क्या परमेश्वर हमारी सभी प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं?
परिचय
मुझे क्रिकेट पसंद है। कम से कम मैं उसे देखना पसंद करता हूँ: मैं इसे खेलने में बिल्कुल अच्छा नहीं था। लेकिन मैं जानता हूँ कि बहुत से लोगों को क्रिकेट पसंद नहीं है और यहाँ तक कि वे उनके नियमों को भी नहीं समझते (विशेष रुप से , यदि वे ऐसे देश में आए हों जहाँ क्रिकेट लोकप्रिय खेल ना हो)। उम्मीद है कि आप मुझे क्रिकेट की उपमा देने के लिए क्षमा करेंगे।
जब दो बल्लेबाज़ क्रिकेट पिच पर विकेटो के बीच दौड़ते हैं, तो उन्हे एक दूसरे के साथ संयोजन करके निर्णय लेना होता है कि वे दौड़ें या नहीं। एक चिल्लाते हुए दूसरे से कहता है ‘हाँ’ (इसका मतलब, ‘दौड़ो’) या ‘नहीं’ (इसका मतलब, ‘जहाँ हैं वहीं रुकें’), या ‘इंतज़ार करें’ (इसका मतलब है, ‘हम देखते हैं कि दौड़ने का निर्णय लेने से पहले क्या होता है’)।
एक तरह से परमेश्वर हमारी सभी प्रार्थनाओं को सुनते हैं, वे हमारी सभी प्रार्थनाओं का उत्तर भी देते हैं। लेकिन हम हमेशा वो नहीं प्राप्त करते हैं जो हम माँगते हैं। जब हम परमेश्वर से कुछ माँगते हैं, तो उनका उत्तर ‘हाँ’ या ‘नहीं’ या ‘इंतज़ार करें’ के रूप में होता है।
जॉन स्टॉट लिखते हैं कि यदि हमने उनसे कुछ ऐसा माँगा है जो ‘अपने आप में अच्छा नहीं है, या हमारे लिए या दूसरों के लिए अच्छा नहीं है, तो परमेश्वर ‘नहीं’ के रूप में उत्तर देंगे, स्पष्ट रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से; तुरंत या अंत में।
हमें हमेशा ‘नहीं’ उत्तर का कारण पता नहीं चलता। हमें यह याद रखना चाहिये कि परमेश्वर चीज़ों को अनंत के दृष्टिकोण से देखते हैं और कुछ चीज़ें ऐसी हैं, जिन्हें हम अपने इस जीवन में कभी समझ नहीं पाएंगे।
इस पद में हम आज परमेश्वर के तीनों प्रकार के उत्तरों का उदाहरण देखेंगे।
भजन संहिता 17:13-15
13 हे यहोवा, उठ! शत्रु के पास जा,
और उन्हें अस्त्र शस्त्र डालने को विवश कर।
निज तलवार उठा और इन दुष्ट जनों से मेरी रक्षा कर।
14 हे यहोवा, जो व्यक्ति सजीव हैं उनकी धरती से दुष्टों को अपनी शक्ति से दूर कर।
हे यहोवा, बहुतेरे तेरे पास शरण माँगने आते हैं। तू उनको बहुतायत से भोजन दे।
उनकी संतानों को परिपूर्ण कर दे। उनके पास निज बच्चों को देने के लिये बहुतायत से धन हो।
15 मेरी विनय न्याय के लिये है। सो मैं यहोवा के मुख का दर्शन करुँगा।
हे यहोवा, तेरा दर्शन करते ही, मैं पूरी तरह सन्तुष्ट हो जाऊँगा।
समीक्षा
परमेश्वर कहते हैं, ‘हाँ’
वह पहला कौन सा कार्य है, जिसे आप सवेरे उठने के बाद करते हैं? दाऊद ने हमारे लिए उदाहरण दिया है: मेरे लिए तो…………मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूँ जब मैं उठकर आपके रुप को पकड़े रहूँ और आपके साथ मधुर सहभागिता करूँ। उसने प्रतिदिन परमेश्वर की खोज करना आरंभ किया और उसमें संतुष्टि को ढूँढ़ने लगा।
यह प्रार्थना करने के विषय का हृदय है। यह केवल चीजों को माँगने के बारे में नहीं हैं, यह परमेश्वर के मुख को निहारने और उनके साथ मधुर सहभागिता का आनंद लेना है।
दाऊद की विनती का यह अर्थ था कि वह अपने शत्रुओं के मुख से सहायता के लिए वह परमेश्वर की दोहाई दे रहा था (पद - 13-4)। परमेश्वर ने सुना और उसकी प्रार्थना का सकारात्मक उत्तर दिया, ‘हाँ’।
प्रार्थना
प्रभु, मैं धन्यवाद करता हूँ कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह संसार देता है, जिसकी तुलना ‘आपके मुख’ को देखकर मिलने वाली संतुष्टी से कर सकूँ (पद - 15अ)। जब मैं प्रति दिन उठता हूँ, तो मैं आपके स्वरूप को देखकर संतुष्ट हो जाता हूँ (पद - 15ब)।
मत्ती 20:20-34
एक माँ का अपने बच्चों के लिए आग्रह
20 फिर जब्दी के बेटों की माँ अपने बेटों समेत यीशु के पास पहुँची और उसने झुक कर प्रार्थना करते हुए उससे कुछ माँगा।
21 यीशु ने उससे पूछा, “तू क्या चाहती है?”
वह बोली, “मुझे वचन दे कि मेरे ये दोनों बेटे तेरे राज्य में एक तेरे दाहिनी ओर और दूसरा तेरे बाई ओर बैठे।”
22 यीशु ने उत्तर दिया, “तुम नहीं जानते कि तुम क्या माँग रहे हो। क्या तुम यातनाओं का वह प्याला पी सकते हो, जिसे मैं पीने वाला हूँ?”
उन्होंने उससे कहा, “हाँ, हम पी सकते हैं!”
23 यीशु उनसे बोला, “निश्चय ही तुम वह प्याला पीयोगे। किन्तु मेरे दाएँ और बायें बैठने का अधिकार देने वाला मैं नहीं हूँ। यहाँ बैठने का अधिकार तो उनका है, जिनके लिए यह मेरे पिता द्वारा सुरक्षित किया जा चुका है।”
24 जब बाकी दस शिष्यों ने यह सुना तो वे उन दोनों भाईयों पर बहुत बिगड़े। 25 तब यीशु ने उन्हें अपने पास बुलाकर कहा, “तुम जानते हो कि गैर यहूदी राजा, लोगों पर अपनी शक्ति दिखाना चाहते हैं और उनके महत्वपूर्ण नेता, लोगों पर अपना अधिकार जताना चाहते हैं। 26 किन्तु तुम्हारे बीच ऐसा नहीं होना चाहिये। बल्कि तुम में जो बड़ा बनना चाहे, तुम्हारा सेवक बने। 27 और तुम में से जो कोई पहला बनना चाहे, उसे तुम्हारा दास बनना होगा। 28 तुम्हें मनुष्य के पुत्र जैसा ही होना चाहिये जो सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने और बहुतों के छुटकारे के लिये अपने प्राणों की फिरौती देने आया है।”
अंधों को आँखें
29 जब वे यरीहो नगर से जा रहे थे एक बड़ी भीड़ यीशु को पीछे हो ली। 30 वहाँ सड़क किनारे दो अंधे बैठे थे। जब उन्होंने सुना कि यीशु वहाँ से जा रहा है, वे चिल्लाये, “प्रभु, दाऊद के पुत्र, हम पर दया कर!”
31 इस पर भीड़ ने उन्हें धमकाते हुए चुप रहने को कहा पर वे और अधिक चिल्लाये, “प्रभु! दाऊद के पुत्र हम पर दया कर!”
32 फिर यीशु रुका और उनसे बोला, “तुम क्या चाहते हो, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?”
33 उन्होंने उससे कहा, “प्रभु, हम चाहते हैं कि हम देख सकें।”
34 यीशु को उन पर दया आयी। उसने उनकी आँखों को छुआ, और तुरंत ही वे फिर देखने लगे। वे उसके पीछे हो लिए।
समीक्षा
परमेश्वर एक विनती के लिए ‘न’ कहते हैं, दूसरी विनती के लिए 'हाँ' कहते हैं
रिक वारेन लिखते हैं, ‘यदि विनती गलत है, तो परमेश्वर कहते हैं, ‘नहीं’। यदि समय गलत है, तो परमेश्वर कहते हैं, ‘धीरे’। यदि आप गलत हैं, तो परमेश्वर कहते हैं ‘बढ़ो’। लेकिन यदि विनती सही है और समय भी सही है और आप भी सही हैं, तो परमेश्वर कहते हैं, “आगे बढ़ो”।
इस पद्यांश में हम दो विनती को देखते हैं। पहला ‘नहीं’ का उत्तर स्वीकार करता है (पद - 20-28) और दूसरा ‘हाँ’ का उत्तर (पद - 29-34)।
- दो विनतियाँ
दोनों ही परिस्थितियों में, यीशु ने पूछा है, ‘तुम क्या चाहते हो?’ उन्होंने जब्दी के पुत्रों की माँ से कहा, तू क्या चाहती है? (पद - 21) उन्होंने दो अंधे व्यक्तियों से कहा, ‘तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए करूँ? (पद - 32)
एक तरह से यह स्पष्ट था कि उन्हें क्या चाहिए (दूसरे उदाहरण में वे लोग अंधे थे, इसलिए वे देखना चाहते थे), लेकिन परमेश्वर चाहते हैं कि हम सक्रीय रूप से शामिल हों। प्रेरित याकूब कहते हैं कि, ‘तुम माँगते नहीं और तुम्हें मिलता नहीं’ (याकूब 4:2)। यीशु कहते हैं, ‘माँगो तो तुम्हें दिया जाएगा... क्योंकि जो कोई माँगता है उसे मिलता है’ (मत्ती 7:7-8)। इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है, कि उत्तर दी गई प्रार्थना के आरंभिक मुद्दे का सार वास्तव में माँगना है।
- दो उत्तर
अंधे व्यक्ति की विनती के विषय में यीशु का उत्तर ‘हाँ’ था। ‘यीशु को उन पर दया आई और उन्होंने उनकी आँखों को छुआ। अचानक उन्होंने दृष्टि पाई और उसके पीछे चलने लगे’ (पद - 34)।
दूसरी ओर यीशु जब्दी के पुत्रों की माँ से प्रभाव में कहते हैं ‘नहीं’। यह प्रतिक्रिया दया से उपजी है। उसकी विनती उनके पुत्रों के लिए महिमा, सामर्थ और समृद्धि के लिए थी।
यीशु ने कहा, ‘जो कटोरा मैं पीने पर हूँ, क्या तुम पी सकते हो? (पद - 22) पुराने नियम के भविष्यवक्ताओं ने कुछ पद्यांशों में ‘परमेश्वर के क्रोध के कटोरे’ के विषय में लिखा है। (उदाहरण के लिए, यशायाह 51:17-29)
आश्चर्य की बात यह है कि, यीशु यह कटोरा स्वयं पीने के विषय में कहते हैं। ‘वे बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण देनेवाले थे (मत्ती 20:28)। ‘के लिए’ का ग्रीक शब्द है ‘ऐंटी’, जिसका अर्थ है ‘बदले में’। यह नये नियम का स्पष्ट उदाहरण है जिसे यीशु अपनी मृत्यु के प्रतिस्थापन के रूप में समझाते हैं।
- दो कारण
प्रेरित याकूब लिखते हैं कि, ‘तुम माँगते हो और मिलता नहीं, क्योंकि तुम बुरी इच्छा से माँगते हो’ (याकूब 4:3)। यहाँ निवेदन के पीछे एक अलग प्रयोजन है। दोनों निवेदन को प्रभुत्व के साथ करना है। अंधे व्यक्ति का निवेदन यह पहचानने से है कि यीशु ही प्रभु है और अच्छा पाने की इच्छा से आता है (मत्ती 20:30-33)। दूसरी ओर यीशु संकेत करते हैं कि माँ का निवेदन दूसरों पर प्रभु बनने से आया है (पद - 25)।
यीशु संकेत करते हैं कि सच्ची महानता दूसरों पर प्रभु बनने से या संसार जिसे सफलता कहता है, उससे नहीं आती (संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा या ‘सफल’ सेवकाई होना)। बल्कि यीशु के आदर्शों का अनुकरण करने से आती है, ‘सेवा करें ना कि सेवा कराएँ’ (पद - 26-28)। यह वह उदाहरण है जहाँ चेले गलत थे और परमेश्वर ने कहा - ‘बढ़ो’।
मैं सोचता हूँ कि मैंने अपने जीवन में उस समय बहुत सीखा जब मुझे मेरी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं मिला, बजाए इसके कि जब मेरी प्रार्थनाओं का उत्तर ‘हाँ’ में मिला। निश्चित रूप से, चेलों ने बड़ी मात्रा में ‘प्रार्थना का उत्तर’ न मिलने से सीखा है।
प्रार्थना
प्रभु, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि हमने ‘प्रार्थनाओं का उत्तर न मिलने’ से पाठ सीखा है। धन्यवाद करता हूँ कि आपने हमें सच्ची महानता बताई हैं। हमारी सहायता कीजिए कि हम अपना जीवन आपकी सेवा के लिए और दूसरों की सेवा के लिए समर्पित करें।
अय्यूब 15:1-18:21
15इस पर तेमान नगर के निवासी एलीपज ने अय्यूब को उत्तर देते हुए कहा:
2 “अय्यूब, य़दि तू सचमुच बुद्धिमान होता तो रोते शब्दों से तू उत्तर न देता।
क्या तू सोचता है कि कोई विवेकी पुरुष पूर्व की लू की तरह उत्तर देता है?
3 क्या तू सोचता है कि कोई बुद्धिमान पुरुष व्यर्थ के शब्दों से
और उन भाषणों से तर्क करेगा जिनका कोई लाभ नहीं?
4 अय्यूब, यदि तू मनमानी करता है
तो कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की न तो आदर करेगा, न ही उससे प्रार्थना करेगा।
5 तू जिन बातों को कहता है वह तेरा पाप साफ साफ दिखाती हैं।
अय्यूब, तू चतुराई भरे शब्दों का प्रयोग करके अपने पाप को छिपाने का प्रयत्न कर रहा है।
6 तू उचित नहीं यह प्रमाणित करने की मुझे आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि तू स्वयं अपने मुख से जो बातें कहता है,
वह दिखाती हैं कि तू बुरा है और तेरे ओंठ स्वयं तेरे विरुद्ध बोलते हैं।
7 “अय्यूब, क्या तू सोचता है कि जन्म लेने वाला पहला व्यक्ति तू ही है?
और पहाड़ों की रचना से भी पहले तेरा जन्म हुआ।
8 क्या तूने परमेश्वर की रहस्यपूर्ण योजनाऐं सुनी थी
क्या तू सोचा करता है कि एक मात्र तू ही बुद्धिमान है?
9 अय्यूब, तू हम से अधिक कुछ नहीं जानता है।
वे सभी बातें हम समझते हैं, जिनकी तुझको समझ है।
10 वे लोग जिनके बाल सफेद हैं और वृद्ध पुरुष हैं वे हमसे सहमत रहते हैं।
हाँ, तेरे पिता से भी वृद्ध लोग हमारे पक्ष में हैं।
11 परमेश्वर तुझको सुख देने का प्रयत्न करता है,
किन्तु यह तेरे लिये पर्याप्त नहीं है।
परमेश्वर का सुसन्देश बड़ी नम्रता के साथ हमने तुझे सुनाया।
12 अय्यूब, क्यों तेरा हृदय तुझे खींच ले जाता है?
तू क्रोध में क्यों हम पर आँखें तरेरता है?
13 जब तू इन क्रोध भरे वचनों को कहता है,
तो तू परमेश्वर के विरुद्ध होता है।
14 “सचमुच कोई मनुष्य पवित्र नहीं हो सकता।
मनुष्य स्त्री से पैदा हुआ है, और धरती पर रहता है, अत: वह उचित नहीं हो सकता।
15 यहाँ तक कि परमेश्वर अपने दूतों तक का विश्वास नहीं करता है।
यहाँ तक कि स्वर्ग जहाँ स्वर्गदूत रहते हैं पवित्र नहीं है।
16 मनुष्य तो और अधिक पापी है।
वह मनुष्य मलिन और घिनौना है
वह बुराई को जल की तरह गटकता है।
17 “अय्यूब, मेरी बात तू सुन और मैं उसकी व्याख्या तुझसे करूँगा।
मैं तुझे बताऊँगा, जो मैं जानता हूँ।
18 मैं तुझको वे बातें बताऊँगा,
जिन्हें विवेकी पुरुषों ने मुझ को बताया है
और विवेकी पुरुषों को उनके पूर्वजों ने बताई थी।
उन विवेकी पुरुषों ने कुछ भी मुझसे नहीं छिपाया।
19 केवल उनके पूर्वजों को ही देश दिया गया था।
उनके देश में कोई परदेशी नहीं था।
20 दुष्ट जन जीवन भर पीड़ा झेलेगा और क्रूर जन
उन सभी वर्षों में जो उसके लिये निश्चित किये गये है, दु:ख उठाता रहेगा।
21 उसके कानों में भयंकर ध्वनियाँ होगी।
जब वह सोचेगा कि वह सुरक्षित है तभी उसके शत्रु उस पर हमला करेंगे।
22 दुष्ट जन बहुत अधिक निराश रहता है और उसके लिये कोई आशा नहीं है, कि वह अंधकार से बच निकल पाये।
कहीं एक ऐसी तलवार है जो उसको मार डालने की प्रतिज्ञा कर रही है।
23 वह इधर—उधर भटकता हुआ फिरता है किन्तु उसकी देह गिद्धों का भोजन बनेगी।
उसको यह पता है कि उसकी मृत्य़ु बहुत निकट है।
24 चिंता और यातनाऐं उसे डरपोक बनाती है और ये बातें उस पर ऐसे वार करती है,
जैसे कोई राजा उसके नष्ट कर डालने को तत्पर हो।
25 क्यो? क्योंकि दुष्ट जन परमेश्वर की आज्ञा मानने से इन्कार करता है, वह परमेश्वर को घूसा दिखाता है।
और सर्वशक्तिमान परमेश्वर को पराजित करने का प्रयास करता है।
26 वह दुष्ट जन बहुत हठी है।
वह परमेश्वर पर एक मोटी मजबूत ढाल से वार करना चाहता है।
27 दुष्ट जन के मुख पर चर्बी चढ़ी रहती है।
उसकी कमर माँस भर जाने से मोटी हो जाती है।
28 किन्तु वह उजड़े हुये नगरों में रहेगा।
वह ऐसे घरों में रहेगा जहाँ कोई नहीं रहता है।
जो घर कमजोर हैं और जो शीघ्र ही खण्डहर बन जायेंगे।
29 दुष्ट जन अधिक समय तक
धनी नहीं रहेगा
उसकी सम्पत्तियाँ नहीं बढ़ती रहेंगी।
30 दुष्ट जन अन्धेरे से नहीं बच पायेगा।
वह उस वृक्ष सा होगा जिसकी शाखाऐं आग से झुलस गई हैं।
परमेश्वर की फूँक दुष्टों को उड़ा देगी।
31 दुष्ट जन व्यर्थ वस्तुओं के भरोसे रह कर अपने को मूर्ख न बनाये
क्योंकि उसे कुछ नहीं प्राप्त होगा।
32 दुष्ट जन अपनी आयु के पूरा होने से पहले ही बूढ़ा हो जायेगा और सूख जायेगा।
वह एक सूखी हुई डाली सा हो जायेगा जो फिर कभी भी हरी नहीं होगी।
33 दुष्ट जन उस अंगूर की बेल सा होता है जिस के फल पकने से पहले ही झड़ जाते हैं।
ऐसा व्यक्ति जैतून के पेड़ सा होता है, जिसके फूल झड़ जाते हैं।
34 क्यों? क्योंकि परमेश्वर विहीन लोग खाली हाथ रहेंगे।
ऐसे लोग जिनको पैसों से प्यार है, घूस लेते हैं। उनके घर आग से नष्ट हो जायेंगे।
35 वे पीड़ा का कुचक्र रचते हैं और बुरे काम करते हैं।
वे लोगों को छलने के ढंगों की योजना बनाते हैं।”
16इस पर अय्यूब ने उत्तर देते हुए कहा:
2 “मैंने पहले ही ये बातें सुनी हैं।
तुम तीनों मुझे दु:ख देते हो, चैन नहीं।
3 तुम्हारी व्यर्थ की लम्बी बातें कभी समाप्त नहीं होती।
तुम क्यों तर्क करते ही रहते हो?
4 जैसे तुम कहते हो वैसी बातें तो मैं भी कर सकता हूँ,
यदि तुम्हें मेरे दु:ख झेलने पड़ते।
तुम्हारे विरोध में बुद्धिमत्ता की बातें मैं भी बना सकता हूँ
और अपना सिर तुम पर नचा सकता हूँ।
5 किन्तु मैं अपने वचनों से तुम्हारा साहस बढ़ा सकता हूँ और तुम्हारे लिये आशा बन्धा सकता हूँ?
6 “किन्तु जो कुछ मैं कहता हूँ उससे मेरा दु:ख दूर नहीं हो सकता।
किन्तु यदि मैं कुछ भी न कहूँ तो भी मुझे चैन नहीं पड़ता।
7 सचमुच हे परमेश्वर तूने मेरी शक्ति को हर लिया है।
तूने मेरे सारे घराने को नष्ट कर दिया है।
8 तूने मुझे बांध दिया और हर कोई मुझे देख सकता है। मेरी देह दुर्बल है,
मैं भयानक दिखता हूँ और लोग ऐसा सोचते हैं जिस का तात्पर्य है कि मैं अपराधी हूँ।
9 “परमेश्वर मुझ पर प्रहार करता है।
वह मुझ पर कुपित है और वह मेरी देह को फाड़ कर अलग कर देता है,
तथा परमेश्वर मेरे ऊपर दाँत पीसता है।
मुझे शत्रु घृणा भरी दृष्टि से घूरते हैं।
10 लोग मेरी हँसी करते हैं।
वे सभी भीड़ बना कर मुझे घेरने को और मेरे मुँह पर थप्पड़ मारने को सहमत हैं।
11 परमेश्वर ने मुझे दुष्ट लोगों के हाथ में अर्पित कर दिया है।
उसने मुझे पापी लोगों के द्वारा दु:ख दिया है।
12 मेरे साथ सब कुछ भला चंगा था
किन्तु तभी परमेश्वर ने मुझे कुचल दिया। हाँ,
उसने मुझे पकड़ लिया गर्दन से
और मेरे चिथड़े चिथड़े कर डाले।
परमेश्वर ने मुझको निशाना बना लिया।
13 परमेश्वर के तीरंदाज मेरे चारों तरफ है।
वह मेरे गुर्दों को बाणों से बेधता है।
वह दया नहीं दिखाता है।
वह मेरे पित्त को धरती पर बिखेरता है।
14 परमेश्वर मुझ पर बार बार वार करता है।
वह मुझ पर ऐसे झपटता है जैसे कोई सैनिक युद्ध में झपटता है।
15 “मैं बहुत ही दु:खी हूँ
इसलिये मैं टाट के वस्त्र पहनता हूँ।
यहाँ मिट्टी और राख में मैं बैठा रहता हूँ
और सोचा करता हूँ कि मैं पराजित हूँ।
16 मेरा मुख रोते—बिलखते लाल हुआ।
मेरी आँखों के नीचे काले घेरे हैं।
17 मैंने किसी के साथ कभी भी क्रूरता नहीं की।
किन्तु ये बुरी बातें मेरे साथ घटित हुई।
मेरी प्रार्थनाऐं सही और सच्चे हैं।
18 “हे पृथ्वी, तू कभी उन अत्याचारों को मत छिपाना जो मेरे साथ किये गये हैं।
मेरी न्याय की विनती को तू कभी रूकने मत देना।
19 अब तक भी सम्भव है कि वहाँ आकाश में कोई तो मेरे पक्ष में हो।
कोई ऊपर है जो मुझे दोषरहित सिद्ध करेगा।
20 मेरे मित्र मेरे विरोधी हो गये हैं
किन्तु परमेश्वर के लिये मेरी आँखें आँसू बहाती हैं।
21 मुझे कोई ऐसा व्यक्ति चाहिये जो परमेश्वर से मेरा मुकदमा लड़े।
एक ऐसा व्यक्ति जो ऐसे तर्क करे जैसे निज मित्र के लिये करता हो।
22 “कुछ ही वर्ष बाद मैं वहाँ चला जाऊँगा
जहाँ से फिर मैं कभी वापस न आऊँगा (मृत्यु)।
17“मेरा मन टूट चुका है।
मेरा मन निराश है।
मेरा प्राण लगभग जा चुका है।
कब्र मेरी बाट जोह रही है।
2 लोग मुझे घेरते हैं और मुझ पर हँसते हैं।
जब लोग मुझे सताते हैं और मेरा अपमान करते है, मैं उन्हें देखता हूँ।
3 “परमेश्वर, मेरे निरपराध होने का शपथ—पत्र मेरा स्वीकार कर।
मेरी निर्दोषता की साक्षी देने के लिये कोई तैयार नहीं होगा।
4 मेरे मित्रों का मन तूने मूँदा अत:
वे मुझे कुछ नहीं समझते हैं।
कृपा कर उन को मत जीतने दे।
5 लोगों की कहावत को तू जानता है।
मनुष्य जो ईनाम पाने को मित्र के विषय में गलत सूचना देते हैं,
उनके बच्चे अन्धे हो जाया करते हैं।
6 परमेश्वर ने मेरा नाम हर किसी के लिये अपशब्द बनाया है
और लोग मेरे मुँह पर थूका करते हैं।
7 मेरी आँख लगभग अन्धी हो चुकी है क्योंकि मैं बहुत दु:खी और बहुत पीड़ा में हूँ।
मेरी देह एक छाया की भाँति दुर्बल हो चुकी है।
8 मेरी इस दुर्दशा से सज्जन बहुत व्याकुल हैं।
निरपराधी लोग भी उन लोगों से परेशान हैं जिनको परमेश्वर की चिन्ता नहीं है।
9 किन्तु सज्जन नेकी का जीवन जीते रहेंगे।
निरपराधी लोग शक्तिशाली हो जायेंगे।
10 “किन्तु तुम सभी आओ और फिर मुझ को दिखाने का यत्न करो कि सब दोष मेरा है।
तुममें से कोई भी विवेकी नहीं।
11 मेरा जीवन यूँ ही बात रहा है।
मेरी याजनाऐं टूट गई है और आशा चली गई है।
12 किन्तु मेरे मित्र रात को दिन सोचा करते हैं।
जब अन्धेरा होता है, वे लोग कहा करते हैं, ‘प्रकाश पास ही है।’
13 “यदि मैं आशा करूँ कि अन्धकारपूर्ण कब्र
मेरा घर और बिस्तर होगा।
14 यदि मैं कब्र से कहूँ ‘तू मेरा पिता है’
और कीड़े से ‘तू मेरी माता है अथवा तू मेरी बहन है।’
15 किन्तु यदि वह मेरी एकमात्र आशा है तब तो कोई आशा मुझे नहीं हैं
और कोई भी व्यक्ति मेरे लिये कोई आशा नहीं देख सकता है।
16 क्या मेरी आशा भी मेरे साथ मृत्यु के द्वार तक जायेगी?
क्या मैं और मेरी आशा एक साथ धूल में मिलेंगे?”
अय्यूब को बिल्दद का उत्तर
18फिर शूही प्रदेश के बिल्दद ने उत्तर देते हूए कहा:
2 “अय्यूब, इस तरह की बातें करना तू कब छोड़ेगा
तुझे चुप होना चाहिये और फिर सुनना चाहिये।
तब हम बातें कर सकते हैं।
3 तू क्यों यह सोचता हैं कि हम उतने मूर्ख हैं जितनी मूर्ख गायें।
4 अय्यूब, तू अपने क्रोध से अपनी ही हानि कर रहा है।
क्या लोग धरती बस तेरे लिये छोड़ दे? क्या तू यह सोचता है कि
बस तुझे तृप्त करने को परमेश्वर धरती को हिला देगा?
5 “हाँ, बुरे जन का प्रकाश बुझेगा
और उसकी आग जलना छोड़ेगी।
6 उस के तम्बू का प्रकाश काला पड़ जायेगा
और जो दीपक उसके पास है वह बुझ जायेगा।
7 उस मनुष्य के कदम फिर कभी मजबूत और तेज नहीं होंगे।
किन्तु वह धीरे चलेगा और दुर्बल हो जायेगा।
अपने ही कुचक्रों से उसका पतन होगा।
8 उसके अपने ही कदम उसे एक जाल के फन्दे में गिरा देंगे।
वह चल कर जाल में जायेगा और फंस जायेगा।
9 कोई जाल उसकी एड़ी को पकड़ लेगा।
एक जाल उसको कसकर जकड़ लेगा।
10 एक रस्सा उसके लिये धरती में छिपा होगा।
कोई जाल राह में उसकी प्रतीक्षा में है।
11 उसके तरफ आतंक उसकी टोह में हैं।
उसके हर कदम का भय पीछा करता रहेगा।
12 भयानक विपत्तियाँ उसके लिये भूखी हैं।
जब वह गिरेगा, विनाश और विध्वंस उसके लिये तत्पर रहेंगे।
13 महाव्याधि उसके चर्म के भागों को निगल जायेगी।
वह उसकी बाहों और उसकी टाँगों को सड़ा देगी।
14 अपने घर की सुरक्षा से दुर्जन को दूर किया जायेगा
और आतंक के राजा से मिलाने के लिये उसको चलाकर ले जाया जायेगा।
15 उसके घर में कुछ भी न बचेगा
क्योंकि उसके समूचे घर में धधकती हुई गन्धक बिखेरी जायेगी।
16 नीचे गई जड़ें उसकी सूख जायेंगी
और उसके ऊपर की शाखाएं मुरझा जायेंगी।
17 धरती के लोग उसको याद नहीं करेंगे।
बस अब कोई भी उसको याद नहीं करेगा।
18 प्रकाश से उसको हटा दिया जायेगा और वह अंधकार में धकेला जायेगा।
वे उसको दुनियां से दूर भाग देंगे।
19 उसकी कोई सन्तान नहीं होगी अथवा उसके लोगों के कोई वंशज नहीं होंगे।
उसके घर में कोई भी जीवित नहीं बचेगा।
20 पश्चिम के लोग सहमें रह जायेंगे जब वे सुनेंगे कि उस दुर्जन के साथ क्या घटी।
लोग पूर्व के आतंकित हो सुन्न रह जायेंगे।
21 सचमुच दुर्जन के घर के साथ ऐसा ही घटेगा।
ऐसी ही घटेगा उस व्यक्ति के साथ जो परमेश्वर की परवाह नहीं करते।”
समीक्षा
परमेश्वर कहते हैं ‘इंतज़ार करो’
जिन समस्याओं का आप सामना कर रहे हैं, उनके लिए यीशु इसी वक्त प्रार्थना कर रहे हैं, क्या आप जानते हैं?
कमज़ोर अय्यूब अपने मित्रों के उत्तेजना से भरे हुए भाषण को सहन कर रहे थे, जो उन पर दोष लगाए जा रहे थे, और अनुचित ढंग से आरोप लगा रहे थे। अय्यूब उनका वर्णन ‘दु:खी दिलासा देनेवाले’ के रूप में करते हैं (16:2)। उनके ‘लंबे चौड़े भाषण’ (पद - 3अ) अय्यूब के लिए किसी भी तरह से मददगार नहीं थे (पद - 4)।
कुछ लोग अनुचित रूप से विश्वास करते हैं कि अपने जीवन में हमारा संघर्ष हमारे पाप के कारण है, या पुराने जीवन के पाप के कारण है। उसी तरह यदि लोग गरीबी में या अनुवांशिक दोष के साथ जन्मे हैं, तो यह उसकी गलती होनी चाहिए। यह दोष भयानक रूप से व्यर्थ है (बाइबल में पुनर्जन्म के विचार का खंडन किया गया है, इब्रानियों 9:27 देखें)। इसी प्रकार अय्यूब के मित्रों ने उसके विषय में कहा।
जब हमारे मित्र संघर्ष कर रहे हों, तो हमें ‘दु:खी दिलासा’ देने से दूर रहना चाहिये (पद - 2)। बल्कि, जैसा अय्यूब ने सुझाव दिया कि हम उन्हें प्रोत्साहित करें, ‘दिलासा दें’, और उन्हें मज़बूत करें और उनके संघर्षों में उन्हें शांति दें (पद - 5 एम.एस.जी और एन.आय.वी)।
एक काम हम हमेशा कर सकते हैं, उनके लिए सिफारिश करते हुए अय्यूब ने कहा:
‘मेरे रक्षक मेरे मित्र हैं, जैसे मेरी आँखों के आँसू परमेश्वर के सामने उमड़ने लगते हैं; मनुष्य की ओर से वह परमेश्वर के साथ बात करते हैं
जैसे एक मित्र अपने मित्र के समर्थन में बोलता है’ (पद - 20-21)।
हमें बताया नहीं गया कि मध्यस्थ कौन था, लेकिन चाहें यह कोई भी हो, वह अय्यूब का सच्चा मित्र था क्योंकि वह अय्यूब के लिए परमेश्वर से विनती कर रहा था।
मध्यस्थी की प्रार्थना का उत्तर शायद तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन अंतत: उत्तर दिखाई दिया जब परमेश्वर ने अय्यूब का भविष्य फिर से पहले जैसा कर दिया था। अय्यूब को और अय्यूब के मध्यस्थ को उनका उत्तर था 'इंतजार करो'’. बाद में अय्यूब ने दूसरों के लिए मध्यस्थी की थी जिससे उसकी स्थिति तुरंत बदल गई (42:8-10)।
अय्यूब का मध्यस्थ कौन है? अय्यूब कहते हैं, ‘अब भी स्वर्ग में मेरा साक्षी है और मेरा वकील ऊपर है’ (16:19)। नए नियम में हम देखते हैं, यीशु ही है ‘जो परमेश्वर के सम्मुख मनुष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं' (16:21 एम.एस.जी.)। और जो पिता के पास हमारे वकील हैं’ (1 युहन्ना 2:1, आर.एस.वी.) वह आपके लिए मध्यस्थी कर रहे हैं (इब्रानियों 7:24-25)।
यीशु, अय्यूब के वकील हैं। वे अय्यूब के लिए मध्यस्थी कर रहे थे। यीशु परमेश्वर से विनती कर रहे हैं, जैसे एक मित्र अपने मित्र के लिए करता है’ (अय्यूब 16:21)। हम यहाँ पर अय्यूब और पतरस के अनुभवों में समानता देखते हैं। यीशु ने शमौन पतरस से कहा, ‘शमौन, शमौन, देख शैतान ने तुम लोगों को मांग लिया है कि तुम्हें गेहूँ की नाई फटके। परंतु मैंने तेरे लिए बिनती की, कि तेरा विश्वास जाता न रहे’ (लूका 22:31-32)।
जैसा कि जॉन विम्बर कहा करते थे, ‘खुश खबरी यह है कि यीशु हमारे लिए प्रार्थना कर रहे हैं। बुरी खबर यह है कि हमें इसकी ज़रूरत पड़ेगी’।
प्रार्थना
प्रभु, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आप हमारे वकील होने की प्रतिज्ञा करते हैं। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि, जब अय्यूब या पतरस की तरह शैतान गेहूँ की तरह मुझे फटकना चाहता है, उस समय आप मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं। मैं धन्यवाद करता हूँ कि हम यह जानते हैं, भले ही ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमें इंतज़ार करने की ज़रूरत है, स्वर्ग के हमारे वकील की प्रार्थना का उत्तर अंत में 'हाँ' ही है’।
पिप्पा भी कहते है
जब्दी के बेटों की माँ ज़ोर दे रही थी. हम अपने बच्चों के लिए ज़रूरत से ज़रूरत अभिलाषी हो सकते हैं। अपने बच्चों के लिए सही तरह की अभिलाषा और गलत तरह की अभिलाषा होती है। यीशु कहते हैं, 'तुम नहीं जानते कि तुम क्या मांगते हों' (मत्ती 20:22)। हमें अपने बच्चों के लिए परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करना ज़रूरी है ना कि खुद की विषय सूची के अनुसार।

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संदर्भ
नोट्स:
बिल हाइबेल्स, टू बिजी नोट टू प्रे. (इंटरवार्सिटी प्रेस, 2008).
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