसा है।

21 इसलिए मैं अपने में यह नियम पाता हूँ कि मैं जब अच्छा करना चाहता हूँ, तो अपने में बुराई को ही पाता हूँ। 22 अपनी अन्तरात्मा में मैं परमेश्वर की व्यवस्था को सहर्ष मानता हूँ। 23 पर अपने शरीर में मैं एक दूसरे ही नियम को काम करते देखता हूँ यह मेरे चिन्तन पर शासन करने वाली व्यवस्था से युद्ध करता है और मुझे पाप की व्यवस्था का बंदी बना लेता है। यह व्यवस्था मेरे शरीर में क्रियाशील है। 24 मैं एक अभागा इंसान हूँ। मुझे इस शरीर से, जो मौत का निवाला है, छुटकारा कौन दिलायेगा? 25 अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ। सो अपने हाड़ माँस के शरीर से मैं पाप की व्यवस्था का गुलाम होते हुए भी अपनी बुद्धि से परमेश्वर की व्यवस्था का सेवक हूँ।

समीक्षा

पाप के साथ संघर्ष में सहायता

क्या आप अपने आपको बुरी आदतों में या पाप में फँसा हुआ पाते हैं, जिनसे आप स्वतंत्र होना चाहते हैं लेकिन अपने आपको ऐसा करने में असमर्थ पाते हैं? क्या आप ऐसी स्थिति में अपने आपको पाते हैं कि कुछ करने का निर्णय लेते हैं और उसे नहीं करते हैं?

पौलुस लिखते हैं, 'जो मैं करता हूँ उस को नहीं जानता; क्योंकि जो मैं चाहता हूँ वह नहीं किया करता, परन्तु जिस से मुझे घृणा आती है वही करता हूँ।' (व.15, एम.एस.जी.)।

वह आगे कहते हैं, 'इस प्रकार मैं यह व्यवस्था पाता हूँ कि जब भलाई करने की इच्छा करता हूँ, तो बुराई मेरे पास आती है। क्योंकि मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ। परन्तु मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था दिखाई पड़ती हैं, जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है और मुझे पाप की व्यवस्था के बन्धन में डालती हैं जो मेरे अंगों में है।' (वव.21-23, एम.एस.जी.)।

पौलुस कहते हैं, 'निश्चित ही मुझे सहायता की आवश्यकता है!' (व.18, एम.एस.जी)। वह चिल्लाते हैं:'मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?' (व.24)।

(कल के लेखांश में) यह कहकर कि आप नियम से मुक्त हैं (व.6), पौलुस उन प्रश्नों का अनुमान लगाते हैं जो इस विषय में उठेंगे कि वह क्या कह रहे हैं। क्या वह पाप और नियम को समान बता रहे हैं? (व.7)।

वह दर्शाते हैं कि नियम पाप नहीं है। वैसा ही उल्टा है। 'इसलिये व्यवस्था पवित्र है, और आज्ञा भी ठीक और अच्छी है' (व.12, एम.एस.जी)। हम हैं जो पापमय हैं। नियम इसे दर्शाता है यह प्रकट करने के द्वारा कि पाप क्या है, और हम नियम का पालन नहीं कर सकते हैं। सच में यह हममें पाप को और भी बदतर कर देता है।

पिछले वाले से अगला प्रश्न मिलता है। यदि नियम अच्छा है, तो क्यों इससे मेरी मृत्यु होती है? (व.13)। ’नही, ' पौलुस कहते हैं। यह नियम नहीं – लेकिन मेरे पाप- मुझे मृत्यु की ओर ले जाते हैं। यदि किसी पर एक अपराध का दोष लगा है, तो नियम उसे दंड नहीं देता है। इसके बजाय यह अपराध है जो दंड देता है। नियम केवल स्तर बनाये रखता है।

इस लेखांश पर बहुत सी स्याही गिरा दी गई है। मुख्य विवाद यह है कि क्या पौलुस उनके मसीह या मसीह बनने से पहले की अवस्था के बारे में बता रहे हैं। यह स्पष्ट रूप से जीवनकथा है, लेकिन वह नियम के अंतर्गत जीने वालो की अवस्था के विषय में भी बात कर रहे हैं।

शायद से हमें इस लेखांश को उस मसीह के वर्णन के रूप में देखना चाहिए जो आत्मा की सामर्थ की परिपूर्णता में नहीं जी रहा है, यद्यपी वह ऐसा करने की इच्छा करता है। इसे इस तरह से पढ़ा जा सकता है, आत्मा में जीने के लिए मनुष्य की पुकार, युगों से जो मसीहों के जीवन में दुबारा सुनी जा रही है।

हम जानते हैं कि परमेश्वर की व्यवस्था, पवित्र, सत्यनिष्ठ और अच्छी है (व.12)। हम जानते हैं कि यह आत्मिक है (व.14)। फिर भी हम अपने आपको असफल होते हुए देखते हैं:'हम जानते हैं कि व्यवस्था तो आत्मिक है, परन्तु मैं शारीरिक और पाप के हाथ बिका हुआ हूँ। जो मैं करता हूँ उस को नहीं जानता; क्योंकि जो मैं चाहता हूँ वह नहीं किया करता, परन्तु जिस से मुझे घृणा आती है वही करता हूँ।' (वव.14ö15)।

एक मसीह बनने के ’पहले' और ’बाद में' के बीच यह अंतर नही हे कि पहले, आपने पाप किया और बाद में, आप पापरहित हैं। नहीं – अंतर यह है कि एक मसीह बनने से पहले, पाप चरित्र में था; यह वास्तव में आपको या मुझे चिंतित नहीं करता था। जबकि एक मसीह बनने के बाद, यह पूरी तरह से चरित्र के बाहर है; आप इसे करना नहीं चाहते हैं। जब आप यह करते हैं तो यह आपको दर्द और पछतावा देता है। इसलिए नहीं क्योंकि आपने अपने आपको नीचा कर दिया है -यद्यपी ऐसा है। लेकिन इसलिए क्योंकि आप मसीह को प्रसन्न करना चाहते हैं – और आपने उन्हें निराश किया है।

यदि आप मेरी तरह हैं, आप पाप के साथ इस लड़ाई को जानते हैं। कृपया समझिये कि यह सच्चे मसीह विश्वासी का एक मुख्य चिह्न है।

जैसे ही पौलुस सहायता के लिए पुकारते हैं, वह प्रश्न का उत्तर पहले से ही जानते हैं, 'मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा? हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो' (व.25)।

शायद से, इस लेखांश को समझने के लिए दो शब्द जरूरी हैं, 'मैं खुद' (व.25ब)। हम अपने आपसे पाप की व्यवस्था के दास हैं लेकिन यह कहानी का अंत नहीं है। पौलुस आगे उस महान स्वतंत्रता के विषय में बताते हैं जिसे पवित्र आत्मा हमारे जीवन में लाते हैं।

एक मसीह के रूप में, जैसे ही मै अपने आपको देखता हूँ कि मैं मसीह का हूँ, मैं समझता हूँ कि मैं पाप करने के लिए स्वतंत्र नही हूँ। जैसे ही मैं विश्व में अपने आपको एक मसीह के रूप में देखता हूँ, मैं समझता हूँ कि पाप से भी स्वतंत्र नहीं हूँ। लेकिन जैसे ही मैं अपने आपको आत्मा के द्वारा शशक्त मसीह के रूप में देखता हूँ, मैं समझता हूँ कि पाप पर जय पाने के लिए मैं स्वतंत्र हूँ। मुझे याद है कि जॉन न्यूटन ने क्या लिखा है:

 मैं वह नहीं जो मैं बनना चाहता हूँ।

 मैं वह नहीं जो मुझे होना चाहिए।

 मैं वह नहीं जो एक दिन मैं बन जाऊँगा।

 लेकिन परमेश्वर का धन्यवाद हो कि मैं वह नहीं हूँ जो मैं पहले था।

प्रार्थना

परमेश्वर, मैं सहायता के लिए आपको पुकारता हूँ। आज अपनी पवित्र आत्मा से मुझे भर दीजिए। मुझे सच में पवित्र आत्मा की सहायता की आवश्यकता है, वह जीवन जीने में जो आप चाहते हैं कि मैं जीऊं।

जूना करार

होशे 6:1-7:16

यहोवा की ओर लौट आने का प्रतिफल

6आओ, हम यहोवा के पास लौट आयें।
 उसने आघात दिये थे वही हमें चंगा करेगा।
  उसने हमें आघात दिये थे वही उन पर मरहम भी लगायेगा।
2 दो दिन के बाद वही हमें फिर जीवन की ओर लौटायेगा।
 तीसरे दिन वह ही हमें उठा कर खड़ा करेगा,
  हम उसके सामने फिर जी पायेंगे।
3 आओ, यहोवा के विषय में जानकारी करें।
 आओ, यहोवा को जानने का कठिन जतन करें।
  हमको इसका पता है कि वह आ रहा है
 वैसे ही जैसे हम को ज्ञान है कि प्रभात आ रहा है।
  यहोवा हमारे पास वैसे ही आयेगा जैसे कि
 बसंत कि वह वर्षा आती है जो धरती को सींचती है।

लोग सच्चे नहीं हैं

4 हे एप्रैम, तुम ही बताओ कि मैं (यहोवा) तुम्हारे साथ क्या करूँ?
 हे यहूदा, तुम्हारे साथ मुझे क्या करना चाहिये?
  तुम्हारी आस्था भोर की धुंध सी है।
 तुम्हारी आस्था उस ओस की बूँद सी है जो सुबह होते ही कही चली जाती है।
5 मैंने नबियों का प्रयोग किया
 और लोगों के लिये नियम बना दिये।
  मेरे आदेश पर लोगों का वध किया गया
 किन्तु इन निर्णयों से भली बाते ऊपजेंगी।
6 क्योंकि मुझे सच्चा प्रेम भाता है
 न कि मुझे बलियाँ भाती हैं,
  मुझे भाता है कि परमेश्वर का ज्ञान रखें,
 न कि वे यहाँ होमबलियाँ लाया करें।
7 किन्तु लोगों ने वाचा तोड़ दी थी जैसे उसे आदम ने तोड़ा था।
 अपने ही देश में उन्होंने मेरे संग विश्वासघात किया।
8 गिलाद उन लोगों की नगरी है, जो पाप किया करते हैं।
 वहाँ के लोग चालबाज हैं और वे औरों की हत्या करते हैं।
9 जैसे डाकू किसी की घात में छुपे रहते हैं कि उस पर हमला करें,
 वैसे ही शकेम की राह पर याजक घात में बैठे रहते हैं।
  जो लोग वहाँ से गुजरते हैं वे उन्हें मार डालते हैं।
 उन्होंने बुरे काम किये हैं।
10 इस्राएल की प्रजा में मैंने भयानक बात देखी है।
 एप्रैम परमेश्वर के हेतू सच्चा नहीं रहा था।
  इस्राएल पाप से दोषयुक्त हो गया है।

11 यहूदा, तेरे लिये भी एक कटनी का समय है।
 यह उस समय होगा, जब मैं अपने लोगों को बंधुआयी से लौटा कर लाऊँगा।

7“मैं इस्राएल को चंगा करूँगा!
 लोग एप्रैम के पाप जान जायेंगे,
  लोगों के सामने शोमरोन के झूठ उजागर होंगे।
 लोग उन चारों के बारे में जान जायेंगे जो नगर में आते जाते रहते हैं।
2 लोगों को विश्वास नहीं है कि मैं उनके अपराधों की याद करूँगा।
 वे सब ओर से अपने किये बुरे कामों से घिरे हैं।
 मुझको उनके वे बुरे कर्म साफ—साफ दिख रहे हैं।

3 वे अपने कुकर्मों से निज राजा को प्रसन्न रखते हैं।
 वे झूठे देवों की पूजा कर के अपने मुखियाओं को खुश करते हैं।
4 तंदूर पर पकाने वाला रोटी के लिये आटा गूँथता है।
 वह तंदूर में रोटी रखा करता है।
  किन्तु वह आग को तब तक नहीं दहकाता
 जब तक की रोटी फूल नहीं जाती है।
  किन्तु इस्राएल के लोग उस नान बाई से नहीं हैं।
 इस्राएल के लोग हर समय अपनी आग दहकाये रखते हैं।
5 हमारे राजा के दिन वे अपनी आग दहकाते हैं, अपनी दाखमधु की दावतें वे दिया करते हैं।
 मुखिया दाखमधु की गर्मी से दुखिया गये हैं।
 सो राजाओं ने उन लोगों के साथ हाथ मिलाया है जो परमेश्वर की हँसी करते हैं।
6 लोग षडयंत्र रचा करते हैं।
 उनके उत्तेजित मन भाड़ से धधकते हैं।
  उनकी उत्तेजनायें सारी रात धधका करती हैं,
 और सुबह होते होते वह जलती हुई आग सी तेज हो जाती हैं।
7 वे सारे लोग भभकते हुये भाड़ से हैं,
 उन्होंने अपने राजाओं को नष्ट किया था।
  उनके सब शासको का पतन हुआ था।
 उनमें से कोई भी मेरी शरण में नहीं आया था।”

इस्राएल अपने नाश से बेसुध

8 एप्रैम दूसरी जातियों के संग मिला जुला करता है।
 एप्रैम उस रोटी सा है जिसे दोनो ओर से वहीं सेका गया है।
9 एप्रैम का बल गैरों ने नष्ट किया है
 किन्तु एप्रैम को इसका पता नहीं है।
  सफेद बाल भी एप्रैम पर छिटका दिये गये हैं
 किन्तु एप्रैम को इसका पता नहीं है।
10 एप्रैम का अहंकार उसके विरोध में बोलता है।
 लोगों ने बहुतेरी यातनायें झेली हैं
  किन्तु वे अब भी अपने परमेश्वर यहोवा के पास नहीं लौटे हैं।
 लोग उसकी शरण में नहीं गये थे।

11 एप्रैम उस भोले कपोत सा बन गया है जिसके पास कुछ भी समझ नहीं होती है।
 लोगों ने मिस्र से सहायता मांगी
 और लोग अश्शूर की शरण में गये।
12 वे उन देशों की शरण में जाते हैं
 किन्तु मैं जाल में उनको फसाऊँगा,
  मैं अपना जाल उनके ऊपर फेंकूँगा।
 मैं उनको ऐसे नीचे खींच लूँगा जैसे गगन के पक्षी खेंच लिये जाते हैं।
 मैं उनको उनकी वाचाओं का दण्ड दूँगा।
13 यह उनके लिये बुरा होगा
 उन्होंने मुझको मेरी बात मानने से इनकार किया।
  इसलिये उनको मिटा दिया जायेगा।
 मैंने उन लोगों को बचाया था किन्तु वे मेरे विरोध में झूठ बोलते हैं।
14 वे कभी मन से मुझे नहीं पुकारते हैं।
 हाँ, बिस्तर में पड़े हुए वे पुकारा करते हैं।
  जब वे नया अन्न और नयी दाखमधु मांगते हैं तब पूजा के अंग के रूप में वे अपने अगों को स्वंय काटा करते हैं।
 किन्तु वे अपने हृदय में मुझ से दूर हुये हैं।
15 मैंने उन्हें सधाया था और उनकी भुजा बलशाली बनायी थी,
 किन्तु उन्हेंने मेरे विरोध में षड़यंत्र रचे।
16 वे झूठे देवों की ओर मुड़ गये।
 वे उस धुनष के समान बने जो झूठे लक्ष्य भेद करता है।
  उनके मुखियालोग अपनी ही शक्ति की शेखी बघारते थे,
 किन्तु उन्हें तलवार के घाट उतारा जायेगा।
  फिर लोग मिस्र में उन पर हँसेंगे।

समीक्षा

चंगाई के लिए सहायता

परमेश्वर हमारे जीवन में चंगाई को लाना चाहते हैं। लोग जानते थे कि यदि वे सच में परमेश्वर की ओर फिरेंगे, तो वह उन्हें चंगा करेंगे (6:1)।

यदि आप परमेश्वर की चंगाई चाहते हैं, तो आपको अपने हृदय से उन्हें पुकारना पड़ेगा। इस लेखांश में उनके लोगों के विरूद्ध परमेश्वर की शिकायत यह है कि, 'वे अपने हृदय से मुझे नहीं पुकारते हैं' (7:14ब)। ’वे मन से मेरी दोहाई नहीं देते, परंतु अपने बिछौने पर पड़े हुए हाय, हाय करते हैं' (व.14, एम.एस.जी.)।

अध्याय 6 के पहले तीन वचन उस दर्दभरी प्रक्रिया का वर्णन करते हैं जिससे परमेश्वर हमें अपने पास वापस लेते हैं, जब हम उनके दूर चले जाते हैं। किंतु, यहाँ पर पाप या गहरे पछतावे का कोई बोध नहीं है। हो सकता है कि शायद से होशे लोगों की धुँधी घोषणा को शब्दों में रख रहे हो:’तुम्हारा स्नेह तो भोर के मेघ मे समान, सबेरे उड़ जानेवाली ओस के समान है' (6:4, एम.एस.जी)।

यह बात स्पष्ट है कि परमेश्वर हृदय में दिलचस्पी लेते हैं, नाकि दिखावटी कामों में’मैं स्थिर प्रेम से प्रसन्न होता हूँ, और चाहता हूँ कि लोग परमेश्वर का ज्ञान रखें' (व.6, एम.एस.जी.)। वह उनके साथ ऐसे एक संबंध के विषय में चिंतित हैं जो हृदय से आती है।

उनकी शिकायत है कि ’उनमें से कोई भी मेरी दोहाई नहीं देते हैं' (7:7)। मानवजाति में एक अक्खड़, एक आत्मनिर्भर आत्मा है जो ’परमेश्वर के पास लौटने से मना करती है..उन्हें खोजने से इन्कार करती है' (व.10)। वह कहते हैं, 'मैं उन्हे छुड़ाना चाहता हूँ...... लेकिन वे मुझसे दूर जाते हैं' (वव.13-14)। आप उन सभी चीजों के लिए परमेश्वर से चंगाई और क्षमा को ग्रहण कर सकते हैं, जो आप गलत करते हैं – लेकिन आपको अपने हृदय से उन्हें पुकारने की आवश्यकता है (व.14)।

जैसा कि जॉयस मेयर लिखती हैं, भावनात्मक ’चंगाई आसानी से नहीं मिलती है और यह थोड़ी दर्दभरी हो सकती है। कभी कभी हमारे ऐसे घाव होते हैं जो अब भी ग्रसित हैं; और पूरी तरह से चंगा होने से पहले, उन घावों को अवश्य ही खोला जाना है और संक्रमण को निकाला जाना है। केवल परमेश्वर जानते हैं कि इसे अच्छी तरह से कैसे करना है। जैसे ही आप अपनी चोट से चंगाई के लिए परमेश्वर को खोजने का प्रयास करते हैं, तो परमेश्वर के वचन में उनके साथ समय बिताईये और उनकी उपस्थिति में इंतजार कीजिए। मैं गारंटी देता हूँ कि आपको वहाँ पर चंगाई मिलेगी!'

प्रार्थना

परमेश्वर, मैं ना केवल आपको जानना चाहता हूँ लेकिन आपको बेहतर जानने के लिए भी कोशिश करना चाहता हूँ (6:3)। चंगाई, सुधार और पुनर्जीवन के लिए मैं अपने हृदय से आपको पुकारता हूँ। परमेश्वर मेरी सहायता कीजिए!

पिप्पा भी कहते है

होशे 6:6

’क्योंकि मैं दया चाहता हूँ, नाकि बलिदान।'

शब्दावली कहती है कि दया है ’शत्रुओं या ठोकर खिलाने वालों के प्रति करुणा दिखाना।' शेक्सपीयर ने दया के विषय में कहाः’यह दो बार आशीष देती हैः यह देने वाले को और लेने वाले को, दोनों को आशीष देती है।' हमारे विश्व को और ज्यादा दया की आवश्यकता है।

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संदर्भ

जॉयस मेयर, द इव्रीडे लाईफ बाईबल, (फेथवर्ड्स, 2014), पी.1370

जहाँ पर कुछ बताया न गया हो, उन वचनों को पवित्र बाइबल, न्यू इंटरनैशनल संस्करण एन्ग्लिसाइड से लिया गया है, कॉपीराइट © 1979, 1984, 2011 बिबलिका, पहले इंटरनैशनल बाइबल सोसाइटी, हूडर और स्टोगन पब्लिशर की अनुमति से प्रयोग किया गया, एक हॅचेट यूके कंपनी सभी अधिकार सुरक्षित। ‘एनआईवी’, बिबलिका यू के का पंजीकृत ट्रेडमार्क संख्या 1448790 है।

जिन वचनों को (एएमपी, AMP) से चिन्हित किया गया है उन्हें एम्प्लीफाइड® बाइबल से लिया गया है. कॉपीराइट © 1954, 1958, 1962, 1964, 1965, 1987 लॉकमैन फाउंडेशन द्वारा प्राप्त अनुमति से उपयोग किया गया है। (www.Lockman.org)

जिन वचनों को (एमएसजी MSG) से चिन्हित किया गया है उन्हें मैसेज से लिया गया है। कॉपीराइट © 1993, 1994, 1995, 1996, 2000, 2001, 2002. जिनका प्रयोग एनएवीप्रेस पब्लिशिंग ग्रुप की अनुमति से किया गया है।

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