यीशु के साथ समय कैसे बिताएँ
परिचय
फरवरी 1974 में मेरी यीशु के साथ मुलाकात हुई। मैं उन लोगों का बहुत आभारी हूँ जिन्होंने शुरुवात से मुझे 'शांत समय’ की महत्ता को सिखाया।
पुराना प्रचलित शब्द 'शांत समय’ (इसका अर्थ है बाईबल पढ़ने और प्रार्थना करने के लिए अलग निकाला गया समय) इसका उद्गम शायद से नये नियम के लेखांश में यीशु के वचनों में से हुआ हैं, 'मेरे साथ एक शांत जगह में चलो’ (मरकुस 6:31)। जब मैं अठारह वर्ष का था तब से ही मैंने प्रतिदिन सुबह की शुरुवात इसी तरह से की है। मैं एक शांत जगह में यीशु के साथ अकेले समय बिताने की कोशिश करता हूँ। कभी - कभी यह बहुत थोड़े समय के लिए होता है, और कभी यह बहुत देर तक चलता है। लेकिन जैसे कि मुझे दिन की शुरुवात नाश्ते के बिना करना पसंद नहीं हैं, वैसे ही मैं आत्मिक भोजन के बिना दिन की शुरुवात करने की कल्पना नहीं कर सकता हूँ।
लगभग हमेशा, मैं बाईबल पढ़ने से शुरुवात करता हूँ, क्योंकि मैं विश्वास करता हूँ कि यह ज़्यादा ज़रूरी है कि यीशु मुझसे बात करें, इसकी तुलना में कि मैं उनसे बात करॅं। मेरे प्रतिदिन के विचार अब इन नोट्स के मुख्य आधार हैं, जिन्हें हम अपने बाइबल इन वन यर में भेजते हैं।
भजन संहिता 25:1-7
दाऊद को समर्पित।
25हे यहोवा, मैं स्वयं को तुझे समर्पित करता हूँ।
2 मेरे परमेश्वर, मेरा विश्वस तुझ पर है।
मैं तुझसे निराश नहीं होऊँगा।
मेरे शत्रु मेरी हँसी नहीं उड़ा पायेंगे।
3 ऐसा व्यक्ति, जो तुझमें विश्वास रखता है, वह निराश नहीं होगा।
किन्तु विश्वासघाती निराश होंगे और,
वे कभी भी कुछ नहीं प्राप्त करेंगे।
4 हे यहोवा, मेरी सहायता कर कि मैं तेरी राहों को सीखूँ।
तू अपने मार्गों की मुझको शिक्षा दे।
5 अपनी सच्ची राह तू मुझको दिखा और उसका उपदेश मुझे दे।
तू मेरा परमेश्वर मेरा उद्धारकर्ता है।
मुझको हर दिन तेरा भरोसा है।
6 हे यहोवा, मुझ पर अपनी दया रख
और उस ममता को मुझ पर प्रकट कर, जिसे तू हरदम रखता है।
7 अपने युवाकाल में जो पाप और कुकर्म मैंने किए, उनको याद मत रख।
हे यहोवा, अपने निज नाम निमित, मुझको अपनी करुणा से याद कर।
समीक्षा
परमेश्वर की ओर देखने का समय
क्या आप कभी अपनी परिस्थितियों के द्वारा भयभीत महसूस करते हैं? क्या आप कभी डरते हैं कि शायद आप हार जाएँगे और निराश हो जाएँगे या लज्जित होंगे?
दाऊद को स्पष्ट रूप से ऐसा डर था और वे हमें एक उदाहरण देते हैं कि कैसे एक शांत समय की शुरुवात करनी चाहिए। वे कहते है, 'हे परमेश्वर, आपके पास मैं अपने जीवन को लाता हूँ’ (पद - 1, ए.एम.पी.)। आगे आने वाली चुनौतियों के बावजूद वह परमेश्वर पर भरोसा रखने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। वे आगे कहते हैं, ‘हे मेरे परमेश्वर, मैं आप पर भरोसा करता हूँ, आप पर निर्भर रहता हूँ और मेरा विश्वास आप पर है। मुझे लज्जित न होने दें या (आप में मेरी आशा को) निराश न होने दें; मेरे शत्रुओं को मुझ पर जय न पाने दें’ (पद - 2, ए.एम.पी.)।
वे कहते हैं, ‘परमेश्वर, मैं आपकी ओर देख रहा हूँ’ (पद - 1 एम.एस.जी.)। निश्चित ही उन पर प्रहार हो रहे थें, किंतु उन्होंने विश्वास किया कि परमेश्वर कभी भी उन्हें लज्जित नहीं होने देंगे (पद - 3)। उनकी आशा हमेशा से परमेश्वर पर थी (पद - 5)।
आगे आने वाली चीज़ों के लिए तैयारी में हर दिन परमेश्वर की ओर देखने के लिए समय निकालिये। परमेश्वर की दया, क्षमा, सहायता, मार्गदर्शन और छुटकारे को माँगिये।
प्रार्थना
परमेश्वर, आज जिस किसी चीज़ से मैं जुड़ा हूँ उसमें मैं आपके मार्गदर्शन को माँगता हूँ 'मेरे हाथो को थामकर मुझे चलाईयें; मुझे सच्चाई के मार्ग में ले जाईये...मेरे लिए केवल सर्वश्रेष्ठ की योजना कीजिए, परमेश्वर! (पद - 5,7 एम.एस.जी.)।’
मरकुस 6:30-56
यीशु का पाँच हजार से अधिक को भोजन कराना
30 फिर दिव्य संदेश का प्रचार करने वाले प्रेरितों ने यीशु के पास इकट्ठे होकर जो कुछ उन्होंने किया था और सिखाया था, सब उसे बताया। 31 फिर यीशु ने उनसे कहा, “तुम लोग मेरे साथ किसी एकांत स्थान पर चलो और थोड़ा आराम करो।” क्योंकि वहाँ बहुत लोगों का आना जाना लगा हुआ था और उन्हें खाने तक का मौका नहीं मिल पाता था।
32 इसलिये वे अकेले ही एक नाव में बैठ कर किसी एकांत स्थान को चले गये। 33 बहुत से लोगों ने उन्हें जाते देखा और पहचान लिया कि वे कौन थे। इसलिये वे सारे नगरों से धरती के रास्ते चल पड़े और उनसे पहले ही वहाँ जा पहुँचे। 34 जब यीशु नाव से बाहर निकला तो उसने एक बड़ी भीड़ देखी। वह उनके लिए बहुत दुखी हुआ क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों जैसे थे। सो वह उन्हें बहुत सी बातें सिखाने लगा।
35 तब तक बहुत शाम हो चुकी थी। इसलिये उसके शिष्य उसके पास आये और बोले, “यह एक सुनसान जगह है और शाम भी बहुत हो चुकी है। 36 लोगों को आसपास के गाँवों और बस्तियों में जाने दो ताकि वे अपने लिए कुछ खाने को मोल ले सकें।”
37 किन्तु उसने उत्तर दिया, “उन्हें खाने को तुम दो।”
तब उन्होंने उससे कहा, “क्या हम जायें और दो सौ दीनार की रोटियाँ मोल ले कर उन्हें खाने को दें?”
38 उसने उनसे कहा, “जाओ और देखो, तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ हैं?”
पता करके उन्होंने कहा, “हमारे पास पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ हैं।”
39 फिर उसने आज्ञा दी, “हरी घास पर सब को पंक्ति में बैठा दो।” 40 तब वे सौ-सौ और पचास-पचास की पंक्तियों में बैठ गये।
41 और उसने वे पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ उठा कर स्वर्ग की ओर देखते हुए धन्यवाद दिया और रोटियाँ तोड़ कर लोगों को परोसने के लिए, अपने शिष्यों को दीं। और उसने उन दो मछलियों को भी उन सब लोगों में बाँट दिया।
42 सब ने खाया और तृप्त हुए। 43 और फिर उन्होंने बची हुई रोटियों और मछलियों से भर कर, बारह टोकरियाँ उठाईं। 44 जिन लोगों ने रोटियाँ खाईं, उनमे केवल पुरुषों की ही संख्या पांच हज़ार थी।
यीशु का पानी पर चलना
45 फिर उसने अपने चेलों को तुरंत नाव पर चढ़ाया ताकि जब तक वह भीड़ को बिदा करे, वे उससे पहले ही परले पार बैतसैदा चले जायें। 46 उन्हें बिदा करके, प्रार्थना करने के लिये वह पहाड़ी पर चला गया।
47 और जब शाम हुई तो नाव झील के बीचों-बीच थी और वह अकेला धरती पर था। 48 उसने देखा कि उन्हें नाव खेना भारी पड़ रहा था। क्योंकि हवा उनके विरुद्ध थी। लगभग रात के चौथे पहर वह झील पर चलते हुए उनके पास आया। वह उनके पास से निकलने को ही था। 49 उन्होंने उसे झील पर चलते देखा सोचा कि वह कोई भूत है। और उनकी चीख निकल गयी। 50 क्योंकि सभी ने उसे देखा था और वे सहम गये थे। तुरंत उसने उन्हें संबोधित करते हुए कहा, “साहस रखो, यह मैं हूँ! डरो मत!” 51 फिर वह उनके साथ नाव पर चड़ गया और हवा थम गयी। इससे वे बहुत चकित हुए। 52 वे रोटियों के आश्चर्य कर्म के विषय में समझ नहीं पाये थे। उनकी बुद्धि जड़ हो गयी थी।
यीशु का अनेक रोगियों को चंगा करना
53 झील पार करके वे गन्नेसरत पहुँचे। उन्होंने नाव बाँध दी। 54 जब वे नाव से उतर कर बाहर आये तो लोग यीशु को पहचान गये। 55 फिर वे बीमारों को खाटों पर डाले समूचे क्षेत्र में जहाँ कहीं भी, उन्होंने सुना कि वह है, उन्हें लिये दौड़ते फिरे। 56 वह गावों में, नगरों में या वस्तियों में, जहाँ कहीं भी जाता, लोग अपने बीमारों को बाज़ारों में रख देते और उससे विनती करते कि वह अपने वस्त्र का बस कोई सिरा ही उन्हें छू लेने दे। और जो भी उसे छू पाये, सब चंगे हो गये।
समीक्षा
यीशु के साथ अकेले में समय बिताना
यीशु ने उनके चेलो को उनके साथ अकेले में समय बिताने की महत्ता को सिखाया। उन्होंने उनसे कहा, 'मेरे साथ एक शांत जगह में चलो’ (पद - 31ब) और वे अपने आप 'एक एकांत जगह में गए’ (पद - 32)।
यीशु के जीवन में बहुत से महान कार्य हो रहे थे, अवश्य ही उनके लिए थोड़ा समय निकालकर थोड़ा आराम करना बहुत ही मुश्किल रहा होगा (पद - 31)। परमेश्वर अद्भुत तरीके से उनका इस्तेमाल कर रहे थे – 5,000 लोगों को भोजन खिलाते हुए और पानी पर चलते हुए! उन्होंने सभी लोगों की बहुत सी ज़रूरतों को देखा ('उन्हें लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे उन भेड़ों के समान थे जिनका कोई रखवाला न हो’, पद - 34)।
वे यीशु के लिए आतुर थे और उनकी ओर दौड़ रहे थे (पद - 33,55)। फिर भी, यीशु ने उन्हें वापस भेजना ज़रूरी समझा। उन्हें थोड़े एकांत की आवश्यकता थी। वे प्रार्थना करने के लिए पह़ाड पर चढ़ गए (पद - 45–46)। उन्होंने परमेश्वर के साथ एकांत समय को प्राथमिकता दी।
प्रार्थना और कार्य साथ - साथ होते हैं। ऐसे संबंधों में से गतिविधियाँ बाहर आती है। यीशु को 'उन पर दया आयी’ (पद - 34)। 'तरस’ के लिए ग्रीक भाषा में इस शब्द का इस्तेमाल किया गया है। 'उनका हृदय पिघल गया’ (पद - 34 एम.एस.जी)।
यीशु नियमित रूप से चेलों को उनकी सेवकाई में विकसित करते थे और उत्साहित करते थे। उन्होंने केवल अकेले ही लोगो को चमत्कारी रूप से भोजन नहीं खिलाया। उन्होंने उनसे कहा, ‘तुम उन्हें कुछ खाने के लिए दो’ (पद - 37)।
कभी – कभी मैं इस सेवकाई के द्वारा भयभीत महसूस करता हूँ जो परमेश्वर ने मुझे दी है। अक्सर, मैं महसूस करता हूँ कि मेरे पास उन लोगों को देने के लिए बहुत थोड़ा है जिनकी मैं सेवा करने के लिए बुलाया गया हूँ। मुझे इस लेखांश से बहुत शांति मिलती है। थोड़े के साथ यीशु बहुत कुछ कर सके। यदि आप यीशु को वह थोड़ा देंगे जो आपके पास है, तो वह इसे बढ़ा सकते हैं और सभी लोगों की ज़रूरतों को पूरा करेंगे।
यीशु सक्षम, संगठित और प्रायोगिक थे। उन्होंने 'उनसे लोगो को हरी घास पर समूह में बैठाने के लिए कहा। इसलिए वे सौ और पचास के समूह में नीचे बैठ गए’ (पद - 39–40)।
जब चेले 5,000 लोगों को भोजन खिला चुके थे, तब यीशु ने उन्हें आगे भेज दिया। उन्होने अपने चेलो को नाव में बैठकर उनसे आगे जाने के लिए कहा, जबकि वे स्वयं प्रार्थना करने के लिए पहाड़ पर चले गए।
यहाँ तक कि जब हम वह कर रहे होते है जो यीशु ने हमसे करने को कहा है, तो कभी कभी यह बहुत ही मुश्किल और कठिन काम होता है। ऐसा समय भी होता है जब मैं 'व्यथित (परेशान और डर और भय से भरा हुआ)’ महसूस करता हूँ (पद - 50 ए.एम.पी.)। चेले 'पतवार के साथ बहुत परिश्रम कर रहे थे, क्योंकि हवा उनके विरूद्ध बह रही थी’ (पद - 48)। जब यीशु आकर उनके मिले, उनसे कहा, 'ढ़ाढ़स बाँधो! यह मैं हूँ। डरो मत’। (पद - 50)।
जैसे ही यीशु उनके साथ नाव पर गए, ‘हवा थम गई’ (पद - 51)। हम उस बदलाव के एक चित्र को देखते हैं जो यीशु हमारे जीवनों में करते हैं। यह एक कड़ा संघर्ष है जब तक कि हम अपने साथ यीशु की उपस्थिति के प्रति सचेत नही होते हैं।
केवल वे जो यीशु को जानते हैं (पद - 54) इस संबंध का आनंद ले सकते हैं। जो उन्हें जानते थे उनकी ओर दौड़े (पद - 55) और 'जितनों ने उन्हें छुआ वे चंगे हो गए’ (पद - 56)।
प्रार्थना
परमेश्वर, आपका धन्यवाद क्योंकि जीवन के तूफान में आप मुझसे कहते हैं, ‘ढ़ाढ़स बॉंधो! यह मैं हूँ। डरो मत’ (पद - 50)।
निर्गमन 31:1-33:6
बसलेल और ओहोलीआब
31तब यहोवा ने मूसा के कहा, 2 “मैंने यहूदा के कबीले से ऊरो के पुत्र बसलेल को चुना है। ऊरो हूर का पुत्र था। 3 मैंने बसलेल को परमेश्वर की आत्मा से भर दिया है, अर्थात् मैंने उसे सभी प्रकार की चीज़ों को करने का ज्ञान और निपुर्णता दे दी है। 4 बसलेल बहुत अच्छा शिल्पकार है और वह सोना, चाँदी तथा काँसे की चीज़ें बना सकता है। 5 बसलेल सुन्दर रत्नों को काट और जड सकता है। वह लकड़ी का भी काम कर सकता है। बसलेल सब प्रकार के काम कर सकता है। 6 मैंने ओहोलीआब को भी उसके साथ काम करने को चुना है। आहोलीआब दान कबीले के अहीसामाक का पुत्र है और मैंने दूसरे सब श्रमिकों को भी ऐसी निपुर्णता दी है कि वे उन सभी चीज़ों को बना सकते हैं जिसे मैंने तुमको बनाने का आदेश दिया है: 7 मिलापवाला तम्बू, साक्षीपत्र का सन्दूक, सन्दूक को ढकने वाला ढक्कन, मिलापवाले तम्बू का साजोसामान, 8 मेज और उस पर की सभी चीजें, शुद्ध सोने का दीपाधार, धूप जलाने की वेदी, 9 भेंट जलाने के लिए वेदी, और वेदी पर उपयोग की चीज़ें, चिलमची और उसके नीचे का आधार, 10 याजक हारून के लिए सभी विशेष वस्त्र और उसके पुत्रों के लिए सभी विशेष वस्त्र, जिन्हें वे याजक के रूप मे सेवा करते समय पहनेंगे, 11 अभिषेक का सुगन्धित तेल, और पवित्र स्थान के लिए सुगन्धित धूप। इन सभी चीज़ों को उसी ढंग से बनांएगे जैसा मैंने तुमको आदेश दिया है।”
सब्त
12 तब यहोवा ने मूसा से कहा, 13 “इस्राएल के लोगों से यह कहो: ‘तुम लोग मेरे विशेष विश्राम के दिन वाले नियमों का पालन करोगे। तुम्हें यह अवश्य करना चाहिए, क्योंकि ये मेरे और तुम्हारे बीच सभी पीढ़ियों के लिए प्रतीक स्वरूप रहेंगे। इससे तुम्हें पता चलेगा कि मैं अर्थात् यहोवा ने तुम्हें अपना विशेष जनसमूह बनाया है।
14 “‘सब्त के दिन को विशेष दिवस मनाओ। यदि कोई व्यक्ति सब्त के दिन को अन्य दिनों की तरह मानता है तो वह व्यक्ति अवश्य मार दिया जाना चाहिए। कोई व्यक्ति जो सब्त के दिन काम करता है अपने लोगों से अवश्य अलग कर दिया जाना चाहिए। 15 सप्ताह में दूसरे अन्य छः दिन काम करने के लिए हैं, किन्तु सातवाँ दिन विश्राम करने का विशेष दिन है, अर्थात् यहोवा को सम्मान देने का विशेष दिन है, कोई व्यक्ति जो सब्त के दिन काम करेगा अवश्य ही मार दिया जाये। 16 इस्राएल के लोग सब्त के दिन को अवश्य याद रखें और इसे विशेष दिन बनाएं। वे इसे लगातार मनाते रहें। यह मेरे और उनके बीच साक्षीपत्र है जो सदा बना रहेगा। 17 सब्त का दिन मेरे और इस्राएल के लोगों के बीच सदा के लिए प्रतीक रहेगा।’” (यहोवा ने छः दिन काम किया तथा आकाश एवं धरती को बनाया। सातवें दिन उसने अपने को विश्राम दिया।)
18 इस प्रकार परमेश्वर ने मूसा से सीनै पर्वत पर बात करना समाप्त किया। तब परमेश्वर ने उसे आदेश लिखे हुए दो समतल पत्थर दिए। परमेश्वर ने अपनी उगुलियों का उपयोग किया और पत्थर पर उन नियमों को लिखा।
सोने का बछड़ा
32लोगों ने देखा कि लम्बा समय निकल गया और मूसा पर्वत से नीचे नहीं उतरा। इसलिए लोग हारून के चारों ओर इकट्ठा हुए। उन्होंने उससे कहा, “देखो, मूसा ने हमें मिस्र देश से बाहर निकाला। किन्तु हम यह नहीं जानते कि उसके साथ क्या घटित हुआ है। इसलिए कोई देवता हमारे आगे चलने और हमें आगे ले चलने वाला बनाओ।”
2 हारून ने लोगों से कहा, “अपनी पत्नियों, पुत्रों और पुत्रियों के कानों की बालियाँ मेरे पास लाओ।”
3 इसलिए सभी लोगों ने कान की बालियाँ इकट्ठी कीं और वे उन्हें हारून के पास लाए। 4 हारून ने लोगों से सोना लिया, और एक बछड़े की मूर्ति बनाने के लिए उसका उपयोग किया। हारून ने मूर्ति बनाने के लिए मूर्ति को आकार देने वाले एक औज़ार का उपयोग किया। तब इसे उसने सोने से मढ़ दिया।
तब लोगों ने कहा, “इस्राएल के लोगों, ये तुम्हारे वे देवता हैं जो तुम्हें मिस्र से बाहार ले आया।”
5 हारून ने इन चीज़ों को देखा। इसलिए उसने बछड़े के सम्मुख एक वेदी बनाई। तब हारून ने घोषणा की। उसने कहा, “कल यहोवा के लिए विशेष दावत होगी।”
6 अगले दिन सुबह लोग शीघ्र उठ गए। उन्होंने जानवरों को मारा और होमबलि तथा मेलबलि चढ़ाई। लोग खाने और पीने के लिये बैठे। तब वे खड़े हुए और उनकी एक उन्मत्त दावत हुई।
7 उसी समय यहोवा ने मूसा से कहा, “इस पर्वत से नीचे उतरो। तुम्हारे लोग अर्थात् उन लोगों ने, जिन्हें तुम मिस्र से लाए हो, भयंकर पाप किया है। 8 उन्होंने उन चीज़ों को करने से शीघ्रता से इन्कार कर दिया है जिन्हें करने का आदेश मैंने उन्हें दिया था। उन्होंने पिघले सोने से अपने लिए एक बछड़ा बनाया है। वे उस बछड़े की पूजा कर रहे हैं और उसे बलि भेंट कर रहे हैं। लोगों ने कहा है, ‘इस्राएल, ये देवता है जो तुम्हें मिस्र से बाहर लाए हैं।’”
9 यहोवा ने मूसा से कहा, “मैंने इन लोगों को देखा है। मैं जानता हूँ कि ये बड़े हठी लोग हैं जो सदा मेरे विरुद्ध जाएंगे। 10 इसलिए अब मुझे इन्हें क्रोध करके नष्ट करने दो। तब मैं तुझसे एक महान राष्ट्र बनाऊँगा।”
11 किन्तु मूसा ने अपने परमेश्वर यहोवा से प्रार्थना की। मूसा ने कहा, “हे यहोवा, तू अपने क्रोध को अपने लोगों को नष्ट न करने दे। तू अपार शक्ति और अपने बल से इन्हें मिस्र से बाहर ले आया। 12 किन्तु यदि तू अपने लोगों को नष्ट करेगा तब मिस्र के लोग कह सकते हैं, ‘यहोवा ने अपने लोगों के साथ बुरा करने की योजना बनाई। यही कारण है कि उसने इनको मिस्र से बाहर निकाला। वह उन्हें पर्वतों में मार डालना चाहता था। वह अपने लोगों को धरती से मिटाना चाहता था।’ इसलिए तू लोगों पर क्रोधित न हो। अपना क्रोध त्याग दे। अपने लोगों को नष्ट न कर। 13 तू अपने सेवक इब्राहीम, इसहाक और इस्राएत (याकूब) को याद कर। तूने अपने नाम का उपयोग किया और तूने उन लोगों को वचन दिया। तूने कहा, ‘मैं तुम्हारे लोगों कों उतना अनगिनत बनाऊँगा जितने आकाश में तारे हैं। मैं तुम्हारे लोगों को वह सारी धरती दूँगा जिसे मैंने उनको देने का वचन दिया है। यह धरती सदा के लिए उनकी होगी।’”
14 इसलिए यहोवा ने लोगों के लिए अफ़सोस किया। यहोवा ने वह नहीं किया जो उसने कहा कि वह करेगा अर्थात् लोगों को नष्ट नहीं किया।
15 तब मूसा पर्वत से नीचे उतरा। मूसा के पास आदेश वाले दो समतल पत्थर थे। ये आदेश पत्थर के सामने तथा पीछे दोनों तरफ लिखे हुए थे। 16 परमेश्वर ने स्वयं उन पत्थरों को बनाया था और परमेश्वर ने स्वयं उन आदेशों को उन पत्थरों पर लिखा था।
17 जब वे पर्वत से उतर रहे थे यहोशू ने लोगों का उन्मत्त शोर सुना। यहोशू ने मूसा से कहा, “नीचे पड़ाव में युद्ध की तरह का शोर है!”
18 मूसा ने उत्तर दिया, “यह सेना का विजय के लिये शोर नहीं है। यह हार से चिल्लाने वाली सेना का शोर भी नहीं है। मैं जो आवाज़ सुन रहा हूँ वह संगीत की है।”
19 जब मूसा डेरे के समीप आया तो उसने सोने के बछड़े और गाते हुए लोगों को देखा। मूसा बहुत क्रोधित हो गया और उसने उन विशेष पत्थरों को ज़मीन पर फेंक दिया। पर्वत की तलहटी में पत्थरों के कई टुकडे हो गए। 20 तब मूसा ने लोगों के बनाए बछड़े को नष्ट कर दिया। उसने इसे आग में गला दिया। उसने सोने को तब तक पीसा जब तक यह चूर्ण न हो गया और उसने उस चूर्ण को पानी में फेंक दिया। उसने इस्राएल के लोगों को वह पानी पीने को विवश किया।
21 मूसा ने हारून से कहा, “इन लोगों ने तुम्हारे साथ क्या किया? तुम उन्हें ऐसा बुरा पाप करने की ओर क्यों ले गए?”
22 हारून ने उत्तर दिया, “महाशय, क्रोधित मत हो। आप जानते हैं कि ये लोग सदा गलत काम करने को तैयार रहते हैं। 23 लोगों ने मुझ से कहा, ‘मूसा हम लोगों को मिस्र से बाहर लाया। किन्तु हम लोग नहीं जानते कि उसके साथ क्या घटित हुआ।’ इसलिए हम लोगों को मार्ग दिखाने वाला कोई देवता बनाओ, 24 इसलिए मैंने लोगों से कहा, ‘यदि तुम्हारे पास सोने की अंगूठियाँ हों तो उन्हें मुझे दे दो।’ लोगों ने मुझे अपना सोना दिया। मैंने इस सोने को आग में फेंका और उस आग से यह बछड़ा आया।”
25 मूसा ने देखा कि हारून ने विद्रोह उत्पन्न किया है। लोग मूर्खों की तरह उग्र व्यवहार इस तरह कर रहे थे कि उनके सभी शत्रु देख सकें। 26 इसलिए मूसा डेरे के द्वार पर खड़ा हुआ। मूसा ने कहा, “कोई व्यक्ति जो यहोवा का अनुसरण करना चाहता है मेरे पास आए” तब लेवी के परिवार के सभी लोग दौड़कर मूसा के पास आए।
27 तब मूसा ने उनसे कहा, “मैं तुम्हें बताऊँगा कि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा क्या कहता है ‘हर व्यक्ति अपनी तलवार अवश्य उठा ले और डेरे के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाये। तुम लोग इन लोगों को अवश्य दण्ड दोगे चाहे किसी व्यक्ति को अपने भाई, मित्र और पड़ोसी को ही क्यों न मारना पड़े।’”
28 लेवी के परिवार के लोगों ने मूसा का आदेश माना। उस दिन इस्राएल के लगभग तीन हज़ार लोग मरे। 29 तब मूसा ने कहा, “यहोवा ने आज तुम को ऐसे लोगों के रूप में चुना है जो अपने पुत्रों और भाईयों को आशीर्वाद देंगे।”
30 अगली सुबह मूसा ने लोगों से कहा, “तुम लोगों ने भयंकर पाप किया है। किन्तु अब मैं यहोवा के पास ऊपर जाऊँगा और ऐसा कुछ कर सकूँगा जिससे वह तुम्हारे पापों को क्षमा कर दे।” 31 इसलिए मूसा वापस यहोवा के पास गया और उसने कहा, “कृपया सुन! इन लोगों ने बहुत बुरा पाप किया है और सोने का एक देवता बनाया है। 32 अब उन्हें इस पाप के लिये क्षमा कर। यदि तू क्षमा नहीं करेगा तो मेरा नाम उस किताब से मिटा दे जिसे तूने लिखा है।”
33 किन्तु यहोवा ने मूसा से कहा, “जो मेरे विरुद्ध पाप करते हैं केवल वे ही ऐसे लोग हैं जिनका नाम मैं अपनी पुस्तक से मिटाता हूँ। 34 इसलिए जाओ और लोगों को वहाँ ले जाओ जहाँ मैं कहता हूँ। मेरा दूत तुम्हारे आगे आगे चलेगा और तुम्हें रास्ता दिखाएगा। जब उन लोगों को दण्ड देने का समय आएगा जिन्होंने पाप किया है तब उन्हें दण्ड दिया जायेगा।” 35 इसलिए यहोवा ने लोगों में एक भयंकर बीमारी उत्पन्न की। उस ने यह इसलिए किया कि उन लोगों ने हारून से सोने का बछड़ा बनाने को कहा था।
“मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगा”
33तब यहोवा ने मूसा से कहा, “तुम और तुम्हारे वे लोग जिन्हें तुम मिस्र से लाए हो उस जगह को अवश्य छोड़ दो। और उस प्रदेश में जाओ जिसे मैंने इब्राहीम, इसहाक और याकूब को देने का वचन दिया था। मैंने उन्हें वचन दिया मैंने कहा, ‘मैं वह प्रदेश तुम्हारे भावी वंशजों को दूँगा। 2 मैं एक दूत तुम्हारे आगे आगे चलने के लिये भेजूँगा, और मैं कनानी, एमोरी, हित्ती, परिज्जी, हिब्बी और यबूसी लोगों को हराऊँगा, मैं उन लोगों को तुम्हारा प्रदेश छोड़ने को विवश करूँगा। 3 इसलिए उस प्रदेश को जाओ जो बहुत ही अच्छी चीज़ों से भरा है। किन्तु मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगा, तुम लोग बड़े हठी हो, यदि मैं तुम्हारे साथ गया तो मैं तुम्हें शायद रास्ते में ही नष्ट कर दूँ।’”
4 लोगों ने यह बुरी खबर सुनी और वे वहुत दुःखी हुए। इसके बाद लोगों ने आभूषण नहीं पहने। 5 उन्होंने आभूषण नहीं पहने क्योंकि यहोवा ने मूसा से कहा, “इस्राएल के लोगों से कहो, ‘तुम हठी लोग हो। यदि मैं तुम लोगों के साथ थोड़े समय के लिए भी यात्रा करुँ तो मैं तुम लोगों को नष्ट कर दूँगा, इसलिए अपने सभी गहने उतार लो। तब मैं निश्चय करूँगा कि तुम्हारे साथ क्या करूँ।’” 6 इसलिए इस्राएल के लोगों ने होरेब (सीनै) पर्वत पर अपने सभी गहने उतार लिए।
समीक्षा
परमेश्वर से सहायता ग्रहण करने का समय
यीशु चाहते थे कि उनके चेले एकांत में चले जाएँ ताकि थोड़ा आराम कर सकें (मरकुस 6:31)। इस लेखांश में हम आराम और ताज़गी के महत्त्व को देखते हैं (निर्गमन 31:13–17)। हमें अपनी समय - सारिणी को देखने की आवश्यकता है और हमें यह सुनिश्चित करना है कि हम इन समयों को प्राथमिकता में रखे।
यीशु के साथ अकेले में समय बिताना है उनकी बातें सुनना। मुख्य तरीका जिससे हम यीशु को हमसे बात करते हुए सुनते है वह है बाईबल के द्वारा। अक्सर जब हम यीशु के साथ अकेले में समय नहीं बिता पाते हैं, तब ही हम आसानी से परीक्षा में पड़ते हैं।
निर्गमन 32 में, हम देखते हैं कि भूतकाल में परमेश्वर ने चाहें हमारे लिए कितना कुछ क्यों न किया हो, हम बहुत ही जल्दी इसे भूल जाते हैं और उन पर संदेह करते हैं, और इसके परिणामस्वरूप, पाप में चले जाते हैं: 'और जिस मार्ग पर चलने की आज्ञा मैंने उनको दी थी उसको उन्होंने छोड़ दिया’ (32:8)।
उनकी मूर्तिपूजा का शुरुवाती कारण धीरज की कमी थी। उन्होंने परमेश्वर के समय का इंतज़ार नहीं किया। यह तथ्य कि परमेश्वर समय लेता है जिसे हम एक लंबे समय के रूप में देखते हैं, तब इसका अर्थ यह नहीं कि वह काम नहीं कर रहे हैं।
जब लोगों ने सोने के बछड़े को एक मूर्ति के रूप में बनाया, तब यह मूसा की प्रार्थना थी जिसने संपूर्ण विपत्ति को रोका (पद - 11–14)। प्रार्थना की सामर्थ के द्वारा इतिहास की दिशा को बदलना संभव है।
हारुन मूर्तिपूजा के लिए उत्तरदायी ठहरेः 'इन लोगों ने तेरे साथ क्या किया कि तू ने उनको इतने बड़े पाप में फँसाया?’ (पद - 21)। असल में, हारुन ने प्रचलित मत को माना। यह लोगों का विचार था, जिस पर उसने काम किया था। फिर भी परमेश्वर की नज़रों में वह अब भी लीडर था। उन्हें पाप में ले जाने के लिए अपने आपको मनाने के बजाय, हारुन को उनके विरूद्ध खड़ा रहना चाहिए था।
हारुन ने उत्तर दिया, 'तू तो इन लोगों को जानता ही है कि ये बुराई में मन लगाए रहते हैं... उन्होंने मुझे सोना दिया और मैं ने उन्हें आग में डाल दिया, तब यह बछड़ा निकल पड़ा!’ (पद - 22–24)। निश्चित ही यह बेतुकी बात है लेकिन अपने आपको निर्दोष साबित करने के लिए सच्चाई को छिपाना बहुत ही आसान बात है।
आज के लेखांश को इसके नये नियम के प्रदर्शन प्रकाश में, और ज़्यादा पूरी तरह से समझा जा सकता है। संत पौलुस लिखते हैं, ‘ये बातें हमारे लिये दृष्टान्त ठहरी, कि जैसे उन्होंने लालच किया, वैसे हम बुरी वस्तुओं का लालच न करें।’ (1कुरिंथियो 10:6)। वे कहते हैं कि यह लेखांश हमें चार चीज़ों के बारे में चेतावनी देता हैः
असंयम (1कुरिंथियो 10:7; निर्गमन 32:6)
व्यभिचार (1कुरिंथियो 10:8, एम.एस.जी.)
स्वयं की पूजा (पद - 9)।
कुड़कुड़ाना (पद - 10)।
संत पौलुस आगे कहते है, 'परन्तु यें सब बातें, जो उन पर पड़ी, दृष्टान्त की रीति पर भी: और वे हमारी चेतावनी के लिये जो जगत के अन्तिम समय में रहते हैं लिखी गईं हैं’ (पद - 11)। यहाँ पर दंड की तीक्ष्णता एक चिह्न है कि यें पाप कितने गंभीर और विनाशकारी हैं। उन्हें फलने देने में परमेश्वर की अनिच्छा को वे हमें दिखाते हैं।
फिर भी पौलुस इसे वहीं पर छोड़ नहीं देते हैं, वह हमें बताते हैं कि कैसे प्रलोभनों से निपटना है'? तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े, जो मनुष्य के सहने से बाहर है; और परमेश्वर सच्चा है; वह तुम्हें सामर्थ से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन परीक्षा के साथ निकास भी करेगा; कि तुम सह सको’ (पद - 13, एम.एस.जी.)।
ये अंतिम वचन हमें परीक्षा में हमारी सहायता करने के लिए हमारे प्रति परमेश्वर के अद्भुत अनुग्रह की याद दिलाते हैं। किंतु जब हम इन क्षेत्रों में यदि नीचे गिर भी जाते हैं तब भी यीशु हमें क्षमा कर सकते हैं।
प्रार्थना
परमेश्वर, आपकी उपस्थिति में समय बिताने की जो अद्भुत सुविधा हमारे पास है उसके लिए आपका धन्यवाद। आपका धन्यवाद क्योंकि मैं आपकी आवाज़ को सुन सकता हूँ और उसे सुन सकता हूँ जो आप वचनों के द्वारा मुझसे कहते हैं। परीक्षा में न पड़ने के लिए सावधानी बरतने में मेरी सहायता कीजिए। हर दिन मुझे अपने साथ नज़दीकी संबंध में चलाते रहिए।
पिप्पा भी कहते है
निर्गमन 31:1–33:6
कितनी जल्दी लोग बुराई में फँस जाते हैं जब उन्हें उनकी ही युक्तियों पर छोड़ दिया जाता है। हारुन को बेहतर पता होना चाहिए था – वह बहुत से महान चमत्कारों का भाग बन सकते थे। यहाँ तक कि वह भी भीड़ के द्वारा भटक गए थे। केवल मूसा पूरी तरह से वफादार बने रहे। लीडरशिप अकेले हो सकती है। मूसा एक सच्चे लीडर थे।

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संदर्भ
नोट्स
जहाँ पर कुछ बताया न गया हो, उन वचनों को पवित्र बाइबल, न्यू इंटरनैशनल संस्करण एन्ग्लिसाइड से लिया गया है, कॉपीराइट ऊ 1979, 1984, 2011 बिबलिका, पहले इंटरनैशनल बाइबल सोसाइटी, हूडर और स्टोगन पब्लिशर की अनुमति से प्रयोग किया गया, एक हॅचेट यूके कंपनी सभी अधिकार सुरक्षित। ‘एनआईवी’, बिबलिका यू के का पंजीकृत ट्रेडमार्क संख्या 1448790 है।
जिन वचनों को (एएमपी, AMP) से चिन्हित किया गया है उन्हें एम्प्लीफाइडऍ बाइबल से लिया गया है. कॉपीराइट © 1954, 1958, 1962, 1964, 1965, 1987 लॉकमैन फाउंडेशन द्वारा प्राप्त अनुमति से उपयोग किया गया है। (www.Lockman.org)
जिन वचनों को (एमएसजी MSG) से चिन्हित किया गया है उन्हें मैसेज से लिया गया है। कॉपीराइट © 1993, 1994, 1995, 1996, 2000, 2001, 2002. जिनका प्रयोग एनएवीप्रेस पब्लिशिंग ग्रुप की अनुमति से किया गया है।