दिन 21

परमेश्वर के साथ ईमानदार रहें

बुद्धि भजन संहिता 12:1-8
नए करार मत्ती 14:22-15:9
जूना करार उत्पत्ति 41:41-42:38

परिचय

सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध टी.ई.डी बातचीत कार्यक्रम में, लाइस्पॉटिंग की लेखक पामेला मेयर, ने दावा किया है कि किसी भी दिन में हम 10 से 200 बार झूठ बोलते हैं!

‘चेक डाक में है’।

‘कल सुबह सबसे पहले आपके बॉयलर की मरम्मत करने के लिए कोई न कोई पहुँच जाएगा।’

‘मैं ठीक हूँ!’

कभी-कभी ये खाली शब्द होते हैं। दिल होंठों का साथ नहीं देता। हमें धोखा दिया गया है। हम उम्मीद करते हैं कि लोग हम से सच कहें।

हम आज के अपने पद्यांशों में देखते हैं कि परमेश्वर झूठ और कपट से नफरत करते हैं दाऊद कहते हैं, ‘उन में से प्रत्येक अपने पड़ोसी से झूठी बातें कहता है; वे चापलूसी के होठों से दो रंगी बातें करते हैं। (पद - 12:2)। यीशु ने यशायाह का वर्णन किया, ‘ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है’ (पद - 15:8)। हमने देखा कि यूसुफ के भाइयों ने अपने पिता से यूसुफ के भविष्य के बारे में कैसे झूठ बोला (उत्पत्ति 37:31-35)। मगर, आज हम यह भी देखते हैं कि वे अपने दिल में जानते थे कि वे परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकते, ‘इसी कारण हम अब भी इस संकट में पड़े हैं’ (पद - 42:21)।

परमेश्वर चाहते हैं कि आप उनके साथ ईमानदार रहें। उन्हें खरापन पसंद है। वह सुनना चाहते हैं कि आज आपके मन में क्या है।

बुद्धि

भजन संहिता 12:1-8

शौमिनिथ की संगत पर संगीत निर्देशक के लिये दाऊद का एक पद।

12हे यहोवा, मेरी रक्षा कर!
 खरे जन सभी चले गये हैं।
 मनुष्यों की धरती में अब कोई भी सच्चा भक्त नहीं बचा है।
2 लोग अपने ही साथियों से झूठ बोलते हैं।
 हर कोई अपने पड़ोसियों को झूठ बोलकर चापलूसी किया करता है।
3 यहोवा उन ओंठों को सी दे जो झूठ बोलते हैं।
 हे यहोवा, उन जीभों को काट जो अपने ही विषय में डींग हाँकते हैं।
4 ऐसे जन सोचते है, “हमारी झूठें हमें बड़ा व्यक्ति बनायेंगी।
 कोई भी व्यक्ति हमारी जीभ के कारण हमें जीत नहीं पायेगा।”

5 किन्तु यहोवा कहता है:
 “बुरे मनुष्यों ने दीन दुर्बलों से वस्तुएँ चुरा ली हैं।
 उन्होंने असहाय दीन जन से उनकी वस्तुएँ ले लीं।
 किन्तु अब मैं उन हारे थके लोगों की रक्षा खड़ा होकर करुँगा।”

6 यहोवा के वचन सत्य हैं और इतने शुद्ध
 जैसे आग में पिघलाई हुई श्वेत चाँदी।
 वे वचन उस चाँदी की तरह शुद्ध हैं, जिसे पिघला पिघला कर सात बार शुद्ध बनाया गया है।
7 हे यहोवा, असहाय जन की सुधि ले।
 उनकी रक्षा अब और सदा सर्वदा कर!
8 ये दुर्जन अकड़े और बने ठने घूमते हैं।
 किन्तु वे ऐसे होते हैं जैसे कोई नकली आभूषण धारण करता है
 जो देखने में मूल्यवान लगते हैं, किन्तु वास्तव में बहुत ही सस्ते होते हैं।

समीक्षा

परमेश्वर से मदद मांगिये

दाऊद के दिल की यह पुकार है, ‘हे प्रभु, मेरी मदद कर’ (पद - 1)। वह अपने दिनों में समाज की अवस्था पर शोक मनाता है – एक ऐसा समाज जो हमारे आज के समाज से अलग था। वह झूठ, छल, घमंड, लालच और स्वार्थीपन का उल्लेख करता है। वह परमेश्वर से याचना करता है।

  लोग अपने ‘होठों’ से ऐसी बातें करते हैं जो उनके ‘मन’ को नहीं दर्शातीं:

  ‘सभी लोग झूठ बोलते हैं;

  वे चापलूसी के होठों से दो रंगी बातें करते हैं’ (पद - 2)।

परमेश्वर उन लोगों से प्रभावित नहीं होते जो बोलने में चालाक हैं। मदद के लिए दाऊद की आरंभिक पुकार के उत्तर में परमेश्वर उससे कमज़ोरों और ज़रूरत मंद लोगों की मदद करने का वायदा करते हैं: ‘अब मैं उठूंगा, जिस पर वे फुंकारते हैं उसे मैं चैन और विश्राम दूंगा’ (पद - 5)।

फिर दाऊद परमेश्वर की विश्वसनीयता की तुलना अपने आस - पास के लोगों के झूठ और खोखलेपन से करता है: ‘परमेश्वर का वचन पवित्र है, उस चाँदी के समान जो भट्टी में मिट्टी पर ताई गई, और सात बार निर्मल की गई हो’ (पद - 6)। यह उसे विश्वास दिलाता है कि उसके चारों तरफ छल और कपट के बावजूद भी परमेश्वर उन्हें बचाएंगे और उनकी रक्षा करेंगे। ' तू ही हे परमेश्वर उनकी रक्षा करेगा, उन को इस काल के लोगों से सर्वदा के लिये बचाए रखेगा ' (पद - 7)।

‘हे प्रभु, मदद कर’ दिन के आरंभ में यह एक उत्तम प्रार्थना है जब आप परमेश्वर से कहते हैं कि आप जिन बातों में शामिल हैं उसमें वह आपका मार्गदर्शन करें।

प्रार्थना

प्रभु, मेरी मदद कर…. (यह परमेश्वर को उन सारी बातों में लाता है जिसमें आज आप शामिल होंगे।)

नए करार

मत्ती 14:22-15:9

यीशु का झील पर चलना

22 इसके तुरंत बाद यीशु ने अपने शिष्यों को नाव पर चढ़ाया और जब तक वह भीड़ को विदा करे, उनसे गलील की झील के पार अपने से पहले ही जाने को कहा। 23 भीड़ को विदा करके वह अकेले में प्रार्थना करने को पहाड़ पर चला गया। साँझ होने पर वह वहाँ अकेला था। 24 तब तक नाव किनारे से मीलों दूर जा चुकी थी और लहरों में थपेड़े खाती डगमगा रही थी। सामने की हवा चल रही थी।

25 सुबह कोई तीन और छः बजे के बीच यीशु झील पर चलता हुआ उनके पास आया। 26 उसके शिष्यों ने जब उसे झील पर चलते हुए देखा तो वह घबराये हुए आपस में कहने लगे “यह तो कोई भूत है!” वे डर के मारे चीख उठे।

27 यीशु ने तत्काल उनसे बात करते हुए कहा, “हिम्मत रखो! यह मैं हूँ! अब और मत डरो।”

28 पतरस ने उत्तर देते हुए उससे कहा, “प्रभु, यदि यह तू है, तो मुझे पानी पर चलकर अपने पास आने को कह।”

29 यीशु ने कहा, “चला आ।”

पतरस नाव से निकल कर पानी पर यीशु की तरफ चल पड़ा। 30 उसने जब तेज हवा देखी तो वह घबराया। वह डूबने लगा और चिल्लाया, “प्रभु, मेरी रक्षा कर।”

31 यीशु ने तत्काल उसके पास पहुँच कर उसे सँभाल लिया और उससे बोला, “ओ अल्पविश्वासी, तूने संदेह क्यों किया?”

32 और वे नाव पर चढ़ आये। हवा थम गयी। 33 नाव पर के लोगों ने यीशु की उपासना की और कहा, “तू सचमुच परमेश्वर का पुत्र है।”

यीशु का अनेक रोगियों को चंगा करना

34 सो झील पार करके वे गन्नेसरत के तट पर उतर गये। 35 जब वहाँ रहने वालों ने यीशु को पहचाना तो उन्होंने उसके आने का समाचार आसपास सब कहीं भिजवा दिया। जिससे लोग-जो रोगी थे, उन सब को वहाँ ले आये 36 और उससे प्रार्थना करने लगे कि वह उन्हें अपने वस्त्र का बस किनारा ही छू लेने दे। और जिन्होंने छू लिया, वे सब पूरी तरह चंगे हो गये।

मनुष्य के बनाये नियमों से परमेश्वर का विधान बड़ा है

15फिर कुछ फ़रीसी और यहूदी धर्मशास्त्री यरूशलेम से यीशु के पास आये और उससे पूछा, 2 “तेरे अनुयायी हमारे पुरखों के रीति-रिवाजों का पालन क्यों नहीं करते? वे खाना खाने से पहले अपने हाथ क्यों नहीं धोते?”

3 यीशु ने उत्तर दिया, “अपने रीति-रिवाजों के कारण तुम परमेश्वर के विधि को क्यों तोड़ते हो? 4 क्योंकि परमेश्वर ने तो कहा था ‘तू अपने माता-पिता का आदर कर’ और ‘जो कोई अपने पिता या माता का अपमान करता है, उसे अवश्य मार दिया जाना चाहिये।’ 5 किन्तु तुम कहते हो जो कोई अपने पिता या अपनी माता से कहे, ‘क्योंकि मैं अपना सब कुछ परमेश्वर को अर्पित कर चुका हूँ, इसलिये तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता।’ 6 इस तरह उसे अपने माता पिता का आदर करने की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार तुम अपने रीति-रिवाजों के कारण परमेशवर के आदेश को नकारते हो। 7 ओ ढोंगियों, तुम्हारे बारे में यशायाह ने ठीक ही भविष्यवाणी की थी। उसने कहा था:

 8 ‘यह लोग केवल होठों से मेरा आदर करते हैं;
 पर इनका मन मुझ से सदा दूर रहता है।
 9 मेरे लिए उनकी उपासना व्यर्थ है,
 क्योंकि उनकी शिक्षा केवल लोगों द्वारा बनाए हुए सिद्धान्त हैं।’”

समीक्षा

तूफान में परमेश्वर से बात करते रहें

यीशु को प्रार्थना करने के लिए दूर, एकांत में जाना अच्छा लगता था – ‘वह प्रार्थना करने के लिए अलग पहाड़ पर चढ़ गया; ’(14:23)। जब आप परमेश्वर के साथ अकेले होते हैं, तो आप उनसे ईमानदारी से और अपने दिल की गहराई से बात कर सकते हैं।

परमेश्वर के साथ यीशु की घनिष्ठता के कारण वह पानी पर चल सके। उन्होंने पतरस को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया। लेकिन जब पतरस ने आँधी को देखा, तो वह घबरा गया। मैं जानता हूँ उसे कैसा लगा होगा। कभी - कभी, जब चीज़ें गलत हो जाती हैं, तो हम अपना ध्यान यीशु पर से हटा लेते हैं। जब मैं अपनी आस - पास की स्थिति पर ध्यान केन्द्रित करता हूँ, तो मैं ‘डूबने’ लगता हूँ। इन सब के बीच, पतरस ने घबराकर प्रार्थना की: ‘हे प्रभु, मुझे बचा’ (पद - 30)।

हालाँकि यह घबराहट में की गई प्रार्थना है, पर यह दिल की पुकार भी है। ‘यीशु ने तुरन्त हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया, ’ (पद - 31)। जब मैं घबराहट में की गई प्रार्थना को फिर से देखता हूँ, जो मैंने की थी, तो उनमें से किसी प्रार्थना का उत्तर देखकर आश्चर्य होता है।

जब यीशु और पतरस नाव में फिर से चढ़े, तो आँधी थम गई और ‘जब वे नाव पर चढ़ गए, तो हवा थम गई। इस पर जो नाव पर थे, उन्होंने उसे \[यीशु को\] दण्डवत करके कहा; “सचमुच तू परमेश्वर का पुत्र है,” ’ (पद - 33)।

इस घटना के अंत में सभी शिष्यों ने दिल से आराधना की। यह असाधारण है। अद्वैतवादी यहूदी, जो आज्ञाओं को जानते थे कि उन्हें केवल परमेश्वर की आराधना करनी है, उन्होंने यीशु की आराधना की। वे जान गए कि यीशु ही ‘परमेश्वर के पुत्र हैं।’

वास्तव में, जब यीशु पानी पर चल रहे थे तो शिष्यों के लिए उनके पहले शब्द यह थे, ‘ढाढ़स बान्धो; मैं हूं; डरो मत’ (पद - 27)। ‘मैं हूँ, यह पुराने नियम में परमेश्वर का नाम है’ (निर्गमन 3:14)। यीशु शिष्यों को और हमें कह रहे हैं कि वही महान ‘मैं हूँ’ परमेश्वर हैं, इसलिए डरने की ज़रूरत नहीं है। आज आप चाहें किसी भी परिस्थिति में हैं, यह सबसे बड़ा आश्वासन है कि सब कुछ यीशु के नियंत्रण में है।

शायद आपको इस बात से शांति नहीं मिल रही होगी कि यीशु आपके जीवन में क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं, लेकिन आपको इस बात से अवश्य शांति मिलेगी कि उनका नियंत्रण कायम है।

वे बीमारों को यीशु के पास लाए और उनसे चंगाई के लिए विनती की। ‘वे उस से बिनती करने लगे, कि वह उन्हें अपने वस्त्र के आंचल ही को छूने दे: और जितनों ने उसे छूआ, वे चंगे हो गए’ (मत्ती 14:36)।

अगले भाग में (15:1-9) यीशु ने फरीसियों को बताया कि वास्तव में ‘उनके दिलों’ में क्या चल रहा है (पद - 8)। यह उनके शिष्यों द्वारा चली आ रही प्रथा को तोड़ने से शुरू होता है। लेकिन यीशु स्थिति ही बदल देते हैं।

वचन स्पष्ट रूप से कहता है कि हमें अपने परिवार की देखभाल करने को ज़्यादा प्राथमिकता देनी चाहिये – खासकर अपने माता-पिता की। फरीसियों ने गलत कारण बताया था कि वे क्यों अपने माता - पिता की देखभाल नहीं करते, वे कहते थे कि उनके माता - पिता को उनसे जो कुछ लाभ पहुंच सकता था, वह परमेश्वर को भेंट चढ़ाई जा चुकी है (पद - 5)।

यीशु उन पर कपटी होने का दोष लगाते हैं। ‘कपटी’ शब्द का अर्थ है ‘जो नाटक में मुखौटा लगाता है’। वे होठों से तो परमेश्वर का आदर करते थे, लेकिन वास्तव में, ‘उन का मन मुझ से दूर रहता है’ (पद - 8)। परमेश्वर आपके होठों के बजाय आपके दिल को ज़्यादा महत्त्व देते हैं।

प्रार्थना

प्रभु, आज मैं आपकी आराधना परमेश्वर के पुत्र के रूप में करता हूँ। धन्यवाद कि मुझे डरने की ज़रूरत नहीं है – जब चीज़ें गलत हो रही हों, तब मैं आपसे बात कर सकता हूँ और आप मेरी प्रार्थनाओं को सुनेंगे।

जूना करार

उत्पत्ति 41:41-42:38

41 एक विशेष समारोह और प्रदर्शन था जिसमें फ़िरौन ने यूसुफ को प्रशासक बनाया तब फ़िरौन ने यूसुफ से कहा, “मैं अब तुम्हें मिस्र के पूरे देश का प्रशासक बनाता हूँ।” 42 तब फिरौन ने अपनी राज्य की मुहर वाली अगूँठी यूसुफ को दी और यूसुफ को एक सुन्दर रेशमी वस्त्र पहनने को दिया। फ़िरौन ने यूसुफ के गले में एक सोने का हार डाला। 43 फ़िरौन ने दूसरे श्रेणी के राजकीय रथ पर यूसुफ को सवार होने को कहा। उसके रथ के आगे विशेष रक्षक चलते थे। वे लोगों से कहते थे, “हे लोगो, यूसुफ को झुककर प्रणाम करो। इस तरह यूसुफ पूरे मिस्र का प्रशासक बना।”

44 फ़िरौन ने उससे कहा, “मैं सम्राट फ़िरौन हूँ। इसलिए मैं जो करना चाहूँगा, करूँगा। किन्तु मिस्र में कोई अन्य व्यक्ति हाथ पैर नहीं हिला सकता है जब तक तुम उसे न कहो।” 45 फ़िरौन ने उसे दूसरा नाम सापन तपानेह दिया। फ़िरौन ने आसनत नाम की एक स्त्री, जो ओन के याजक पोतीपेरा की पुत्री थी, यूसुफ को पत्नी के रूप में दी। इस प्रकार यूसुफ पूरे मिस्र देश का प्रशासक हो गया।

46 यूसुफ उस समय तीस वर्ष का था जब वह मिस्र के सम्राट की सेवा करने लगा। यूसुफ ने पूरे मिस्र देश में यात्राएँ कीं। 47 अच्छे सात वर्षों में देश में पैदावार बहुत अच्छी हुई 48 और यूसुफ ने मिस्र में सात वर्ष खाने की चीजें बचायीं। यूसुफ ने भोजन नगरों में जमा किया। यूसुफ ने नगर के चारों ओर के खेतों के उपजे अन्न को हर नगर में जमा किया। 49 यूसुफ ने बहुत अन्न इकट्ठा किया। यह समुद्र के बालू के सदृश था। उसने इतना अन्न इकट्ठा किया कि उसके वजन को भी न आँका जा सके।

50 यूसुफ की पत्नी आसनत ओन के याजक पोतीपरा कि पुत्री थी। भूखमरी के पहले वर्ष के आने के पूर्व यूसुफ और आसनेत के दो पुत्र हुए। 51 पहले पुत्र का नाम मनश्शे रखा गया। यूसुफ ने उसका यह नाम रखा क्योंकि उसने बताया, “मुझे जितने सारे कष्ट हुए तथा घर की हर बात परमेश्वर ने मुझसे भुला दी।” 52 यूसुफ ने दूसरे पुत्र का नाम एप्रैम रखा। यूसुफ ने उसका नाम यह रखा क्योंकि उसने बताया, “मुझे बहुत दुःख मिला, लेकिन परमेश्वर ने मुझे फुलाया—फलाया।”

भूखमरी का समय आरम्भ होता है

53 सात वर्ष तक लोगों के पास खाने के लिए यह सब भोजन था जिसकी उन्हें आवश्यकता थी और जो चीजें उन्हें आवश्यक थीं वे सभी उगती थीं। 54 किन्तु सात वर्ष वाद भूखमरी के दिन शुरु हुए। यह ठीक वैसा ही हुआ जैसा यूसुफ ने कहा था। सारी भूमि में चारों ओर अन्न पैदा न हुआ। लोगों के पास खाने को कुछ न था। किन्तु मिस्र में लोगों के खाने के लिए काफी था, क्योंकि यूसुफ ने अन्न जमा कर रखा था। 55 भूखमरी का समय शुरु हुआ और लोग भोजन के लिए फ़िरौन के सामने रोने लगे। फ़िरौन ने मिस्री लोगों से कहा, “यूसुफ से पूछो। वही करो जो वह करने को कहता है।”

56 इसलिए जब देश में सर्वत्र भूखमरी थी, यूसुफ ने अनाज के गोदामों से लोगों को अन्न दिया। यूसुफ ने जमा अन्न को मिस्र के लोगों को बेचा। मिस्र में बहुत भयंकर अकाल था। 57 मिस्र के चारों ओर के देशों के लोग अनाज खरीदने मिस्र आए। वे यूसुफ के पास आए क्योंकि वहाँ संसार के उस भाग में सर्वत्र भूखमरी थी।

स्वप्न सच हुआ

42इस समय याकूब के प्रदेश में भूखमरी थी। किन्तु याकूब को यह पता लगा कि मिस्र में अन्न है। इसलिए याकूब ने अपने पुत्रों से कहा, “हम लोग यहाँ हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे है? 2 मैंने सुना है कि मिस्र में खरीदने के लिए अन्न है। इसलिए हम लोग वहाँ चलें और वहाँ से अपने खाने के लिए अन्न खरीदें, तब हम लोग जीवित रहेंगे, मरेंगे नहीं।”

3 इसलिए यूसुफ के भाईयों में से दस अन्य खरीदने मिस्र गए। 4 याकूब ने बिन्यामीन को नहीं भेजा। (बिन्यामीन यूसुफ का एकमात्र सगा भाई था)

5 कनान में भूखमरी का समय बहुत भयंकर था। इसलिए कनान के बहुत से लोग अन्न खरीदने मिस्र गए। उन्हीं लोगों में इस्राएल के पुत्र भी थे।

6 इस समय यूसुफ मिस्र का प्रशासक था। केवल यूसुफ ही था जो मिस्र आने वाले लोगों को अन्न बेचने का आदेश देता था। यूसुफ के भाई उसके पास आए और उन्होंने उसे झुककर प्रणाम किया। 7 यूसुफ ने अपने भाईयों को देखा और उसने उन्हें पहचान लिया कि वे कौन हैं। किन्तु यूसुफ उनसे इस तरह बात करता रहा जैसे वह उन्हें पहचानता ही नहीं। उसने उनके साथ क्रूरता से बात की। उसने कहा, “तुम लोग कहाँ से आए हो?”

भाईयों ने उत्तर दिया, “हम कनान देश से आए हैं। हम लोग अन्न खरीदने आए हैं।”

8 यूसुफ जानता था कि वे लोग उसके भाई हैं। किन्तु वे नहीं जानते थे कि वह कौन हैं? 9 यूसुफ ने उन सपनों को याद किया जिन्हें उसने अपने भाईयों के बारे में देखा था।

यूसुफ ने अपने भाईयों से कहा, “तुम लोग अन्न खरीदने नहीं आए हो। तुम लोग जासूस हो। तुम लोग यह पता लगाने आए हो कि हम कहाँ कमजोर हैं?”

10 किन्तु भाईयों ने उससे कहा, “नहीं महोदय! हम तो आपके सेवक के रूप में आए हैं। हम लोग केवल अन्न खरीदने आए हैं। 11 हम सभी लोग भाई हैं, हम लोगों का एक ही पिता है। हम लोग ईमानदार हैं। हम लोग केवल अन्न खरीदने आए है।”

12 तब यूसुफ ने उनसे कहा, “नहीं, तुम लोग यह पता लगाने आए हो कि हम कहाँ कमजोर हैं?”

13 भाईयों ने कहा, “नहीं हम सभी भाई हैं। हमारे परिवार में बारह भाई हैं। हम सबका एक ही पिता हैं। हम लोगों का सबसे छोटा भाई अभी भी हमारे पिता के साथ घर पर है और दूसरा भाई बहुत समय पहले मर गया। हम लोग आपके सामने सेवक की तरह हैं। हम लोग कनान देश के हैं।”

14 किन्तु यूसुफ ने कहा, “नहीं मुझे पता है कि मैं ठीक हूँ। तुम भेदिये हो। 15 किन्तु मैं तुम लोगों को यह प्रमाणित करने का अवसर दूँगा कि तुम लोग सच कह रहे हो। तुम लोग यह जगह तब तक नहीं छोड़ सकते जब तक तुम लोगों का छोटा भाई यहाँ नहीं आता। 16 इसलिए तुम लोगों में से एक लौटे और अपने छोटे भाई को यहाँ लाए। उस समय तक अन्य यहाँ कारागार में रहेंगे। हम देखेंगे कि क्या तुम लोग सच बोल रहे हो। किन्तु मुझे विश्वास है कि तुम लोग जासूस हो।” 17 तब यूसुफ ने उन सभी को तीन दिन के लिए कारागार में डाल दिया।

शिमोन बन्धक के रूप में रखा गया

18 तीन दिन बाद यूसुफ ने उनसे कहा, “मैं परमेश्वर का भय मानता हूँ। इसलिए मैं तुम लोगों को यह प्रमाणित करने का एक अवसर दूँगा कि तुम लोग सच बोल रहे हो। तुम लोग यह काम करो और मैं तुम लोगों को जीवित रहने दूँगा। 19 अगर तुम लोग ईमानदार व्यक्ति हो तो अपने भाईयों में से एक को कारागार में रहने दो। अन्य जा सकते हैं और अपने लोगों के लिए अन्न ले जा सकते हैं। 20 तब अपने सबसे छोटे भाई को लेकर यहाँ मेरे पास आओ। इस प्रकार मैं विश्वास करूँगा कि तुम लोग सच बोल रहे हो।”

भाईयों ने इस बात को मान लिया। 21 उन्होंने आपस में बात की, “हम लोग दण्डित किए गए हैं। क्योंकि हम लोगों ने अपने छोटे भाई के साथ बुरा किया है। हम लोगों ने उसके कष्टों को देखा जिसमें वह था। उसने अपनी रक्षा के लिए हम लोगों से प्रार्थना की। किन्तु हम लोगों ने उसकी एक न सुनी। इसलिए हम लोग दुःखों में हैं।”

22 तब रूबेन ने उनसे कहा, “मैंने तुमसे कहा था कि उस लड़के का कुछ भी बुरा न करो। लेकिन तुम लोगों ने मेरी एक न सुनी। इसलिए अब हम उसकी मृत्यु के लिए दण्डित हो रहे हैं।”

23 यूसुफ अपने भाईयों से बात करने के लिए एक दुभाषिये से काम ले रहा था। इसलिए भाई नहीं जानते थे कि यूसुफ उनकी भाषा जानता है। किन्तु वे जो कुछ कहते थे उसे यूसुफ सुनता और समझता था। 24 उनकी बातों से यूसुफ बहुत दुःखी हुआ। इसलिए यूसुफ उनसे अलग हट गया और रो पड़ा। थोड़ी देर में यूसुफ उनके पास लौटा। उसने भाईयों में से शिमोन को पकड़ा और उसे बाँधा जब कि अन्य भाई देखते रहे।

25 यूसुफ ने कुछ सेवकों को उनकी बोरियों को अन्न से भरने को कहा। भाईयों ने इस अन्न का मूल्य यूसुफ को दिया। किन्तु यूसुफ ने उस धन को अपने पास नहीं रखा। उसने उस धन को उनकी अनाज की बोरियों में रख दिया। तब यूसुफ ने उन्हें वे चीज़ें दीं, जिनकी आवश्यकता उन्हें घर तक लौटने की यात्रा में हो सकती थी। 26 इसलिए भाईयों ने अन्न को अपने गधों पर लादा और वहाँ से चल पड़े। 27 वे सभी भाई रात को ठहरे और भाईयों में से एक ने कुछ अन्न के लिए अपनी बोरी खोली और उसने अपना धन अपनी बोरी में पाया। 28 उसने अन्य भाईयों से कहा, “देखो, जो मूल्य मैंने अन्न के लिए चुकाया, वह यहाँ है। किसी ने मेरी बोरी में ये धन लौटा दिया है। वे सभी भाई बहुत अधिक भयभीत हो गए। उन्होंने आपस में बातें की, परमेश्वर हम लोगों के साथ क्या कर रहा है?”

भाईयों ने याकूब को सूचित किया

29 वे भाई कनान देश में अपने पिता याकूब के पास गए। उन्होंने जो कुछ हुआ था अपने पिता को बताया। 30 उन्होंने कहा, “उस देश का प्रशासक हम लोगों से बहुत रूखाई से बोला। उसने सोचा कि हम लोग उस सेना की ओर से भेजे गए हैं जो वहाँ के लोगों को नष्ट करना चाहती है। 31 लेकिन हम लोगों ने कहा कि, हम लोग ईमानदार हैं। हम लोग किसी सेना में से नहीं हैं। 32 हम लोगों ने उसे बताया कि, ‘हम लोग बारह भाई हैं। हम लोगों ने अपने पिता के बारे में बताया और यह कहा कि हम लोगों का सबसे छोटा भाई अब भी कनान देश में है।’”

33 “तब देश के प्रशासक ने हम लोगों से यह कहा, ‘यह प्रमाणित करने के लिए कि तुम ईमानदार हो यह रास्ता है: अपने भाईयों में से एक को हमारे पास यहाँ छोड़ दो। अपना अन्न लेकर अपने परिवारों के पास लौट जाओ। 34 अपने सबसे छोटे भाई को हमारे पास लाओ। तब मैं समझूँगा कि तुम लोग ईमानदार हो अथवा तुम लोग हम लोगों को नष्ट करने वाली सेना की ओर से नहीं भेजे गए हो। यदि तुम लोग सच बोल रहे हो तो मैं तुम्हारे भाई को तुम्हें दे दूँगा।’”

35 तब सब भाई अपनी बोरियों से अन्न लेने गए और हर एक भाई ने अपने धन की थैली अपने अन्न की बोरी में पाई। भाईयों और उनके पिता ने धन को देखा और वे बहुत डर गए।

36 याकूब ने उनसे कहा, “क्या तुम लोग चाहते हो कि मैं अपने सभी पुत्रों से हाथ धो बैठूँ। यूसुफ तो चला ही गया। शिमोन भी गया और तुम लोग बिन्यामीन को भी मुझसे दूर ले जाना चाहते हो।”

37 तब रूबेन ने अपने पिता से कहा, “पिताजी आप मेरे दो पुत्रों को मार देना यदि मैं बिन्यामीन को आपके पास न लौटाऊँ मुझ पर विश्वास करें मैं आप के पास बिन्यामीन को लौटा लाऊँगा।”

38 किन्तु याकूब ने कहा, “मैं बिन्यामीन को तुम लोगों के साथ नहीं जाने दूँगा। उसका भाई मर चुका है। और मेरी पत्नी राहेल का वही अकेला पुत्र बचा है। मिस्र तक की यात्रा में यदि उसके साथ कुछ हुआ तो वह घटना मुझे मार डालेगी। तुम लोग मुझ वृद्ध को कब्र में बहुत दुःखी करके भेजोगे।”

समीक्षा

अपने दिल की गहराई से परमेश्वर से कहें

यूसुफ का अंत अच्छा हुआ - परंतु शुरुवात बुरी थी। वह एक ‘गढ्ढे’ में (37:24), और ‘कैद’ में था (39:20), लेकिन अंत में वह एक ‘राज - महल’ में पहुँचा (45:16)।

बाइबल में अन्य लोगों की तरह (यीशु, यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला, यहेजकेल, और याजक और मंदिर में सेवा करने वाले लैवीय – गिनतियों 4 देखें) यूसुफ ने अपने जीवन में 38 की उम्र से काम करना शुरू किया (41:46)। उस समय तक यूसुफ प्रशिक्षण में था। अब उसे पूरे ‘मिस्र देश का अधिकारी बनाया गया है’ (पद - 41)।

इन सब परेशानियों के बीच परमेश्वर ने यूसुफ के दिल को देखा। सत्रह और तीस साल के बीच तेरह सालों तक यूसुफ को आश्चर्य हो रहा होगा कि परमेश्वर उसके साथ क्या कर रहे हैं। उसे बहुत तिरस्कार, परेशानी, अन्याय, कैद, निराशा और अन्य परीक्षाओं का सामना करना पड़ा। लेकिन इन सबके द्वारा परमेश्वर उसे ‘पूरे मिस्र का अधिकारी’ बनने के लिए तैयार कर रहे थे (पद - 41)।

परमेश्वर जानते थे कि उस पर भरोसा किया जा सकता है क्योंकि उसका दिल सही था। यह ज़्यादा मायने रखता है – इसलिए नहीं कि आप संघर्ष के दौर में हैं या आशीष के दौर में हैं, लेकिन क्या आप प्रभु के करीब रहकर उनके साथ अपने दिल से बात कर रहे हैं ?

यूसुफ ने अपने दो बच्चों का नाम मनश्शे (‘परमेश्वर ने मेरा सारा क्लेश भुला दिया है ’, पद - 51) और एप्रैम (‘परमेश्वर ने फुलाया - फलाया है’, पद - 52)। ‘मनश्शे’ और ‘एप्रैम’ इन दोनों नामों में सामानता यह है कि ‘परमेश्वर ने मुझे बनाया है’। कष्ट (मनश्शे) और सफलता (एप्रैम) दोनों समयों में यूसुफ मानता है कि परमेश्वर का संपूर्ण नियंत्रण है।

क्लेश के समय में अपने दिल को कड़वा न होने दें, ना ही सफलता के समय में घमंडी। जान लीजिये कि परमेश्वर आपके जीवन और आपकी स्थिति से भी श्रेष्ठ हैं।

यूसुफ की तुलना में, उसके भाइयों को अपने कपट और दुष्टता में जीना पड़ा (42:21 से आगे)। ‘क्योंकि जब उसने हम से गिड़गिड़ा के विनती की, तौभी हम ने यह देखकर, कि उसका जीवन कैसे संकट में पड़ा है, उसकी न सुनी; इसी कारण हम अब भी इस संकट में पड़े हैं’ (पद - 21)। ' तब उनके जी में जी न रहा ' (पद - 28), लेकिन तब उन्होंने अपने होठों से कहा, ‘हम सीधे लोग हैं’ (पद - 31)।

इन सबके बीच यूसुफ का सपना पूरा हो रहा था। उस पर जो कुछ गुज़रा था इसके बावजूद, वह परमेश्वर पर भरोसा करता रहा और उनके प्रति विश्वासयोग्य बना रहा। इसकी शुरुवात बुरी थी लेकिन इसका अंत अच्छा हुआ।

परमेश्वर द्वारा दिये गए स्वप्न को कभी जाने न दें। भले ही यूसुफ के समान आपको एक ‘गढ्ढे’ या ‘कैद’ से शुरुवात करनी पड़े, लेकिन अंत में आप एक ‘महल’ में पहुँच सकते हैं। जैसा कि जॉयस मेयर लिखती हैं, ‘इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने कहाँ से शुरू किया है, लेकिन आपका अंत अच्छा हो सकता है….. ’। भले ही आज आप एक गढ्ढे में हैं, लेकिन परमेश्वर अब भी आपको ऊँचा उठा सकते हैं और आप में और आपके द्वारा महान चीज़ों को कर सकते हैं!’

प्रार्थना

प्रभु, मुझे अपना जीवन पूरी ईमानदारी से जीने में मेरी मदद कीजिये। कि मैं अपना जीवन। आपसे प्रार्थनाओं में और अपने दिल की गहराई और ईमानदारी से बातें करने में बिताऊँ। धन्यवाद कि आप मेरे दिल की पुकार सुनते हैं।

पिप्पा भी कहते है

विश्वास का उतार-चढ़ाव

यूसुफ अपने समय के सबसे शक्तिशाली देश में माफी प्राप्त कैदी से लेकर उस देश का अधिकारी बना। पतरस विश्वास के साहसी कार्य – पानी पर चलने – से लेकर डर के कारण डूबने लगा।

यूसुफ अचानक हुकूमत में आने के लिए तैयार था। उसने हज़ारों जीवनों को भुखमरी और आर्थिक नुकसान से बचाया। हमें यूसुफ के जैसे और भी लोगों को उठाना है, जो बचाव योजना में कुशलता प्राप्त नेता हों।

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संदर्भ

नोट्स:

जॉयसॅ मेयर, एवरीडे लाइफ बाइबल, (फेथवर्ड्स, 2013) पन्ना 72**.**

पामेला मेयर, ‘हाउ टू स्पॉट ए लायर’, टीइडी जुलाई 2011: https://www.ted.com/talks/pamela\_meyer\_how\_to\_spot\_a\_liar?language=en \[Last accessed December 2015\]

जहाँ पर कुछ बताया न गया हो, उन वचनों को पवित्र बाइबल, न्यू इंटरनैशनल संस्करण एन्ग्लिसाइड से लिया गया है, कॉपीराइट © 1979, 1984, 2011 बिबलिका, पहले इंटरनैशनल बाइबल सोसाइटी, हूडर और स्टोगन पब्लिशर की अनुमति से प्रयोग किया गया, एक हॅचेट यूके कंपनी सभी अधिकार सुरक्षित। ‘एनआईवी’, बिबलिका यू के का पंजीकृत ट्रेडमार्क संख्या 1448790 है।

जिन वचनों को (एएमपी) से चिन्हित किया गया है उन्हें एम्प्लीफाइड® बाइबल से लिया गया है। कॉपीराइट © 1954, 1958, 1962, 1964, 1965, 1987 लॉकमैन फाउंडेशन द्वारा प्राप्त अनुमति से उपयोग किया गया है। (www.Lockman.org)

जिन वचनों को (MSG) से चिन्हित किया गया है उन्हें मैसेज से लिया गया है। कॉपीराइट © 1993, 1994, 1995, 1996, 2000, 2001, 2002. जिनका प्रयोग एनएवीप्रेस पब्लिशिंग ग्रुप की अनुमति से किया गया है।

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